बाल मुकुंद ओझा
देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आते जा रहे है वैसे वैसे सियासी पार्टियों ने अपनी रणनीतिक तैयारियां शुरू कर दी है। एक दूसरे पर आरोपों की बौछारे सियासी पारे में गर्माहट पैदा करने लगी है। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ने एक दूसरे को पछाड़ने के लिए भाषणों और बयानों के जहरीले तीर बरसाने शुरू कर दिए है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में इस समय भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 403 में से 255 सीटों पर जीत हासिल की थी। समाजवादी पार्टी को 111, कांग्रेस को 2 और बहुजन समाज पार्टी को महज 1 सीट मिली थी। 34 सीटों पर अन्य दलों के उम्मीदवार जीते थे। पार्टियों ने अपने अपने गठबंधन तलाशने के साथ उन्हें मज़बूती प्रदान करने प्रारम्भ कर दिए है। भाजपा के साथ कई छोटी पार्टियां है। इस बार भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल का भी साथ मिला हुआ है। दूसरी तरफ, सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की स्थिति पूरी तरह साफ़ नहीं है। उम्मेद है दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ेंगी। बसपा सुप्रीमों मायावती अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी अपने प्रत्याशी उतारेगी। यूपी विधानसभा चुनाव में इस बार रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा।
कहा जाता यूपी की सियासत में ‘दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है’, यह केवल कहावत ही नहीं है अपितु भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी हकीकत है। प. जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, इतिहास गवाह है कि जिसने यूपी जीता, उसने हिंदुस्तान जीत लिया । यह भी कहा जाता है, जिसने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया उसके दिल्ली पहुंचने के रास्ते आसान हो जाते हैं। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी रणनीति को धार देना शुरु कर दिया है। विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से जोड़-तोड़ और कयासों का दौर शुरू हो चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने अपनी सत्ता बचाने और भाजपा की हैट्रिक लगाने की चुनौती है, तो वहीं समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव पीडीए के फॉर्मूले के दम पर सत्ता में वापसी की हर संभव कोशिश में जुटे हैं। यूपी की जनता ही तय करती है की देश की हवा किस ओर बहती है।
यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से जोड़-तोड़ और कयासों का दौर शुरू हो चुका है। इसी के मधे नज़र गठजोड़ बनने बिगड़ने शुरू हो गए है। बात बात पर नेताओं ने चुनाव में देख लेने की धमकिया देनी शुरू कर दी है। यूपी में साढ़े नौ साल से भाजपा सत्तारूढ़ है और योगी आदित्यनाथ के पास सत्ता की कमान है। भाजपा तीसरे टर्म के लिए जी तोड़ कोशिश में लगी है। यहाँ भाजपा और समाजवादी पार्टी में सीधी और कांटे की लड़ाई है। कांग्रेस और बसपा समाप्त प्राय है। अन्य छोटी पार्टिया अपने अस्तित्व को बचाने के फेर में है। सपा मुखिया पीडीए बनाकर मतों को एक मुश्त अपनी झोली में डालने के प्रयास में जुटी है वहीँ भाजपा हिन्दू मतों को कटेंगे तो बटेंगे का नारा देकर प्राप्त करने के प्रयास में है। कुछ अन्य जातीय पार्टियां भी जातीय मतों के बुते पर मैदान में डटी है। यूपी विधानसभा का चुनाव आगामी लोकसभा चुनाव की आधारशिला रखेगा। प्रदेश में चुनावी माहौल तेजी से गहराने लगा है। मिशन-2027 को लेकर भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। भाजपा मिशन-2027 को लेकर ओबीसी वोट बैंक, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर केंद्रित रणनीति अपना रही है। पार्टी ने कुर्मी वोटों को साधने के लिए पंकज चौधरी को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी के साथ रहा है। सांसद ओवैसी की पार्टी भी दम ख़म के साथ चुनाव में कूद रही है। यूपी के चुनाव ही देश की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा ने मोदी और योगी के सहारे जहाँ सत्ता में वापसी की उम्मीद जगाई है वहां अखिलेश की समाजवादी पार्टी ने कुछ छोटे दलों से गठजोड कर मुकाबला कांटे का खड़ा करने का प्रयास कर रही है।

यूपी के चुनाव करेंगे देश के भाग्य का फैसला
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