जब मनुष्य भीतर से बहुत दुःखी होता है, लेकिन अपनी पीड़ा किसी से कह नहीं पाता, तब उसके मन में विचारों के तूफान उठते हैं। समुद्र की गहराइयों से बार-बार उठते चक्रवात भी मानो प्रकृति की ऐसी ही अनकही व्यथा का संकेत दे रहे हैं।
कभी-कभी मनुष्य का मौन उसके शब्दों से कहीं अधिक बोलता है। पीड़ा जब बाहर आने का रास्ता नहीं पाती, तो वह भीतर ही भीतर बेचैनी बनकर उमड़ती रहती है। प्रकृति की ओर देखें तो आज कुछ ऐसा ही दृश्य दिखाई देता है। पहले अर्नब और अब मुरासु—लगातार उठते चक्रवातों ने समुद्र की सतह पर ही नहीं, हमारे मन में भी अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मानो सागर अपनी अनकही बेचैनी तूफानों के रूप में व्यक्त कर रहा हो।
निश्चित रूप से चक्रवात प्राकृतिक मौसमी प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। समुद्र का तापमान, वायुमंडलीय दबाव, नमी और हवाओं की दिशा-संरचना इनके बनने और तीव्र होने में भूमिका निभाती है। हर तूफान को सीधे मानवीय गतिविधियों का परिणाम कहना उचित नहीं, लेकिन बढ़ते समुद्री तापमान और चरम मौसमी घटनाओं के दौर में इन्हें सामान्य कहकर टालना भी समझदारी नहीं है।
प्रश्न यह है कि प्रकृति के साथ हमने कैसा व्यवहार किया है? यह चेतावनी किसी एक तट की नहीं; हर उस समाज की है जो प्रकृति की सहनशीलता को उसकी असीम क्षमता समझ बैठा है। विकास की दौड़ में हमने यह देखना छोड़ दिया कि हमारी प्रगति की कीमत कौन चुका रहा है। पहाड़ काटे गए, जंगल उजाड़े गए, नदियों के रास्ते रोके गए, आर्द्रभूमियाँ पाट दी गईं और समुद्रों में प्लास्टिक तथा औद्योगिक कचरा पहुँचाया गया। प्रकृति को संसाधन समझा, अपना संबंध नहीं।
उपयोग और दोहन में अंतर है। उपयोग आवश्यकता पूरी करता है, जबकि अंधाधुंध दोहन आने वाली पीढ़ियों का हिस्सा भी आज खर्च कर डालता है। सड़क बनाते समय विकास के नाम पर जब पेड़ों की कतारें मिटा दी जाती हैं, जब नदियों को नालों में बदल दिया जाता है, जब भूजल को इस तरह निकाला जाता है मानो उसका भंडार कभी समाप्त ही नहीं होगा, तब हम केवल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाते; अपने ही जीवन की बुनियाद कमजोर करते हैं।
समुद्र भी हमारी इस लापरवाही से अछूता नहीं है। तटीय क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण, मैंग्रोव वनों का विनाश, समुद्री प्रदूषण और प्राकृतिक तटों में बदलाव समुद्री पारिस्थितिकी को कमजोर करते हैं। मैंग्रोव केवल पेड़ नहीं, समुद्र और धरती के बीच खड़ी जीवनरक्षक ढाल हैं। वे तूफानी लहरों की मार घटाने, तटों को थामने और अनेक जीवों को आश्रय देने में मदद करते हैं। इन्हें काटकर हम सुरक्षा की प्राकृतिक दीवार गिरा देते हैं और बाद में लहरें घरों तक पहुँचें तो उसे केवल आपदा कहते हैं।
हर आपदा प्रकृति का दंड नहीं; प्रकृति प्रतिशोध नहीं लेती। लेकिन उसके संतुलन की अपनी सीमाएँ हैं। हम उन सीमाओं की अनदेखी करते हैं तो उसका असर बाढ़, सूखा, असहनीय गर्मी, अनियमित वर्षा, भूस्खलन और समुद्री तूफानों के रूप में हमारे सामने आता है। नुकसान सबसे अधिक उन लोगों को झेलना पड़ता है जिनका जीवन प्रकृति के सबसे निकट है, मछुआरे, किसान, तटीय बस्तियों के परिवार और रोज कमाकर खाने वाले श्रमिक। किसी की छत उड़ती है, नाव टूटती है, फसल डूबती है और बच्चे की किताबें पानी में बह जाती हैं। आँकड़ों के पीछे ऐसी अनगिनत पीड़ाएँ होती हैं।
हम अक्सर तूफान के गुजर जाने के बाद राहत, मुआवजे और पुनर्निर्माण की चर्चा करते हैं। यह जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि हम उन कारणों पर विचार करें जो जोखिम बढ़ाते हैं। वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना, तटीय नियोजन को प्रकृति के अनुरूप बनाना, मैंग्रोव और आर्द्रभूमियों की रक्षा करना, उत्सर्जन घटाना और आपदा से पहले सुरक्षित निकासी की तैयारी करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। ऊँची इमारतें नहीं, प्रकृति के साथ संतुलन स्थायी सुरक्षा दे सकता है।
इस बदलाव की शुरुआत बड़े मंचों से नहीं, हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से भी हो सकती है। पानी बचाना, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना, एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचना, पेड़ लगाकर उनकी देखभाल करना, स्थानीय जलस्रोतों को बचाना और अनावश्यक उपभोग कम करना छोटे कदम लग सकते हैं, लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में यही कदम बड़ा परिवर्तन बनते हैं। सरकारों और उद्योगों को नीतियों, निर्माण और उत्पादन में पर्यावरणीय सीमाओं का सम्मान करना होगा।
अर्नब और मुरासु के बीच का छोटा-सा अंतराल हमें ठहरकर सोचने का अवसर देता है। समुद्र की हर उठती लहर को संदेश मान लेना विज्ञान नहीं, लेकिन समुद्र के बदलते व्यवहार से उठे सवालों को अनसुना करना भी विवेक नहीं। शायद प्रकृति हमें कोई शब्दों वाला संदेश नहीं दे रही, वह अपने बदलते संकेतों के माध्यम से हमारी ही बनाई परिस्थितियों का आईना दिखा रही है। शांत समुद्र यह भ्रम न दे कि सब पहले जैसा हो गया; उजड़े घर और डूबी आजीविकाएँ लंबे समय तक तूफान की कहानी कहती हैं।
मनुष्य जब किसी अपने की पीड़ा नहीं समझता, तो रिश्तों में दूरी बढ़ती है। प्रकृति की पीड़ा को अनदेखा करेंगे तो हमारा अपना भविष्य हमसे दूर होता जाएगा। धरती साझा घर है, जीतने की वस्तु नहीं; समुद्र जीवंत पारिस्थितिकी है, असीम भंडार नहीं। विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो जीवन को बचाए, जीवन के आधार को नष्ट करके उपलब्धियाँ न गिने।
शायद अब समय आ गया है कि हम समुद्र के शोर में छिपे अपने प्रश्न सुनें। प्रकृति को बोलने के लिए तूफानों की जरूरत न पड़े, इसके लिए हमें उसके मौन संकेत समझने होंगे। क्योंकि जब संतुलन टूटता है, तो उसकी कीमत केवल जंगल, नदियाँ या समुद्र नहीं चुकाते, अंततः मनुष्य भी चुकाता है।

जब प्रकृति की पीड़ा तूफान बनकर उठती है…
ram


