बाल मुकुन्द ओझा
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद काँकरोच जनता पार्टी का आंदोलन मीडिया के सम्बन्ध में कई प्रश्न अनुत्तरित छोड़ गया। विशेषकर न्यूज़ चैनलों के कवरेज और उसके कुछ एंकरों और पत्रकारों की पिटाई और धक्कामुक्की के बारे में। सोशल मीडिया भी टीवी पत्रकारों पर अश्लील और अभद्र टिप्पणियों से भरा पड़ा है। देश में इस समय कुकुरमुत्तों की तरह न्यूज़ चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। इन चैनलों पर प्रतिदिन देश में घटित मुख्य घटनाओं और नेताओं की बयानबाजी पर टीका टिप्पणियों को देखा और सुना जा सकता है। हम बात कर रहे है काँकरोच जनता पार्टी के बैनर के तले चल रहे नीट पेपर लीक के आंदोलन की। देश की राजधानी के जंतर मंतर पर यह आंदोलन कई दिनों से चल रहा था। आंदोलन के संसद के घेराव के दौरान लाठी भाटी जंग हुआ। इस जंग में छात्रों सहित अनेक पुलिस वाले चोटिल हुए। आंदोलन की कवरेज के दौरान न्यूज़ चैनलों के पत्रकार भी मार पीट के शिकार हुए। छात्रों ने आरोप लगाया न्यूज़ चैनलों ने निष्पक्ष कवरेज नहीं किया। आंदोलनकारियों ने गोदी मीडिया के नारे भी लगाए। यहां सवाल यह पैदा होता है कि कवरेज लेकर यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई जिसके कारण न्यूज़ चैनलों और आंदोलनकारियों के मध्य अविश्वास की स्थिति पैदा हुई। सोशल मीडिया पर न्यूज़ चैनलों के कवरेज को लेकर अभद्र टीका टिप्पणियां पढ़ने को मिल रही है। कुछ एंकरों को गाली गलोच से भी सम्बोधित किया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है पुलिस ने छात्रों को बुरी तरह लाठियों से पीटा मगर चैनलों ने इसे नहीं दिखाया अपितु पुलिस पर छात्रों द्वारा किये हमले को प्रमुखता से दिखाया। छात्रों का आरोप है उनका प्रदर्शन शांतिपूर्वक था जिसे पुलिस ने भड़काया। हालाँकि कुछ स्वतंत्र रिपोर्टों में इसे ख़ारिज किया गया और कहा गया प्रदर्शन में कुछ अराजक तत्व शामिल हो गए थे और उन्होंने छात्रों को भड़काकर आंदोलन को हिंसक बनाया। इससे स्थिति बिगड़ी जिसके फलस्वरूप पुलिस ने अपना गुस्सा छात्रों पर लाठियां भांज कर निकाला। चूंकि कुछ आंदोलनकारी कतिपय चैनलों से पहले से ही पूर्वाग्रह से पहले से ही पीड़ित थे। इसलिए कवरेज में पुलिस का पक्ष ज्यादा दिखाया गया। हालांकि बाद में चैनलों ने दोनों पक्षों की खबरे प्रमुखता से दिखानी शुरू कर दी। इसीबीच अविश्वास की रेखा बढ़ चुकी थी और इसका खामियाज़ा चैनलों को उठाना पड़ा। लोगों का कहना है न्यूज़ चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में घटनाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश करते है जबकि प्रिंट मीडिया अपनी खबरे बहुत सोच समझ कर प्रकाशित कर रहा है।
युवाओं में डिजिटल की सुविधा है, मगर फेक न्यूज का खतरा भी सबसे ज्यादा वहीं है। एक सर्वे के मुताबिक डिजिटल मीडिया ने मजबूत जगह बना ली है, लेकिन प्रिंट मीडिया की पकड़ अब भी ढीली नहीं हुई है। मीडिया के बदलते स्वरूप के बावजूद आज भी प्रिंट मीडिया की प्रमाणिकता कायम है। युवा अपनी सुविधाओं के लिए डिजिटल उपयोग कर रहे है, जबकि अखबार की प्रमाणिकता आज भी कायम है।
न्यूज़ चैनलों पर इन दिनों जिस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप और नफरती बोल सुने जा रहे है उससे लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ते देखा जा सकता है। बड़े बड़े और धमाकेदार शीर्षकों वाली इन बहसों को सुनकर किसी मारधाड़ वाली फिल्मों की यादें जाग्रत हो उठती है। एंकर भी इनके आगे असहाय नज़र आते है। कई बार छीना झपटी और मारपीट की नौबत आ जाती है। सच तो यह है जब से टीवी न्यूज चैनलों ने हमारी जिंदगी में दखल दिया है तब से हम एक दूसरे के दोस्त कम दुश्मन अधिक बन रहे है। समाज में भाईचारे के स्थान पर घृणा का वातावरण ज्यादा व्याप्त हो रहा है। बहुत से लोगों ने मारधाड़ वाली और डरावनी बहसों को न केवल देखना बंद कर दिया है अपितु टीवी देखने से ही तौबा कर लिया है। लोगों ने एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की ओर लौटना शुरू कर दिया है। प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता अधिक प्रामाणिक समझी जा रही है।
देश में हर तीसरे महीने कहीं न कहीं चुनावी नगाड़े बजने शुरू हो जाते है। चुनावों के आते ही न्यूज़ चैनलों की बांछें खिल जाती है। चुनावों पर गर्मागरम बहस शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों के नुमाइंदे अपने अपने पक्ष में दावे प्रतिदावे शुरू करने लग जाते है। इसी के साथ ऐसे ऐसे आरोप और नफरत पैदा करने वाली दलीले दी जाने लगती है कि कई बार देखने वालों का सिर शर्म से झुक जाता है। यही नहीं देश में दुर्भाग्य से कहीं कोई घटना दुर्घटना घट जाती है तो न्यूज़ चैनलों पर बढ़चढ़कर ऐसी ऐसी बातों की झड़ी लग जाती है जिन पर विश्वास करना नामुमकिन हो जाता है। इसीलिए लोग इलेक्ट्रॉनिक के स्थान पर प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को अधिक प्रमाणिक मानते है। इसी कारण लोगों ने टीवी चैनलों पर होने वाली नफरती बहस को देखनी न केवल बंद कर दी अपितु बहुत से लोगों ने टीवी देखने से ही तौबा कर ली।

डिजिटल मीडिया के दौर में प्रिंट मीडिया की पकड़ ढीली नहीं हुई है
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