बाल मुकुन्द ओझा
अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि दिवस हर साल अक्टूबर माह के दूसरे गुरुवार को मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिवस 8 अक्तूबर को मनाया जा रहा है। इस दिवस की थीम लव योर आइज़ यानी अपनी आंखों का ख्याल रखे रखी गई है। इस दिवस की शुरुआत उन लोगों का समर्थन करने के महत्व को समझने के लिए की गई है जो ठीक से देख नहीं सकते। इस दिन का ध्यान विशेष रूप से इस बात पर केंद्रित है कि ऐसी स्थितियों में लोगों की सहायता के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग ऐसे हैं जो ठीक से देख नहीं सकते हैं क्योंकि उनके पास चश्मे तक पहुँच की सुविधा नहीं है। इनमें से एक अरब लोग निवारण किये जा सकने योग्य दृष्टि दोष से पीड़ित हैं। भारत बहुत बड़ी आबादी वाला एक विशाल देश है। दुनिया में अंधी आबादी में इसका सबसे ज्यादा हिस्सा है अर्थात 15 मिलियन। दुनिया में हर तीन अंधे लोगों में से एक भारत से हैं। इन 15 मिलियन अंधे लोगों में से 3.5 मिलियन के आसपास मामलों में मुख्य कारक कॉर्नियल अँधापन है जो हर साल करीब 30,000 लोगों में अंधेपन को फ़ैलाने के लिए जिम्मेदार है।
बच्चों का स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए और आंखों को सुरक्षित रखने के लिए माता-पिता किन बातों का ध्यान रखें। यह हम सब के लिए जानना जरुरी है। आंखों की देखभाल बाल्यकाल से ही की जानी चाहिए। किसी भी बच्चे की आंखों की पहली बार जांच पांच साल के होने तक हो जानी चाहिए। इस उम्र में अगर बच्चे की आंखों में किसी प्रकार की कोई परेशानी रहती है तो वह इसी अवस्था में ठीक हो जाती हैं। आज का युवा आंखों की समस्या से ज्यादा परेशान हैं क्योंकि वह अपना ज्यादतर समय कंप्यूटर, मोबाइल फोन, रंगीन टीवी, वीडियो गेम और टैबलेट पर बिताते हैं। उनकी यह बेपरवाही और लापरवाही उन्हें असमय आँखों का दुश्मन बना देती है और यह दंश उन्हें ताउम्र झेलना पड़ता है।
नेत्रों की महत्ता का पता हमें तब चलता है जब हम किसी नेत्रहीन व्यक्ति की क्रियाओं को देखते हैं। मार्ग पर चलना तो दूर, घर पर चलने-फिरनें में भी असुविधा होती है। नेत्रहीन व्यक्ति को हर समय किसी न किसी के सहारे की आवश्यकता होती है, उसका दैनिक जीवन भी मुश्किलों से भर जाता है। हमारे सभी धर्मों में दया, परोपकार, जैसी मानवीय भावनाएँ सिखाई जाती हैं । यदि हम अपने नेत्रदान करके मरणोपरांत किसी की सहायता कर सकें तो हम अपने धर्म का पालन करेंगे। नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के 6 से 8 घंटे के अंदर ही नेत्रदान कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति को नेत्रदान के कॉर्निया का उपयोग करना है, उसे 24 घंटे के भीतर ही कॉर्निया प्रत्यारोपित कराना जरूरी होता है। नेत्रदान का मतलब शरीर से पूरी आंख निकालना नहीं होता। इसमें मृत व्यक्ति की आखों के कॉर्निया का उपयोग किया जाता है। मृत्यु के बाद एक व्यक्ति चार लोगों को रोशनी दे सकता है। पहले दोनों आंखों से केवल दो ही कार्निया मिलती थी लेकिन अब नई तकनीक आने के बाद से एक आंख से दो कार्निया प्रत्यारोपित की जा रही हैं। डीमैक तकनीक से होने वाला यह प्रत्यारोपण शुरू हो गया है। खास बात यह है कि व्यक्ति के मरने पर उसकी पूरी आंख नहीं बदली जाती है केवल रोशनी वाली काली पुतली ही ली जाती है। दोनों कार्निया एक साथ नहीं बदली जाती है। मौत के छह घंटे तक ही कार्निया प्रयोग लायक रहती हैं।
आँखों की कुछ बीमारियों के लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते जब तक कि काफी नुकसान न हो जाए। इसीलिए नियमित जांच अनिवार्य है, वैकल्पिक नहीं। आँखों के स्वास्थ्य को बनाए रखना केवल एक व्यक्ति का नहीं कर्तव्य है, बल्कि यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नेत्रदान द्वारा बड़ी संख्या में लोगों को लाभान्वित किया जा सकता हैं। मृत्यु के बाद किसी जरूरतमंद को अपनी आंखें देने की प्रक्रिया नेत्रदान कहलाती है। नेत्रदान महादान है, मनुष्य के जीवन में हर अंग का महत्व है, लेकिन द्ृष्टि के बिना जीवन का पूरा सुख नहीं मिलता। आंखें खुशी और दुख दोनों का भाव व्यक्त करती है। स्क्रीन टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। स्क्रीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है।

विश्व दृष्टि दिवस : छोटा स्क्रीन बड़ा खतरा उजाले की दुनिया का अंधेरा मिटाएं
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