यूपी : अभी तो फ्री बीज की शुरुआत है, पिक्चर अभी बाकी है

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-बाल मुकुन्द ओझा
जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते है वैसे वैसे राजनीतिक पार्टियां अपने सिद्धांत और विचार त्याग कर जीत हासिल करने के लिए सभी प्रकार के जायज नाजायज हथकंडे अपनाना शुरू कर देती है। रेवड़ी संस्कृति लोकतंत्र और अर्थतंत्र का बेड़ा गर्क कर रही है। यह वही संस्कृति है, जिसे मुफ्तखोरी की राजनीति भी कहा जाता है। सच तो यह है रेवड़ी संस्कृति के कारण हमारे देश की अनेक राज्य सरकारें लगभग दीवालिया होने की कगार पर हैं। उनका बजट घाटा बढ़ता जा रहा है, लेकिन वे मुफ्तखोरी की सियासत को छोड़ने को तैयार नहीं है। क्योंकि चुनाव जो जीतना है। अगले साल यूपी सहित सात राज्यों में विधान सभा के चुनाव प्रस्तावित है। चुनाव आते ही मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियों और घोषणाओं का बिगुल बज जाता है। कहा जाता हैं चुनाव जीतने के लिए सब कुछ जायज है। इस कार्य में कोई भी सियासी पार्टी पीछे नहीं रहती। इसकी शुरुआत यूपी से शुरू हो गई है। यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की होड़ शुरू हो गई है। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ने ही आधी आबादी यानी महिलाओं और युवाओं को लुभाने के लिए चुनावी सौगातों की बौछार कर दी है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव महिलाओं के लिए 40 हजार रुपये की आर्थिक मदद का ऐलान कर चुके हैं, जबकि भाजपा की योगी सरकार ने 25 लाख युवाओं को मुफ्त टैबलेट, एक लाख सरकारी नियुक्ति पत्र और 60+ महिलाओं को रोडवेज बसों में आजीवन मुफ्त यात्रा का बड़ा ऐलान किया है। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में छह करोड़ से अधिक महिला मतदाता हैं। वर्ष 2022 में भाजपा की सरकार बनाए रखने में महिलाओं की भी अहम भूमिका मानी जाती है। ऐसे में तीसरी बार जीत के लिए भाजपा अपने संकल्प में महिलाओं को खाते में सीधा पैसा देने संबंधी योजना का वादा कर सकती है।चुनावों में महिलाओं का एक नया वोट बैंक जरूर उभरा है और मुफ्त योजनाओं का चुनावी असर भी कई राज्यों में देखने को मिला है. मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना समेत कई योजनाओं के जरिए राजनीतिक दलों ने महिला मतदाताओं को साधने की कोशिश की है। और ये कोशिश सफल भी हुई है। चुनाव में युवाओं का जिन्हें आजकल जेन जी कहा जा रहा है का वोट बैंक सबसे महत्वपूर्ण है। युवा चाहते हैं कि परीक्षाएं समय पर हों, पेपर लीक न हों, रिजल्ट समय पर आए और स्कूल-कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। छात्राओं को स्कूटी या लैपटॉप देने की घोषणा युवाओं की समस्याओं का पूरा समाधान नहीं है। युवाओं की असली मांग बेहतर शिक्षा व्यवस्था, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और रोजगार के अवसर बिना भेदभाव प्रदान करना हैं
अभी तो फ्री बीज की यह शुरुआत है, पिक्चर अभी बाकी है। चुनावों के दौरान सियासी पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए तरह तरह के वादे और प्रतिवादे करती है। सरकार बनने के बाद चुनावी वादे पूरा करने में पार्टियों के पसीने छुट जाते है। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तो चौपट तक हो जाती है जिसके कारण सम्बध सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन आदि चुकाने के लाले पड़ जाते है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने का प्रकरण सियासी हलकों में गर्माने लगा है। देश की प्रबुद्ध जमात का मानना है इससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रकार की योजनाओं की आलोचना की थी। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान इस तरह के वादे करने का चलन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिक से अधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वादे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीजें बांटने को लेकर होती हैं। यह देखा गया है कुछ सालों से देश की चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली—पानी, मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद राशि, सस्ते गैस सिलेंडर आदि आदि अनेक तरह की घोषणाओं का चलन बढ़ गया है। विशेषकर चुनाव आते ही वोटर्स को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुफ्त का मिल जाये तो उसका जी भर उपयोग करना। ये मुफ्त की नहीं है अपितु जनता के खून पसीनें की कमाई है जो राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा दी जा रही है ताकि चुनाव की बेतरणी आसानी से पार की जा सके।

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