ड्राई डे पर शटर जरूर बंद होता है, पर क्या वास्तव में शराब की बिक्री भी बंद होती है?

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शुष्क दिवस (ड्राई डे) वह दिन होता है जब सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व या धार्मिक महत्व के अवसरों पर सभी प्रकार की देशी-विदेशी शराब की क्रय-बिक्री करने, परोसने और उसके परिवहन पर पूरी तरह रोक रहती है। इस दिन सभी शराब की दुकानें, बार, पब, क्लब, कानूनी तौर पर बंद रहते हैं। हमारे भारत देश में 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस), 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) और 2 अक्टूबर (गांधी जयंती), महावीर जयंती तथा मतदान के दिन और उससे ठीक 48 घंटे पहले का समय शुष्क दिवस निर्धारित है अर्थात राष्ट्रीय पर्वों, प्रमुख धार्मिक पर्वों और अन्य अहम मौकों यथा चुनाव के दौरान शांति, कानून व्यवस्था बनाए रखने और नैतिक, सांस्कृतिक मूल्यों के सम्मान में प्रतिबंधित होती है अर्थात उस दौरान अल्कोहल वाले पेय पदार्थ की बिक्री पर कड़ा प्रतिबंध रहता है। आमतौर पर ये ड्राई डे राष्ट्रीय अवकाश, धार्मिक पर्वों और अन्य अहम मौकों पर माने जाते हैं। इन दिनों नियमों का पालन न करने पर दुकानदारों पर भारी जुर्माना या सजा हो सकती है। ड्राई डे’ का अर्थ नशा मुक्ति दिवस हो सकता है।

कुछ शुष्क दिवस पूरे भारत में मनाए जाते हैं जबकि कुछ राज्य विशिष्ट होते हैं। वैसे शराब की बिक्री राज्य का विषय है, इसलिए पूरे देश में शराबबंदी के कानून अलग-अलग हैं। राज्यों के हिसाब से शुष्क दिनों की सूची भले ही अलग-अलग होती हो, पर शुष्क दिवस वाले दिन शराब पर पूर्णतया प्रतिबंध रहता है, लेकिन देखने में आ रहा है शराब विक्रेताओं को कानून का कोई भय नहीं है। पिछले गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, महावीर जयंती और दो दिन पूर्व गांधी जयंती के अवसर पर देखने में आया शहरों से लेकर गांवों तक कहीं ना कहीं शराब बिक्री होती पाई गई और मीडिया में समाचार भी आए। कहीं पत्रकारों ने रिपोर्टिंग कर पोल खोली तो कहीं आबकारी विभाग कार्रवाई करता दिखा।

आखिर शुष्क दिवस पर शराब की बिक्री सिस्टम पर सवाल खड़े करती है। जिस प्रकार पत्रकारों ने दिखाया दुकान बंद होती है वाकायदा सील भी लगी होती है पर अंदर लाइट, पंखे सब चालू होते हैं यानी अंदर कोई ना कोई होता है जो गुप्त स्थान से पैसे लेकर सप्लाई करता है। यानी या तो मिली भगत से कोई अंदर रहता है या फिर दूसरा या गुप्त रास्ता होता है जिसके माध्यम से विक्रेता दुकान के अंदर चला जाता है। किराणा की दुकान हो या कपड़े की दुकान या अन्य किसी भी दुकान के शटर के साइड में खिड़की, झरोखा, हाथ डले उतना 4-6 इंच का गोल या चौकोर कट नहीं रहता पर इन शराब की दुकानों के शटर में गोल, चौकोर कट रहता है या फिर साइड या पीछे की तरफ कोई खिड़की, झरोखा, छोटा गेट निकाला हुआ रहता है जहां से नियम कायदों की खुलेआम धज्जियां उड़ती रहती हैं। जब अन्य दुकानों में ऐसा नहीं होता तो फिर शराब दुकानों में ऐसा क्यों? क्या जिम्मेदारों को इसकी जानकारी नहीं होती है? और होती है तो कार्रवाई? जब आम लोगों को पता होता है तो जिम्मेदारों को कैसे पता नहीं होता? जब कोई व्यक्ति या पत्रकार जिम्मेदारों को इसके बारे में बताता है तो जिम्मेदार कहते हैं “ऐसा कहीं नहीं हो रहा, गाइडलाइन की पूरी पालन हो रही है और यदि ऐसा होता है तो शिकायत दर्ज करवाइए, हम कार्रवाई करेंगे।” अब व्यक्तिगत रूप से शिकायत दर्ज कौन करवाए, क्योंकि कोई भी व्यक्ति हो यही सोचता है लफड़े में कौन पड़े? कौन किसी से वैर मोल ले? जब एक पत्रकार प्रमाण देता है तब यह बात कही जाती है तो सोचो कोई आम व्यक्ति कहे और कार्रवाई होगी इसकी क्या गारंटी है?

