जनता जनप्रतिनिधि चुनती है न कि प्रतिनिधि का प्रतिनिधि

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जनप्रतिनिधि का अर्थ है जिसे जनता अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनती है। जनता सिर्फ मतदान के द्वारा अपना प्रतिनिधि चुनती है न कि जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि को, मगर कई बार हमें सरपंच प्रतिनिधि, पार्षद प्रतिनिधि जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। जब वास्तविक निर्वाचित महिला पार्षद/सरपंच कामकाज में असमर्थ होतघ हैं या पर्दे के पीछे से उनके परिवार के पुरुष सदस्य काम संभालते हैं, हर फैसले में दखलंदाजी करते हैं तो उन्हें उनका प्रतिनिधि कहा जाता है। आधिकारिक रूप से निर्वाचित महिला के स्थान पर उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदार सत्ता और प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग करते हैं। पार्षद और सरपंच स्थानीय निकायों के कानूनी रूप से चुने गए जनप्रतिनिधि होते हैं जबकि पार्षद प्रतिनिधि और सरपंच प्रतिनिधि उनके द्वारा बनाए गए अनाधिकृत या सामाजिक सहायक होते हैं जिन्हें कानूनन कोई अधिकार नहीं होता। तो फिर ये वैध कैसे हैं? क्या बिना चुनाव के प्रतिनिधि का प्रतिनिधि बनकर हस्तक्षेप करना, रौब दिखाना जायज है?

बिहार में मुखिया पति, उत्तर प्रदेश में प्रधान पति और मध्य प्रदेश में सरपंच पति है तो राजस्थान में भी सरपंच प्रतिनिधि, पार्षद प्रतिनिधि है। यूपी हो या बिहार, हरियाणा हो या राजस्थान, छत्तीसगढ़ हो या मध्य प्रदेश प्रधान पति, सरपंच पति, मुखिया पति, पार्षद प्रतिनिधि का अलग ही रौब देखने को मिलता है। प्रधान पति का मतलब सिर्फ सरपंच पति या मुखिया पति तक सीमित नहीं है बल्कि इसका मतलब वैसे पुरुषों से है जो आधिकारिक रूप से चुनी गई महिलाओं की शक्तियों का गैर आधिकारिक रूप से इस्तेमाल करते हैं। प्रतिनिधि नाम का पद निर्वाचित महिलाओं के पति या परिवार के पुरुष सदस्य हड़प लेते हैं जो महिला की जगह काम करते हैं। इस वजह से निर्वाचित महिला प्रतिनिधि घोषणा में तो जनप्रतिनिधि रह जाती है पर वास्तव में सारी शक्तियां पुरुष के हाथ में आ जाती है। जिनकी पत्नी प्रधान, सरपंच, पार्षद होती है उनकी अलग ही ठसक होती है। शासन व्यवस्था से जुड़े आम जनता के काम हो या सरकारी दफ्तर हर जगह ये प्रधान पति, प्रतिनिधि ही सारे काम निपटाते, फैसले लेते नजर आते हैं। इस प्रकार परिवार के पुरुष सदस्य महिलाओं के नेतृत्व को कमजोर करते हैं।

कई जगह तो यह देखने को मिलता है कि बोर्ड की मीटिंग में भी पार्षद प्रतिनिधि दखल देते हैं और निर्णय लेते हैं। हां हस्ताक्षर और मोहर जरूर जनप्रतिनिधि के ही होते हैं। कुल मिलाकर महिला जनप्रतिनिधि का काम केवल रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने तक का ही रह जाता है। देखने में आता है कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर जीतती तो वे हैं मगर सत्ता चलाने या हस्ताक्षेप करने वाले उनके पति या रिश्तेदार होते हैं।

कई बार पंचायत में, पालिकाओं में जाते हैं तो यह शब्द सुनाई देता है आइए पार्षद प्रतिनिधि साहब, आइए चेयरमैन प्रतिनिधि साहब, आइए सरपंच प्रतिनिधि साहब और कई बार तो लोग उन्हें ही पार्षद साहब, चेयरमैन साहब, सरपंच साहब कहते सुनाई देते हैं। वे ही महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर कार्यालय के कार्य संपादित करते हैं। महिला पार्षद हो, अध्यक्ष हो तो उनकी जगह उनके प्रतिनिधि ही कार्यालय का उपयोग करते हैं। नाम तो महिला का चलता है मगर निर्णय उनके पिता, ससुर, पति या पुत्र पुरुष प्रतिनिधि करते रहे हैं। फिर लोग भी उन्हें पार्षद साहब, अध्यक्ष साहब, सरपंच साहब ही मानने लगते हैं क्योंकि जो वास्तविक सरपंच, अध्यक्ष, पार्षद होता है वह सिर्फ खास मीटिंग, खास मौकों पर ही ऑफिस आते हैं और उन्हें जहां बताया जाता है वहां हस्ताक्षर कर जाते हैं। ऐसे में गांव के विकास का तो पता नहीं हां तथाकथित प्रतिनिधि अपना विकास जरुर कर लेते हैं। जनता को तो हो सकता है इतना गहराई से ज्ञान नहीं हो परंतु वहां के प्रशासनिक अधिकारी भी इस पर ध्यान नहीं देते। यहां तक कि अफसरों को भी वे अपना यही परिचय देते हैं और अफसर भी उन्हें ही प्रतिनिधि मान लेते हैं। बिना कोई चुनाव लड़े पार्षद महिला का पति या पुरुष रिश्तेदार पार्षद प्रतिनिधि कहलाने लगता है। हालांकि ऐसे मामलों पर पंचायती राज मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी है। इस रिपोर्ट में प्रधान पति या प्रतिनिधि जैसी प्रथा को रोकने के लिए ऐसे मामलों में लिप्त पाए जाने वाले लोगों पर दंड की सिफारिश की गई है। साथ ही महिलाएं बेहतर तरीके से काम कर पाए इसके लिए उन्हें बेहतर प्रशिक्षण देने और नीतिगत सुधार लाने के बाद कही गई है।

