बाल मुकुंद ओझा
सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत एक ताज़ा रिपोर्ट का अवलोकन करें तो पाएंगे देश की राजनीति पर आज भी अपराधी आचरण वाले लोगों का कब्ज़ा बदस्तूर जारी है। देश की सर्वोच्च अदालत में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा और राज्यसभा के 776 सदस्यों में 326 के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 210 गंभीर मामले हैं। रिपोर्ट में 14 मुख्यमंत्रियों द्वारा भी आपराधिक मामले घोषित करने की जानकारी दी गई है। सांसद विधायकों के 4192 मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में सीनियर वकील विजय हंसारिया ने रिपोर्ट पेश की है। हंसारिया को इस मामले में कोर्ट सलाहकार बनाया गया है। देश की सियासत में नेताओं और अपराध का चोली-दामन का साथ रहा है। देश की सियासत में अपराधिक प्रवृति वाले लोगों का आना जाना जारी है। ये पहले अपराध की दुनिया में सिक्का जमाते हैं फिर पार्षद, विधायक लेकर सांसद तक निर्वाचित हो जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि आखिर राजनीति में अपराधियों की हिस्सेदारी कहां तक पहुंच चुकी है। देश में ऐसी कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं, जो पूरी तरह से दागी मुक्त हो। यानी उनके किसी भी एक नेता पर अपराध के मामले दर्ज नहीं हों। पिछले 79 सालों में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और जिस तरह देश में आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। राजनीति में शुचिता को लेकर ऊपरी तौर पर सभी सियासी दल सहमत है मगर व्यवहार में उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। लगभग सभी दल चुनाव जीतने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारते है जो बाहुबली होने के साथ आपराधिक आचरण वाले है। नेताओं के खिलाफ अदालती मुकदमें कोई नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही नेताओं को विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में ऐसे मामलों में यकायक ही तेजी आयी। दर्ज मुकदमों में हत्या, हत्या के प्रयास, सरकारी धन का दुरूपयोग, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के मुकदमें भी शामिल है। वर्षों से इन मुकदमों का फैसला नहीं होने से हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली पर सवाल उठते रहे है। लम्बे मुकदमें चलने से सबूत मिलने में काफी परेशानी होती है और अंततोगत्वा आरोपी बरी हो जाते है। सुप्रीम अदालत यदि ऐसे मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए कोई सख्त कदम उठाये तो पीड़ितों को न्याय मिल पायेगा।
पिछले सालों में देश में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। राजनीति के अपराधीकरण पर हो रही चर्चाओं में पक्ष और विपक्ष के अलग अलग गुट बन जाते है जो इस नापाक गठजोड़ को तोड़ने के बजाय एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपने हित साधने में लगे रहते है। इससे सार्थक चर्चा नहीं हो पाती और पूरा समय गंदे बोलों के बीच समाप्त हो जाता है। लगता है इन चर्चाओं में भाग लेने के लिए ऐसे लोगों को बुलाया जाता है जो अपने निम्न स्तरीय बयानों के लिए जाने जाते है।
आज लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं और सियासी पार्टियों के नापाक गठजोड़ से जनता जनार्दन को जागरूक होने की जरुरत है। अपराधियों को नेताओं का समर्थन हो या नेताओं की अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने की कोशिश, आखिर राजनैतिक दलों पर अपराधियों का ये कैसा असर है। भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। हालात यहाँ तक पहुँच गए है कि पार्टियाँ उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम मिला है। कभी राजनीतिज्ञ अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब अपराधियों ने दूसरे को लाभ पहुँचाने के बदले खुद ही कमान संभाल ली है।
आखिर क्यों सरकार इस दिशा में कुछ कर नहीं रही? और विपक्ष भी क्यों चुप है इस मामले में? क्या इसलिए कि सबके दामन पर दाग है? क्या इसलिए कि बाहुबल, धनबल की राजनीति सबको रास आती है? ईमानदार राजनीति का तकाजा है कि राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त कराने की प्रक्रिया तत्काल शुरू हो न्याय-व्यवस्था में बदलाव लाकर राजनीति के अपराधियों के मामले निश्चित समय-सीमा में निपटाये जाएं।
देश की सियासत पर अपराधी आचरण वाले लोगों का कब्ज़ा बदस्तूर जारी
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