बाल मुकुन्द ओझा
कुपोषण के सम्बन्ध में एक हालिया रिपोर्ट में भयावह आंकड़ों का खुलासा हुआ है। देश में बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य को लेकर पोषण ट्रैकर के जुलाई 2026 तक के आंकड़ों में बड़ी तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में 0 से 5 वर्ष तक के 6,69,92,507 बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। इनमें 11 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट, 5 प्रतिशत ओवरवेट, 28 प्रतिशत बच्चों का शारीरिक विकास उम्र के हिसाब से मध्यम या गंभीर रूप से अवरुद्ध और 3 प्रतिशत बच्चे गंभीर या मध्यम तीव्र कुपोषण की श्रेणी में पाए गए। पोषण ट्रैकर एक मोबाइल-आधारित गवर्नेंस एप्लिकेशन है जो पोषण अभियान की डिजिटल रीढ़ है। यह अभियान के तहत डिजिटल निगरानी को मजबूत करने के लिए प्राथमिक शासन उपकरण के रूप में कार्य करता है। बच्चों के विकास को सही मात्रा में पोषण की आवश्यकता होती है। क्योंकि विकास के शुरुआती वर्षों के दौरान, उनके पास कम ऊर्जा भंडार होता है। इसलिए, वे केवल थोड़े समय के लिए ही अपनी भूख का प्रबंधन कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपके बच्चों को तीव्र भूख न लगे, उन्हें उचित अंतराल पर स्वस्थ और संतुलित भोजन खिलाएं।
बजाज फिनसर्व हेल्थ के अनुसार बचपन का पोषण एक निर्णायक कारक है जो वयस्क होने तक और उसके बाद बच्चों के स्वास्थ्य में योगदान देता है। कुपोषण या बच्चों को आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित करने का भी शारीरिक, भावनात्मक और मनोसामाजिक विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। बच्चों को संतुलित आहार खाने और शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करने से उनके विकास को बढ़ावा मिल सकता है।
कुपोषण का अर्थ लंबे समय तक शरीर में पोषक तत्वों की कमी का होना माना जाता है, जिससे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने से बच्चों को आसानी से बीमारी लग जाती है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अुनसार दुनिया भर में करीब 70 करोड़ बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं, जिस कारण वे मानसिक और शारीरिक रूप से ठीक प्रकार से विकसित नहीं हो पाते। हालाकि वैश्विक स्तर पर कुपोषित बच्चों की संख्या में पहले की अपेक्षा कमी आई है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों का कहना है कि तीव्र कुपोषण का सामना कर रहे देश और दुनिया के 15 देशों के पांच वर्ष से कम उम्र के तीन करोड़ से अधिक बच्चों की तुरंत सार संभाल और सुरक्षा के उपाय नहीं किये गए तो बच्चों के विकास और उनके अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। एजेंसियों का कहना है कि संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, कोरोना महामारी के प्रभावों और जीवनयापन की बढ़ती लागतों ने समस्या को विकराल बनाया है। कुपोषण से सर्वाधिक प्रभावित देश हैं, अफगानिस्तान, बुर्किना फासो, चाड, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, इथियोपिया, हैती, केन्या मडागास्कर, माली, नाइजर, नाइजीरिया, सोमालिया, दक्षिण सूडान, सूडान और यमन। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो एक वक्त का खाना नहीं मिल पाने या भोजन में 50 फीसदी से कम पौष्टिक तत्व होने की स्थित को कुपोषण माना जाता है।
आजादी के 80 वर्ष बाद भी देश को भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं से छुटकारा नहीं मिल पाया है। बच्चे, महिलाएं और वंचित समाज के लोग इन समस्याओं का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं। एक तरफ हम खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं। वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है।
एक तरफ देश में भुखमरी है वहीं हर साल सरकार की लापरवाही से लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है। आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।

बच्चों में बढ़ता कुपोषण का खतरा
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