देखने में आता कि हर बैठक में दो-चार महिला पार्षदों को छोड़कर उनके प्रतिनिधि ही भाग लेते हैं। जिनको अपने वार्ड के नागरिकों की समस्या या किसी मुद्दे पर कभी भी बोलते हुए भी नहीं देखा गया। दो-तीन वर्ष पूर्व कई बार नगर पालिका जाने का काम पड़ा। 35 वार्ड में से लगभग आधे वार्डों की पार्षद महिलाएं थी और नगर पालिका अध्यक्ष भी महिला थी। मैं देखता वहां पर महिला पार्षद नहीं बल्कि उनके पार्षद प्रतिनिधि बैठे होते। यहां तक की चेयरमैन के भी प्रतिनिधि ही मिलते। पिछले नगर पालिका चुनाव से पहले देखा था पार्षद पद के लिए महिला उम्मीदवारों ने पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और रिश्तेदारों के साथ जोर-शोर से प्रचार प्रसार किया था और चुनाव जीतने के बाद विजय जूलुस में भी शामिल हुईं थीं लेकिन उसके बाद पिछले पांच वर्षों तक मतदाताओं ने महिला पार्षदों की शक्ल तक नहीं देखी। किसी काम के लिए फोन करो तो उनके पति, पुत्र या पुरुष प्रतिनिधि से ही बात होती थी। वे ही फॉर्म अंदर ले जाकर साइन करवा कर और मोहर लगवा कर लाकर देते थे।

आज महिलाएं सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है तो फिर स्थानीय शासन व्यवस्था में महिलाओं को आगे क्यों नहीं बढ़ने दिया जा रहा? क्यों पुरुष उनके प्रतिनिधि बनते हैं? हम चयन करते हैं जन प्रतिनिधि (सरपंच, पार्षद) का न कि उनके प्रतिनिधि (सरपंच प्रतिनिधि, पार्षद प्रतिनिधि) का। फिर हमें ये शब्द क्यों सुनाई देते हैं या इनकी ही क्यों चलती है? आखिर इसके पीछे कारण क्या हो सकता है? विश्लेषण करेंगे तो कई कारण सामने आएंगे जिनमें प्रमुख हैं – पुरुष प्रधान व्यवस्था, पारिवारिक और सामाजिक दबाव, शिक्षा का अभाव, शासन का अनुभव नहीं होना, नेतृत्व प्रशिक्षण का अभाव आदि कुछ कारण हैं जिससे महिलाओं को कठिनाई होती है, ऐसे में पति या अन्य पुरुष रिश्तेदार मौके का फायदा उठाकर प्रवेश कर जाते हैं। ऐसा करना गैर कानूनी तथा लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ है। हालांकि इस संबंध में कानूनी प्रावधानों तथा सरकार के आदेशों के अनुसार स्पष्ट किया गया है कि पार्षद, अध्यक्ष प्रतिदिन कार्यालय समय में कार्यालय में उपस्थित रहेंगे।

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक आरक्षण लागू है। लेकिन देखने में आ रहा है नगर निकाय में आज भी चुनकर आई महिला पार्षदों के स्थान पर उनके पति पुत्र भाई एवं अन्य रिश्तेदार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। निगम में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण निश्चित है लेकिन देखने में आता है कि उन महिला पार्षदों के स्थान पर उनका कामकाज उनके पिता, ससुर, पति, जेठ, देवर, भाई, पुत्र या अन्य पुरुष रिश्तेदार संभालते हैं। हालांकि वैधानिक रूप से तो यही नियम है कि काम कज संचालन के दौरान बैठक समेत अन्य कार्यों में महिला पदाधिकारी के कोई भी सगे संबंधी रिश्तेदार भाग नहीं लेंगे और न हीं कोई हस्तक्षेप या दखलंदाजी करेंगे, पर फिर भी देखने को मिलता है। ये प्रतिनिधि पालिका में बैठकर न केवल जन समस्याओं को सुनते हैं बल्कि अधिकारियों को दिशा निर्देश देते हैं, कार्य में हस्तक्षेप करते हैं और सभासदों और ठेकेदारों से वार्ता कर नगर पालिका को चलाते हैं। इससे गोपनीयता भी भंग होती है।

