भारत के कर प्रशासन के विकास की याद दिलाता है आयकर दिवस

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-बाल मुकुन्द ओझा
आज देश भर में 167वां आयकर दिवस मनाया जा रहा है। यह भारत के वित्तीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह दिवस हर वर्ष 24 जुलाई को मनाया जाता है। आयकर केवल एक राजस्व उपकरण नहीं है अपितु यह एक समृद्ध और स्थिर राष्ट्र की भावना और शक्ति को ऊर्जा देता है। सभी के लिए एक समाज और अवसर का निर्माण करते हुए देश की सामूहिक महत्वाकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। आयकर सरकार के आय के प्रमुख स्रोतों में से एक है, जिसका उपयोग सार्वजनिक सेवाओं को वित्त पोषित करने, सरकारी दायित्वों के भुगतान और नागरिकों को माल और सेवाएं प्रदान करने के लिए किया जाता है।
आयकर दिवस देश के लिए अपनी अपार सेवा के लिए आयकर विभाग की सराहना करने के लिए मनाया जाता है। यह एजेंसी सरकार के लिए राजस्व के स्रोत के रूप में कार्य करती है। ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सरकार को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 24 जुलाई, 1860 को भारत में पहली बार सर जेम्स विल्सन द्वारा आयकर लगाया गया था। इसी को ध्यान में रखते हुए 24 जुलाई को आयकर दिवस मनाया जाता है। यह कर धनवानों, रजवाड़ों और देश में रहने वाले ब्रिटेन के नागरिकों पर लगाया गया था। पहले साल आय कर से सरकारी खजाने को 30 लाख रुपए मिले थे। भारत में 24 जुलाई 1860 को सबसे पहले एक शुल्क के तौर पर आयकर की शुरुआत की गई थी। इसलिए विभाग ने इसी दिन यानि 24 जुलाई को आयकर दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। वर्ष 2010 में पहला आयकर दिवस मनाया गया। आयकर वह कर है जो सरकार लोगों की आय में से लेती है।
ब्रिटिश शासन की ओर से लगाया गया आयकर कानून शक्तिशाली लोगों को पसंद नहीं आ रहा था, इसलिये 1865 में इस कानून को रद्द कर दिया गया था। इसके 2 साल बाद 1867 में इसे कुछ बदलावों के साथ फिर से लागू किया गया। उस समय कर की दरें उस समय के हालातों को देखते हुए तय की जाती थी। ब्रिटेन और रूस के युद्ध के समय जब अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता उत्पन्न हुई तो तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डुफ्रिन ने नया आयकर कानून 1886 पेश किया। यह आधुनिक भारत का पहला व्यापक आयकर कानून था। इससे 1886-87 में 1.36 करोड़ रुपये की राजस्व वसूली हुई थी। इसके बाद 1914-15 में 3.32 लाख आयकर दाता हो गये थे और कर वसूली 3.05 करोड़ रुपये तक पहुँच गई थी।
असहयोग आंदोलन के समय पहली बार वर्ष 1922 में आयकर कानून 1922 बनाया गया। इसी समय आयकर विभाग की विकास की कहानी शुरु हुई। वर्ष 1924 में केन्द्रीय राजस्व बोर्ड के हाथों कर प्रशासन दिया गया। 25 अप्रैल 2941 को आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण अस्तित्व में आया।
देश के विकास में आयकर की बड़ी भूमिका है और आयकरदाता को इस बात का गर्व करना चाहिए कि ये देश उसके पैसे से चल रहा है। टैक्स का लाभ सभी को मिलता है। देश के विकास में 50 प्रतिशत से ज्यादा योगदान आयकर का होता है और ये पैसा देश के स्वास्थ्य, उर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और शिक्षा आदि के विकास पर खर्च होता है। वही गरीबों के लिए संचालित होने वाली अनेक योजनाओं का लाभ निम्न आय वर्ग के लोगों को सुलभ हो जाता है। यह आयकर देने वालों के लिए यह खुश नसीबी है कि उनके टैक्स से समाज का एक बड़ा तबका सामान्य जीवन व्यतीत करता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि करदाता और कर विभाग दोनों की सहभागिता से ही आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो सकता है। मोदी सरकार ने देश में पहली बार आयकर को जनोन्मुखी बनाकर लाखों करदाताओं को राहत प्रदान की। केंद्रीय बजट 2025-26 में करदाताओं के लिए कई राहत उपाय किए गए हैं, जो सरकार के विकास-आधारित दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं। नई कर व्यवस्था के अनुसार, 12 लाख रुपये तक की आय पर कोई आयकर नहीं लगेगा। वेतनभोगी करदाता 75,000 रुपये की मानक कटौती का लाभ लेने के बाद 12.75 लाख रुपये से अधिक की आय पर शून्य कर का भुगतान करेगा। कर छूट को स्लैब दर में कमी के लाभ के साथ जोड़ दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप कोई कर देयता नहीं होगी। इस पहल से, मुख्य रूप से मध्यम वर्ग के लिए, घरेलू खपत, खर्च और निवेश में बढ़ोतरी होगी।

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