बाल मुकुन्द ओझा
कोचिंग संस्थानों की दुरावस्था के बाद अब पीजी हॉस्टल मौत के कुएं बन रहे है। देश की राजधानी दिल्ली में एक पीजी हॉस्टल ने देशवासियों का ध्यान खिंचा है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते खतरनाक पीजी भरे पड़े हैं। तीन-चार फीट चौड़ी सड़कें, कहीं-कहीं तो 7-8 मंजिलों वाली इमारतें, यहां मौत का तांडव कभी भी हो सकता है। ये जगहें खासतौर पर छात्रों को किराये पर दी जाती है। जहां-जहां अस्पताल हैं, उनके आसपास मरीजों के रिश्तेदारों के लिए गेस्ट हाउस बना दिए गए हैं, जिनके चारों तरफ केमिस्ट की दुकानें और diagnostic centres मिलेंगे। जहां छात्रों के पीजी और मरीज़ों के रिश्तेदारों के गेस्ट हाउस होते हैं, वहां ढाबे, दुकानें खुल जाती हैं। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में पिछले चार साल में ऐसे 133 हादसे हुए, 1133 इमारतें गिरी, 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है लेकिन हर बार कुछ अफसरों का निलम्बन और जांच का ऐलान होता है। लेकिन अवैध इमारतें बनती रहती हैं। देर सबेर ही सही अब दिल्ली सरकार भी चेती है। दिल्ली सरकार शहर में ‘पेइंग गेस्ट’ (पीजी) आवास और कोचिंग संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए डेढ़ महीने में एक व्यापक नीति और वेब पोर्टल तैयार करेगी। नीति को अंतिम रूप देने से पहले सरकार पीजी प्रबंधन, माता-पिता, एजेंसियों, छात्र संगठनों और पानी तथा बिजली से जुड़े विभागों समेत विभिन्न संबंधित पक्षों की राय लेगी।
देशभर में हज़ारों पी जी हॉस्टल और कोचिंग सेंटरों में न तो पर्याप्त अग्निशमन की व्यवस्था है और ना ही दूसरी सुविधाएं। विभिन्न गली मुहल्लों में कई मंजिलों में ऐसे हॉस्टल चल रहे है। ऐसे हॉस्टलों के संचालकों को न तो छात्रों की चिंता है और ना ही अधिकारियों का भय। इन हॉस्टलों के पास अच्छे उपस्कर, स्वच्छ वातावरण, अग्निशमन की व्यवस्था, आकस्मिक चिकित्सा और पार्किंग सहित अन्य सुविधाएं भी नहीं है। सैंकड़ों स्थल बिना इज़ाज़त चल रहे है। इन हॉस्टलों में एक के बाद एक मंजिल बनाकर छात्रों को दी जा रही है। बहुत सी जर्जर अवस्था में है। इन स्थलों की बदहाली के लिए संचालकों के साथ अभिभावक भी जिम्मेदार है। अपने खून पसीने की कमाई से माँ बाप अपने बेटे बेटी का भविष्य सँवारने का कार्य करते है। हॉस्टल में भर्ती करने से पहले उसकी सुख सुविधा को भी देखा जाना चाहिए, यह भी देखा जाना चाहिए की भवन निर्माण की दृष्टि से ठीक है या नहीं। बिजली व्यवस्था कैसी है। भवन के ऊपरी स्थल तक सुविधा पूर्वक जाया जा सकता है या नहीं। सब से महत्त्वपूर्ण यह है आपात स्थिति में बच्चों के बाहर निकलने की व्यवस्था कैसी है। जब आप पूरी तरह संतुष्ट हो जावे तभी अपने बच्चे को PG में भेजे। केवल पढाई को ही नहीं देखे साथ में अन्य व्यवस्थाओं का जायजा लेना जरुरी है ताकि दिल्ली जैसी दुखांतिका को रोका जा सके।
कोचिंग संस्थानों और होटलों ने लोगों का सुख चैन छीन लिया है। बिना किसी अत्यावश्यक सुविधा के चलने वाला यह व्यवसाय जिस प्रकार संचालित हो रहा है वह शासन प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण है। लगता है किसी को कोई धंधा नहीं मिले तो ये धंधे तो लाभकारी है ही। इसके लिए किसी की मंजूरी की जरुरत नहीं है। बस सम्बद्ध अधिकारियों की मुट्ठी गरम करो और फिर किसी कानून कायदे की जरुरत नहीं है। इनका लम्बा जाल फेल गया है। रिहायसी इलाकों में जहाँ देखो आपको कोचिंग और पीजी हॉस्टल देखने को मिल जायेंगे। बड़ी संख्या में छात्र इन दोनों के इर्द गिर्द देखे जा सकते है। हालत तो यह है यहाँ बच्चों की सुरक्षा की किसी को कोई परवाह नही है। यहाँ तक की अभिभावक भी बेपरवाह है। फायर सिस्टम कहीं नहीं है। दिल्ली दुखांतिका हमारे सामने है जहाँ बिना सुरक्षा इंतजामों के निरीह बच्चों को अकाल मोत का शिकार होना पड़ा ,कमोवेश यही स्थिति अन्य राज्यों की है जहाँ गली गली और सडकों पर हॉस्टल और कोचिंग खुल गए है। पार्किंग भी कहीं नहीं है और हर समय दुर्घटना का आदेश बना रहता है। सीलन भरे कमरों में न ही ढंग से रोशनी का इंतजाम है, न पानी और साफसफाई का। खाने पीने की व्यवस्था काफी लचर है। बिजली और फायर इंतजाम भी माकूल नहीं है। भयंकर गर्मी के दौरान हर समय दुर्घटना का अंदेशा बना रहता है। बताया जा रहा है इन भवनों में हर नियम का उल्लंघन होता है, कभी भी आग लग सकती है, पानी भर सकता है, इमारत गिर सकती है। हादसा हो जाए तो न फायर ब्रिगेड पहुंच पाएगी, न एम्बुलेंस। ये धंधा बड़े आराम से चलता है, क्योंकि इसमें स्थानीय नेता, लोकल पुलिस, नगर निगम के अफसर सब मिले होते हैं, मौत के कारोबार की कमाई मिल-बांटकर खाते हैं।

कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते कोचिंग सेंटर और पीजी हॉस्टल
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