गणेश उत्सव के पावन पर्व पर हम भगवान श्री गणेश की तरह-तरह से वंदना करते हैं। कहीं सुंदर प्रतिमा स्थापित होती है, कहीं पूजा-पाठ और आरती होती है, तो कहीं भव्य सजावट और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। निश्चित रूप से यह हमारी श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। लेकिन क्या केवल बाहरी पूजा से ही गणेश जी प्रसन्न हो जाएंगे?
शायद नहीं। सच्ची गणेश उपासना तब होगी, जब हम उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भगवान गणेश को मूलाधार चक्र का अधिष्ठाता माना गया है। मूलाधार शरीर का आधार है। यह हमें स्थिरता, सुरक्षा, धैर्य और जीवन में संतुलन प्रदान करने वाला केंद्र माना जाता है। इसका अर्थ बहुत सरल है, जिस तरह किसी भवन के मजबूत होने के लिए उसकी नींव मजबूत होना जरूरी है, उसी तरह अच्छे जीवन के लिए हमारे विचार, संस्कार और चरित्र की नींव मजबूत होना आवश्यक है।
श्री गणेश का स्वरूप भी हमें जीवन के अनेक रहस्य समझाता है। उनका बड़ा मस्तक हमें बड़ा सोचने की सीख देता है। बड़े कान कहते हैं कि अधिक सुनो और कम बोलो। छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं। लंबी सूंड परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने और छोटी से छोटी बात को समझने की क्षमता का प्रतीक है। उनका विशाल उदर हमें जीवन की अच्छी-बुरी परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक स्वीकार करने की सीख देता है।
गणेश जी के साथ रहने वाला छोटा-सा मूषक भी बहुत बड़ा संदेश देता है। मनुष्य की इच्छाएं भी मूषक की तरह लगातार दौड़ती रहती हैं। यदि इच्छाओं पर नियंत्रण न हो तो वे हमें इधर-उधर भटकाती रहती हैं। गणेश जी का मूषक पर विराजमान होना मानो यह बताता है कि इच्छाएं हमारे ऊपर शासन न करें, बल्कि हमारा विवेक उन पर शासन करे।
आज का आधुनिक जीवन सुविधाओं से भर गया है, लेकिन मन की स्थिरता कम होती जा रही है। हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन विवेक कम होता जा रहा है। बोलने वाले बहुत हैं, सुनने वाले कम। इच्छाएं बढ़ रही हैं और संतोष घट रहा है। ऐसे समय में गणेश जी की उपासना हमें अपने भीतर लौटने का अवसर देती है।
गणेश उत्सव केवल दस दिनों तक प्रतिमा के सामने दीप जलाने का पर्व नहीं होना चाहिए। यह अपने भीतर के अंधकार को हटाने का संकल्प भी बने। हम अपने भीतर की जिद को थोड़ा कम करें, क्रोध पर थोड़ा नियंत्रण रखें, दूसरों की बात सुनें, माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान करें, बच्चों को संस्कार दें और अपने आचरण में ईमानदारी लाएं।
विघ्नहर्ता गणेश से केवल अपने रास्ते के विघ्न हटाने की प्रार्थना न करें, बल्कि यह भी प्रार्थना करें कि हमारे भीतर ऐसे विचार ही पैदा न हों जो किसी दूसरे के जीवन में विघ्न बन जाएं। यही गणेश जी की सच्ची वंदना होगी।
इस गणेश उत्सव पर घर-घर प्रतिमा आए, दीप जले, आरती हो और उत्सव मनाया जाए,लेकिन साथ ही हमारे भीतर भी बुद्धि, विवेक, पवित्रता, धैर्य, संयम और संस्कार का गणेश जागे।
क्योंकि गणेश जी को प्रसन्न करने का सबसे सुंदर मार्ग बाहर से अधिक अपने भीतर गणेशत्व को जगाना है।गणपति बप्पा मोरया!

गणेश उत्सव : मूलाधार से आत्मचेतना तक गणेशतत्व की यात्रा
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