-सुनील कुमार महला
प्रतिवर्ष 28 जुलाई को जैव विविधता के संरक्षण, विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित किए जाने,पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की रक्षा करने के क्रम में विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया जाता है। आज विकास की होड़ में जगह-जगह कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन किया जा रहा है। मानव अपने स्वार्थ और लालच के चक्कर में प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना भूल सा गया है और प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जंगल कम होते चले जा रहे हैं और जलवायु परिवर्तन हो रहा है। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं। हमें यह याद रखना चाहिए कि पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन जैसे जल, वन, मिट्टी, वायु, वन्यजीव और जैव विविधता आदि सीमित हैं तथा इनके संरक्षण के बिना मानव जीवन और सतत विकास संभव नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी और नैतिक कर्तव्य है। आज के समय में अनियंत्रित शहरीकरण, प्लास्टिक प्रदूषण, अंधाधुंध खनन और वनों की कटाई प्रकृति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। वास्तव में प्रकृति केवल हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन नहीं, बल्कि जीवन का मूल आधार है। यदि जंगल, नदियाँ, मिट्टी, वायु और वन्यजीव सुरक्षित रहेंगे, तभी मानव सभ्यता का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जल बचाने, अधिक से अधिक वृक्ष लगाने और उनकी देखभाल करने, प्लास्टिक का कम उपयोग करने तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। प्रकृति का सम्मान और संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे मूल्यवान विरासत है।
बहरहाल, यदि हम यहां पर भारत में वनों की स्थिति की बात करें तो एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार
भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 21.76% भाग वन क्षेत्र है, जबकि वृक्ष आवरण लगभग 3.41% है। दोनों को मिलाकर वन एवं वृक्ष आवरण लगभग 25.17% है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज देश में विकास परियोजनाओं, सड़क एवं रेल निर्माण, खनन, शहरीकरण और अवैध कटाई के कारण कई क्षेत्रों में वनों पर दबाव बढ़ रहा है।वनों की कटाई से जैव विविधता घटती है, वन्यजीवों के आवास नष्ट होते हैं, मिट्टी का कटाव बढ़ता है और जलवायु परिवर्तन की समस्या गंभीर होती है।
आज प्रकृति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती प्लास्टिक प्रदूषण की है। यदि हम यहां पर आंकड़ों की बात करें तो जानकारी मिलती है कि दुनिया में हर वर्ष 400 मिलियन टन (40 करोड़ टन) से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसका बड़ा हिस्सा कचरे के रूप में पर्यावरण में पहुँच जाता है।यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो 2050 तक गलत तरीके से प्रबंधित (mismanaged) प्लास्टिक कचरा लगभग दोगुना होकर 12.1 करोड़ टन प्रति वर्ष तक पहुँच सकता है। भारत में भी प्लास्टिक प्रदूषण पर्यावरण के समक्ष एक बहुत ही गंभीर व बड़ी चुनौती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2022–23 के दौरान लगभग 41.36 लाख टन (4.14 मिलियन टन) प्लास्टिक कचरा दर्ज किया गया। यह बहुत ही संवेदनशील है कि भारत से हर वर्ष लगभग 93 लाख टन (9.3 मिलियन टन) प्लास्टिक पर्यावरण में उत्सर्जित होता है, जो वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण का लगभग 20% है।
इतना ही नहीं,आज एआइ व इलैक्ट्रिक व्हीकल का दौर है।एआई और इलेक्ट्रिक व्हीकल के दौर में भी प्रदूषण की चुनौती बहुत बड़ी है। एआई के लिए विशाल डेटा सेंटरों को भारी मात्रा में बिजली और पानी की आवश्यकता होती है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों के निर्माण के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों का बड़े पैमाने पर खनन किया जाता है, जिससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ता है। यदि इन बैटरियों का वैज्ञानिक ढंग से पुनर्चक्रण (रि-साइक्ल) न किया जाए, तो वे भविष्य में नए प्रकार के प्रदूषण का कारण बन सकती हैं।
ऐसे में आज जरूरत इस बात है कि हम धरती पर से सबसे पहले प्लास्टिक प्रदूषण को कम करें। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करें। इतना ही नहीं, हरित ऊर्जा आज केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि मानवता की आवश्यकता बन चुकी है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधनों के सीमित भंडार को देखते हुए सौर, पवन, जल और जैव ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाना समय की मांग है। हरित ऊर्जा न केवल कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण को कम करती है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूत बनाती है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित पृथ्वी देनी है, तो हरित ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना और ऊर्जा की बचत को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।
अंत में यही कहूंगा कि प्रकृति संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सक्रिय व सामूहिक भागीदारी से ही संभव है। इसके लिए अधिक से अधिक वृक्ष लगाना और उनका संरक्षण करना, जल एवं ऊर्जा की बचत करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, कचरे का पृथक्करण और पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) अपनाना, जैव विविधता और वन्यजीवों की रक्षा करना तथा पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देना आवश्यक है। जब विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित होगा तथा प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति को अपना दायित्व समझेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, हरित और सुरक्षित पृथ्वी सुनिश्चित की जा सकेगी।



