मायावती चुनावी रेस से बाहर : मुकाबला भाजपा और सपा में ही होगा

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बाल मुकुन्द ओझा
बसपा सुप्रीमो और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती इन दिनों फिर चर्चा में है। कभी यूपी जैसे देश के सबसे बड़े प्रदेश पर एक छत्र राज करने वाली बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती आजकल अजीब उधेड़बुन की शिकार है। मायावती और उनकी पार्टी बसपा लगातार अपनी साख खोती जा रही है। पारिवारिक कलह भी खुलकर सामने आ रही है। अपने भतीजे आकाश आनद को कभी पार्टी में बाहर और फिर अंदर लेने की कहानी का पटाक्षेप अभी चक्रव्यूह में फंसा था कि इसी बीच मायावती ने एक बार अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया है। इससे पहले मायावती ने आकाश आनंद के ससुर और पार्टी के दिग्गज नेता अशोक सिद्धार्थ को राजनीतिक संन्यास लेकर दामाद के राजनीतिक भविष्य को बचाने की नसीहत दी थी। अशोक सिद्धार्थ ने राजनीतिक संन्यास का ऐलान किया, लेकिन दो घंटे बाद ही मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से मुक्त कर दिया। आकाश आनंद अब अपना स्वतंत्र भविष्य तलाश रहे है।
यूपी का चुनाव अगले कुछ महीनों में होने जा रहा है। आरोप प्रत्यारोप से प्रदेश की सियासत गरमाई हुई है। बसपा चुनावी सियासत से लगभग बाहर हो चुकी है। लगता है देश के सबसे बड़े और प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सियासत अब भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच ही सिकुड़ती जा रही है। कांग्रेस के बाद बसपा भी अंतिम सांसे लेने की स्थिति में पहुँच गई है। यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव के नगाड़े बजने शुरू हो चुके है। सियासी पार्टियां अपने वोटों को लामबंद करने में जुट गई है। वहीँ बसपा से रहे सही नेता जिस प्रकार पार्टी से बाहर किये जा रहे है उससे पार्टी पर अस्तित्व के संकट मंडराने लगे है। कभी यूपी की सियासत में मायावती की तूती बोलती थी। बसपा के किसी भी नेता को मायावती के बराबर बैठने की अनुमति नहीं थी। धीरे धीरे पार्टी के नेता बसपा को छोड़ते गए। आज बसपा का कोई प्रतिनिधित्व विधान सभा और संसद में नहीं है। मायावती के पारंपरिक वोटर्स अब बंट चुके हैं। प्रतिद्वंदियों की तुलना में कार्यकर्ता कम हैं और जो हैं भी वे शिथिल पड़ चुके हैं।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी। यह किसी गठबंधन में शामिल नहीं होंगी। यूपी सहित देशभर में बसपा के वोट बैंक में लगातार गिरावट आई है। यूपी में बसपा की कमजोर स्थिति किसी से छिपी नहीं है। मायावती इस समय एकला चलो की राह पर है। विपक्ष में होते हुए भी वह विपक्षी गठबंधन इंडिया में शामिल नहीं हुई है। एनडीए या इंडिया गठबंधन में शामिल होने के सवाल को बसपा प्रमुख मायावती ने कई बार सिरे से खारिज किया है। देश के उत्तर भारत में बसपा दलितों पर कुछ हद तक अपना प्रभाव रखती है। विशेषकर यूपी में दलितों के एक वर्ग विशेष सहित अल्पसंख्यक मतदाता मायावती को अपना नेता स्वीकार करते है। मगर पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा का सफाया हो गया।
वह भी एक समय था जब मायावती का समर्थन पाने के लिए लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में होड़ मची थी। भाजपा हो या समाजवादी पार्टी अथवा कांग्रेस मायावती का समर्थन पाने के लिए सभी बेचैन रहते थे। उस दौरान बहनजी किसी को भाव नहीं देती थी। यदि किसी को समर्थन देती तो अपनी शर्तों पर। उनके दरवाज़े पर विभिन्न विचारधारा वाले नेताओं की क़तार देखी जा सकती थी। यूपी विधानसभा चुनाव में बहनजी की पार्टी का भट्टा बैठ गया था और उनके अस्तित्व पर सवालिया चिन्ह लगने लगे थे। विभिन्न चुनावी सर्वेक्षणों में भी बसपा की हालत काफी कमजोर आंकी जा रही है। बसपा इस समय किसी गठबंधन में शामिल नहीं है जबकि कहा जा रहा है इंडिया और एनडीए दोनों गठबंधन बसपा को अपने समूह में शामिल करना चाहते है। मायावती ने दोनों से अलग रहने का फैसला किया है। मायावती की पार्टी कोई आंदोलनकारी पार्टी नहीं है। इस पार्टी को कभी किसी मुद्दे पर धरना प्रदर्शन करते नहीं देखा गया। बसपा केवल बयानों तक सीमित रहती है। बसपा की पहचान केवल जातीय पार्टी की है। मुस्लिमों के साथ साथ दलित भी उनकी पार्टी से अलग हो गए है। मुस्लिमों का झुकाव सपा की तरफ और दलित भाजपा की झोली में चले गए है। मायावती की हार को दलित राजनीति की धार कमज़ोर होने के तौर पर भी देखा जा रहा है। गत यूपी चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट पर सिमट गई है और दलित और मुस्लिम गठजोड़ तिनके की तरह बिखर गया। अब अंतिम आशा 2027 के चुनाव पर टिक्की है। इस चुनाव में बसपा का सफाया हो गया तो पार्टी इतिहास के पन्नों में अंकित होकर रह जाएगी।

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