चुनाव आयोग पर सियासी घमासान के बीच भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने बड़ी चुनौती

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भारतीय राजनीति में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल एक संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद आने वाले समय की व्यापक राजनीतिक दिशा से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है। विपक्षी दल विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ तीखे बयान दे रहे हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों को राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बताकर विपक्ष पर पलटवार कर रही है। ऐसे वातावरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस राजनीतिक टकराव का जवाब केवल बयानबाजी से दिया जाएगा या तथ्यों और दस्तावेजों के साथ जनता के सामने पूरी तस्वीर रखी जाएगी।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। भाजपा और उसके समर्थकों का तर्क इसके विपरीत है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना चुनावी व्यवस्था की अनिवार्य प्रक्रिया है तथा विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रहा है। यहां दोनों पक्षों के दावों के बीच वास्तविक तथ्य सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के संचालन और मतदाता सूचियों की तैयारी तथा पुनरीक्षण के लिए जिम्मेदार स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।
यही कारण है कि भाजपा को एसआईआर जैसे संवेदनशील विषय को हल्के में नहीं लेना चाहिए। विपक्ष यदि कोई सवाल उठा रहा है तो उसका उत्तर केवल यह कहकर देना पर्याप्त नहीं होगा कि आरोप राजनीतिक हैं। मतदाता सूची में कितने नामों का पुनरीक्षण हुआ, किन आधारों पर नाम जोड़े या हटाए गए, दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया क्या है तथा नागरिकों को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का क्या अवसर दिया गया है, इन सभी सवालों का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एसआईआर से संबंधित मतदाता सूची और नाम खोजने की सुविधा भी उपलब्ध है।
राजनीतिक लड़ाई में नैरेटिव का महत्व होता है। यदि एक पक्ष लगातार कोई आरोप दोहराता है और दूसरा पक्ष केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया देता रहता है तो सामान्य मतदाता के सामने भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए भाजपा के लिए बेहतर राजनीतिक रणनीति यही होगी कि वह एसआईआर से जुड़े प्रत्येक तथ्य को सरल भाषा में सामने रखे। इससे विपक्ष के आरोप सही हैं या गलत, इसका निर्णय जनता और संस्थागत प्रक्रिया के स्तर पर अधिक स्पष्टता से हो सकेगा। इसी तरह विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह गंभीर आरोपों के समर्थन में प्रमाण और ठोस तथ्य प्रस्तुत करे। लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करना ही बहस को विश्वसनीय बनाता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर भी संवैधानिक व्यवस्था समझना जरूरी है। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसका अर्थ है कि किसी राजनीतिक प्रदर्शन या बयान मात्र से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया नहीं जा सकता। इसलिए न्यायालय में किसी मामले की सुनवाई, नोटिस या किसी निर्णय पर टिप्पणी को तत्काल पद से हटाने के समान मानना संवैधानिक प्रक्रिया को सरल बनाकर देखने जैसा होगा।
दूसरी ओर विपक्ष के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के इस्तीफे की मांग करने से राजनीतिक प्रभाव पैदा किया जा सकता है। विपक्ष की भूमिका केवल विरोध तक सीमित नहीं रह सकती। यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल स्वयं को मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं तो उन्हें चुनाव आयोग के मुद्दे के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, रोजगार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, सामाजिक कल्याण और शासन व्यवस्था पर भी अपना स्पष्ट वैकल्पिक कार्यक्रम जनता के सामने रखना होगा।
श्रीलंका और नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रम यह जरूर दिखाते हैं कि लंबे समय तक मजबूत दिखाई देने वाली राजनीतिक व्यवस्था भी परिस्थितियों के बदलने पर चुनौती का सामना कर सकती है। लेकिन भारत की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था अलग है। यहां सत्ता परिवर्तन का निर्णय नियमित चुनावों के माध्यम से मतदाता करते हैं। इसलिए किसी भी दल की वास्तविक राजनीतिक ताकत का आकलन केवल प्रदर्शन, नारों या इंटरनेट पर चल रहे नैरेटिव से नहीं किया जा सकता। उसके लिए संगठन, जनसमर्थन, नीतियों और चुनावी परिणामों को देखना आवश्यक है।
2027 इस दृष्टि से विशेष महत्व का वर्ष होगा। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार गोवा, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड की विधानसभाओं के कार्यकाल मार्च 2027 में पूरे होने हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं के कार्यकाल क्रमशः 2027 में आगे के महीनों में पूरे होते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग से जुड़ा कोई भी विवाद आने वाले राजनीतिक संघर्ष में बड़ा मुद्दा बन सकता है। दलों के लिए यह केवल आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का प्रश्न भी है।
कांग्रेस के सामने इस समय एक दूसरी चुनौती भी है। यदि वह भाजपा के आर्थिक आंकड़ों को गलत या भ्रामक बताती है तो उसे अपने आर्थिक मॉडल की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी। वह आर्थिक वृद्धि को किस स्तर तक ले जाएगी, रोजगार कैसे बढ़ाएगी, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी निवेश के बीच संतुलन कैसे बनाएगी, कल्याणकारी योजनाओं का वित्तीय प्रबंधन कैसे करेगी और बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति कैसी होगी, इन सवालों के जवाब देना जरूरी होगा। केवल सत्ता विरोधी भावना के आधार पर राजनीतिक विकल्प तैयार नहीं होता।
इसी प्रकार भाजपा के सामने भी चुनौती है कि वह विपक्ष के आरोपों को केवल राजनीतिक षड्यंत्र बताकर आगे न बढ़े। संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के व्यवहार से प्रभावित होती है। यदि एसआईआर को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो तथ्यों के साथ जवाब देना भाजपा और चुनाव आयोग दोनों के लिए उपयोगी होगा। तीखी राजनीतिक भाषा से समर्थकों में उत्साह पैदा हो सकता है, लेकिन संस्थागत विश्वास दस्तावेजों, पारदर्शिता और कानून के पालन से मजबूत होता है।
विपक्षी मार्च में कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार गुट, वाम दल और राजद के सांसदों की भागीदारी तथा बीजू जनता दल की मौजूदगी यह संकेत देती है कि मुद्दे ने कई दलों का ध्यान खींचा है। वहीं आम आदमी पार्टी और द्रमुक का मार्च में शामिल नहीं होना यह भी बताता है कि विपक्षी राजनीति में हर मुद्दे पर पूर्ण एकजुटता नहीं है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक दल बनाम दूसरे दल की लड़ाई के रूप में देखना अधूरा होगा।
अंततः चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी एक सरकार, दल या नेता का विषय नहीं है। चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। विपक्ष को आरोप लगाने हैं तो प्रमाण सामने रखने होंगे और सरकार तथा भाजपा को जवाब देना है तो आंकड़ों और नियमों के साथ देना होगा। 2027 की ओर बढ़ते राजनीतिक माहौल में दोनों पक्षों की परीक्षा इसी बात से होगी कि वे नारों और आरोपों से आगे बढ़कर जनता के सामने कितना स्पष्ट, प्रमाणित और विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प रखते हैं।

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