सकारात्मक सोच भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है

ram

बाल मुकुन्द ओझा
देश में हर साल 13 सितम्बर को सकारात्मक सोच दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य जीवन में सकारात्मक सोच के महत्व को उजागर करना है। सकारात्मक सोच न केवल हमारे मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करती है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और रिश्तों में भी सकारात्मक ऊर्जा लाती है। यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि सकारात्मक दृष्टिकोण से हर कठिनाई अवसर में बदल सकती है और जीवन अधिक खुशहाल और संतुलित बन सकता है। हमारी पहचान सिर्फ उसके कामों से नहीं, बल्कि अच्छी सोच से भी होती है। अच्छी सोच और विचार किसी भी व्यक्ति के जीवन को सफल, सुखद और शांतिपूर्ण बना सकते हैं। सकारात्मकता का जिंदगी में बहुत महत्त्व है। जिसने जीवन में सहन करना सीख लिया वह जिंदगी की हर जंग जीत सकता है। सकारात्मकता या सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है। सकारात्मक सोच का शब्दिक अर्थ है, शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सकारात्मकता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। अगर हम अपनी जिंदगी में सकारात्मक बने रहना सीख लें, तो बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ भी हमें हरा नहीं सकतीं। जब हम कुछ अच्छा देखने की कोशिश करेंगे, तो हमारी सोच सकारात्मक बनेगी। सकारात्मकता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को दम्भी या अहंकारी बनाती है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहनशीलता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए सकारात्मक सोच होना आवश्यक है। सकारात्मक सोच व्यक्ति को मजबूत बनाती है, जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है। सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना।
देश में आज सकारात्मकता, सहिष्णुता और सहनशीलता तार तार हो रही है। हम ने अपने हित साधने के लिए दूसरों को बलि का बकरा बनाना सीख लिया है। यही कारण है की समाज में भाई चारे का स्थान वैमनस्यता ने ले लिया है। यह भी लगता है लोकतंत्र के चारों स्तम्भ सहिष्णुता और असहिष्णुता के सागर में गोते लगा रहे है। लोकतंत्र के चार स्तंभ है, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। इनमें विधायिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता पर सहिष्णुता को तार तार करने के आरोप लगते रहते है मगर अब न्यायपालिका भी इसमें शामिल हो गई है।
भारत में प्राचीन काल में वैदिक परम्परा का बहुत अधिक प्रभाव था। मध्यकाल आते-आते समाज में वर्ण व्यवस्था हावी हो गई। इसके साथ ही सम्पूर्ण समाज जातियों और वर्गों में विभाजित हो गया। अंधविश्वास, सामाजिक कुरीति, जात-पांत, छुआछूत, ऊँच-नीच के साथ महिला और पुरूष के मध्य भेदभाव का बोलबाला हो गया। समाज और राष्ट्र रूढ़िवादिता में फंस गया। चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी को समाज सुधार की दिशा में अग्रणी माना गया है। इस अवधि में समाज सुधार आंदोलन फैला और सामाजिक बुराइयों को चुनौती मिली। समाज सुधार के इस आंदोलन का नेतृत्व संतों और समाज सुधारकों ने किया। इन सन्तों ने जाति प्रथा, धार्मिक कट्टरता और अंध विश्वास के विरूद्ध लोगों में चेतना के बीज बोये। संतों ने समाज में बराबरी, समता, भाईचारे और प्रेम का सन्देश फैलाया। आपसी कटुता और बैरभाव के विरूद्ध लोगों को चेताया। संत कबीरदास से लेकर गुरू नानक, रैदास और सुन्दरलाल आदि संतों ने समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों।
सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है। मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हम बड़ी बड़ी बातें सहनशीलता की अवश्य करते है मगर उस पर अमल नहीं करते। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कथनी और करनी के भेद को मिटाकर सही मायनों में सहिष्णुता को अपनाएं तभी देश और समाज को आगे बढ़ा पाएंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *