सिक्किम हादसा : प्रकृति की चेतावनी या मानवीय लापरवाही ?

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हाल ही में सिक्किम के समरडुंग, नामची जिले में एनएचपीसी की तीस्ता स्टेज-VI जलविद्युत परियोजना के निर्माणाधीन टनल (एडीआइटी-3) में हादसा हो गया। मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 20 जुलाई 2026 को निर्माणाधीन सुरंग के अंदर अचानक मीथेन गैस से जुड़ी घटना (संभावित विस्फोट/दहन) हुई और इसके बाद सुरंग के प्रवेश मार्ग के पास भूस्खलन हुआ, जिससे सुरंग का हिस्सा बंद हो गया और अंदर मौजूद कर्मचारी व अधिकारी फंस गए। बताया जा रहा है कि सुरंग में 40 से अधिक लोग मौजूद थे। इनमें से कुछ लोग समय रहते बाहर निकल आए, लेकिन लगभग 25–27 लोग अंदर फंस गए। जानकारी अनुसार इनमें एनएचपीसी, ठेकेदार कंपनी और मजदूर शामिल थे।
ताज़ा उपलब्ध जानकारी के अनुसार(यह आलेख लिखे जाने तक) 20 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं तथा 2 लोग सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे तथा रिपोर्ट के समय तक 5 लोगों की तलाश जारी थी। प्रारंभिक जांच में माना जा रहा है कि सुरंग में प्राकृतिक रूप से जमा मीथेन गैस को निकालने के प्रयास के दौरान विस्फोट/दहन हुआ, जिससे भूस्खलन हुआ और सुरंग का प्रवेश मार्ग बंद हो गया। हालांकि, अंतिम कारण विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। राहत एवं बचाव कार्य में राज्य पुलिस, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, सेना, आईटीबीपी, दमकल तथा अन्य विशेषज्ञ एजेंसियों को लगाया गया। इधर, मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग और राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर ने भी घटनास्थल का दौरा कर स्थिति की समीक्षा की है। बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि भूस्खलन के कारण इस सुरंग के ढह जाने से कई लोगों की मौत हो जाने की घटना ने पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहाड़ों की पारिस्थितिकी की अनदेखी कर विकास कितना नुकसानदेह हो सकता है, यह अब कोई छिपी बात नहीं है।

हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि हमारे देश में भूस्खलन (लैंडस्लाइड) एक गंभीर प्राकृतिक आपदा बनता जा रहा है। मानसून के दौरान हिमालयी और पश्चिमी घाट के राज्यों में इसकी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल के दिनों में सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर भारत में भारी वर्षा के कारण कई बड़े भूस्खलन हुए हैं। वास्तव में,अत्यधिक वर्षा और बादल फटना, भारत के हिमालयी क्षेत्र का भूकंपीय दृष्टि से अत्यधिक सक्रिय होना, अनियोजित विकास (पेड़ों की अंधाधुंध कटाई,सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और भवन निर्माण के दौरान वैज्ञानिक मानकों की अनदेखी), विकास के नाम पर पहाड़ों का काटा जाना, जलवायु परिवर्तन (अत्यधिक और अल्प अवधि की वर्षा) भूस्खलन के प्रमुख कारणों में से एक हैं तथा जम्मू-कश्मीर,लद्दाख,हिमाचल प्रदेश,उत्तराखंड,सिक्किम,अरुणाचल प्रदेश,नागालैंड,मणिपुर,मिजोरम,मेघालय,दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) तथा पश्चिमी घाट (केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र) हमारे देश में सबसे अधिक भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में से एक हैं। गौरतलब है कि
भारत का लगभग 12.6% भौगोलिक क्षेत्र भूस्खलन के खतरे वाले क्षेत्र में आता है तथा इस क्रम में इसरो (
राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र) ने वर्ष 1998–2022 के दौरान भारत में लगभग 80,000 भूस्खलनों का डेटाबेस तैयार किया है। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र ,इसरो का एक प्रमुख केंद्र है, जिसका मुख्यालय हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित है।

बहरहाल, भूस्खलन का यह हमारे देश में पहला हादसा नहीं है। उत्तराखंड और तेलंगाना में भी ऐसे हादसे हो चुके हैं, लेकिन उनसे कोई सबक नहीं लिया गया। कहना ग़लत नहीं होगा कि हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा हमेशा बना रहता है। ऐसे में यदि सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया, तो यह गंभीर लापरवाही मानी जाएगी। सवाल यह भी उठता है कि बरसात के मौसम में सुरंग निर्माण का काम करते समय आपात स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम पहले से क्यों नहीं किए गए? इस दुर्घटना में जिन श्रमिकों की जान गई, उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या परियोजना से जुड़े अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी?

उक्त क्रम में, विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों में लगातार निर्माण कार्य(विकास) और पेड़ों की कटाई से जमीन कमजोर हो रही है। इसलिए बारिश के समय भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम में कई सुरंगें बन चुकी हैं और कई बन रही हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि निर्माण शुरू करने से पहले पर्यावरण और सुरक्षा से जुड़े जोखिमों का सही आकलन किया जाए। यदि सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन हो, तो कई बड़ी दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण का ध्यान रखते हुए।
अंत में यही कहूंगा कि विकास मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है, लेकिन यदि यह प्रकृति की कीमत पर किया जाए तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आते हैं। अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पर्यावरण असंतुलित होता है, जिससे भूस्खलन, बाढ़, सूखा और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। इसलिए विकास और प्रकृति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मानते हुए ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए जो पर्यावरण संरक्षण और मानवीय प्रगति दोनों को साथ लेकर चलें। यही सतत एवं संतुलित विकास का मार्ग है। यदि हम ऐसा कर सके तो कोई दोराय नहीं कि हम पहाड़, प्रकृति और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकें।

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