प्रायः हर जगह कहीं न कहीं जिस दिन शुष्क दिवस घोषित होता है, उसी दिन ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे घोषित शुष्क दिवस मनाने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाता। फिर तो बंद करने का दिखावा करने की भी क्या जरूरत है, बंद होने पर भी बंद थोड़ी होती है। बंद दुकान से शराब बाहर कैसे आती है? जिम्मेदार विभाग को जानकारी क्यों नहीं होती? यदि जानकारी नहीं होती या नहीं थी तो क्यों नहीं होती? और यदि थी तो क्या करवाई करते हैं? निगरानी व्यवस्था मजबूत और चाक चौबंद क्यों नहीं करते? इस पर सवाल उठने तो लाजिमी हैं? सवाल यह नहीं है कि शराब कौन बेच रहा था? सवाल यह है शराब बिक कैसे रही थी? सवाल है नियमों के पालन का? सवाल है जनता के सामने कानून की विश्वसनीयता का? सवाल है जिम्मेदारों की जिम्मेदारी का? नियम सिर्फ आम जनता के लिए ही लागू नहीं होने चाहिएं, बल्कि नियम तो शराब व्यापारियों के लिए भी लागू होना चाहिए, जिम्मेदारों के लिए भी लागू होना चाहिए।

शराब के ठेके को खोलने के लिए विशेष नियमावली बनी हुई है जिसके आधार पर ही शराब बार ठेका खोलने की अनुमति मिलती है और विक्रेता को उसकी अनुपालना करना भी जरूरी होता है, मगर इन नियमों के परे मानवीय दृष्टिकोण का भी ध्यान रखना चाहिए। देखने में आता है कुछ क्षेत्रों में शराब की दुकानें ऐसे स्थानों पर चलती हैं जो होने को मंदिरों और स्कूलों के लिए निर्धारित दूरी के नियम के अनुरूप हों मगर फिर भी सुरक्षा की दृष्टि से कुछ तो संवेदनशीलता भी दिखानी जरूरी है। यदि किसी मार्ग पर या उसके आसपास बहुत सी स्कूलें हो विशेष कर बालिकाओं की स्कूल हो तो निश्चित दूरी के नियमों पर सुरक्षा की दृष्टि से ध्यान देना चाहिए। यदि बालिका स्कूल की दूरी निर्धारित नियम से 10, 20 या 50 मीटर दूर है पर बालिकाओं के जाने का रास्ता वही है तो ऐसे स्थान पर शराब बार ठेका खोलना उचित नहीं हो सकता। ऐसे में उनके कोमल बाल मन पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता होगा? एक निजी आवासीय मकान में जिसमें परिवार रहता हो और जिसके आजू-बाजू, आमने-सामने परिवार रहते हों वहां मानवीय दृष्टिकोण और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से शराब ठेका खोलना, उसकी बिक्री होना उचित नहीं हो सकता।

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