प्रतिनिधि के नाम पर पति या अन्य रिश्तेदार का कुर्सी पर बैठना गैर कानूनी होता है। भारत के संविधान, कानून और पंचायती राज नियमों में प्रतिनिधि पति या अन्य रिश्तेदार जैसा कोई पद नहीं होता और ना ही उन्हें बैठने का अधिकार होता है। पार्षद हो चाहे अध्यक्ष नगर पालिका अधिनियम 1916 के आधार पर प्रतिनिधि नामित करने का अधिकार नहीं होता है तो आखिर नियम कानून से ऊपर उठकर प्रतिनिधि क्यों और किस आधार पर नामित किया जाता है? 73वें संविधान संशोधन के जरिए हर समाज के लोगों को प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला जिसमें महिलाओं को भी जनप्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त हुआ, लेकिन पितृससत्ता के सामने संविधान संशोधन में अधिकार होने के बाद भी इस हक वंचित वंचित हैं। देश के समग्र विकास में महिलाओं की भागीदारी की बात तो स्वीकार की जाती थी, लेकिन जब उनके अधिकार की बात आती तो उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता था और शायद आज भी कहीं ऐसी ही मानसिकता हावी है। ऐसे में महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण के सारे सपना ध्वस्त से होते प्रतीत हो रहे हैं। लोकतांत्रिक और कानूनी दृष्टिकोण से पार्षद या सरपंच प्रतिनिधि जैसी प्रथा बिल्कुल भी उचित नहीं है। यह प्रथा भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं को मिलने वाले आरक्षण के उद्देश्य को कमजोर करती है। इससे महिला सशक्तिकरण का असली उद्देश्य खत्म हो जाता है।वास्तविक जनप्रतिनिधि की जगह अनाधिकृत व्यक्ति के दखल से भ्रष्टाचार और पक्षपात बढ़ता है। यह जनता के भरोसे और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के साथ धोखा है। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदल रही हैं लेकिन अभी तक पूर्णतया नहीं बदली हैं।
इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आज भी देश के पुरुष नेता राजनीति पर अपना कब्जा छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। प्रतिनिधि के नाम पर पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों का कुर्सी पर बैठना गैरकानूनी है।

महिलाओं को इस भ्रांति से बाहर निकलना होगा कि वे कमजोर हैं या कुछ नहीं कर सकती। महिलाओं की सक्रिय भूमिका से निश्चित ही टिकाऊ विकास संभव है। स्थानीय शासन में महिला प्रतिनिधियों के प्रभाव से जुड़ी रिसर्च के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिला राजनीतिक प्रतिनिधियों ने बेहतर काम किया है और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के उद्देश्य को सही मायनों में पूरा करते हुए जमीनी स्तर पर टिकाऊ और स्थाई विकास को सशक्त किया है। हां आज आवश्यकता है महिला प्रतिनिधियों के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की योजनाएं शुरू करने की। जब तक महिला सशक्तिकरण नहीं होगा, विकसित भारत संभव नहीं हो सकता।

राजस्थान में निकाय चुनाव हेतु नामांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जिन लोगों को अपना नाम वापस लेना था ले चुके। किस वार्ड में कितने प्रत्याशी हैं, अब मैदान में स्थिति साफ है। प्रत्याशियों का प्रचार चरम स्तर पर है। अब जो अहम काम करना है मतदाताओं को करना है। उन्हें अपना सबसे अच्छा, समझदार, ईमानदार, कार्य करवाने में सक्षम, व्यवहार कुशल प्रतिनिधि चुनना है। जनता को ऐसा प्रतिनिधि चुनना है जो वास्तव में जनता का ही प्रतिनिधि हो। जिसे लोग जनता के प्रतिनिधि (जनप्रतिनिधि) के नाम से ही जाने न कि प्रतिनिधि के प्रतिनिधि (पार्षद प्रतिनिधि) के रूप में किसी अन्य को जाने। ऐसे प्रत्याशी को नहीं चुनना है जो जीतने के बाद सिर्फ बोर्ड की मीटिंग में तो निगम, पालिका के कार्यालय जाए (क्योंकि वह मजबूरी होती है), पर बाकी दिनों में पांच साल तक उसके स्थान पर पिता, ससुर, पति, पुत्र, जेठ, देवर, भाई या अन्य पारिवारिक जन प्रतिनिधि (पार्षद प्रतिनिधि) के रूप में जाए। जनता ने जिसे चुना है वही जनप्रतिनिधि है, पार्षद प्रतिनिधि जनप्रतिनिधि नहीं हो सकता।

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