हमारे देश में बुजुर्गों की देखभाल का स्वरुप अब बदलने लगा है, हालाँकि यह कहानी अभी अमीर बुजुर्गों तक पहुंची है मगर इसके विस्तार की चर्चाएं सुनाई देने लगी है। बुजुर्गों को कल तक परिवार का वट वृक्ष मानकर देखभाल की जाती थी अब यह परिवार से निकलकर संगठित बाजार का रूप ले चुकी है। इसे सिल्वर इकॉनामी का नाम दिया गया है। नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल से जुड़ा सिल्वर इकॉनामी का यह मार्केट वर्ष 2030 तक 50 अरब डालर यानि सवा चार लाख करोड़ रूपये तक पहुँचने का अनुमान है। बुजुर्गों की देखभाल का यह नवीन तरीका अब विशेष ऐप और सोशल मीडिया रोबोट जैसे आधुनिक विचार व्यवहार शामिल हो गए है।
एक रिपोर्ट के अनुसार आज देश में बुजुर्ग आबादी साढ़े दस करोड़ हो गई बताई जाती है और देखभाल का बाजार करीब 58, 450 करोड़ का हो गया है। इनमें से केवल पौने छह फीसदी बुजुर्ग अकेले रहते है। बताया जा रहा है बुजुर्गों का यह बाजार निरंतर बढ़ता जा रहा है। बाजार अब लग्जरी बुढ़ापा बेचने की तैयारी में है। यह भी कहा जा रहा है लग्जरी बुढ़ापा का यह बाजार काफी महंगा है। इसकी कीमत 50 हज़ार से दो लाख रुपया महीना है। इसका मतलब अब बुढ़ापा अमीरों तक सिमट गया है। निर्धन बुजुर्गों का बुढ़ापा अस्पतालों की लाइनों और सरकारी पेंशन तक रह गया है। ऐसे में यह आवाज भी जोर शोर से उठ रही है की सरकार को देखभाल की इस समस्या से निपटने के लिए आगे आना चाहिए। इसी भांति लग्जमबर्ग इंस्टीट्यूट ऑफ़ हेल्थ ने 24 हज़ार भारतीय परिवारों पर की अपनी एक स्टडी में खुलासा किया है कि 85 प्रतिशत बुज़ुर्गों को अपने परिवार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिलती। इनमें विधवा महिलाऐं ज्यादा पीड़ित है। आर्थिक समाजिक असुरक्षा का सबसे बुरा असर महिलाओं पर पड़ रहा है।
देश और दुनिया में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में आगामी 2030 तक प्रत्येक 6 में से एक व्यक्ति की आयु 60 वर्ष से ज्यादा होंगी। हमारे देश की बात करें तो भारत की बुजुर्ग आबादी अगले दशक में 41 प्रतिशत तक बढ़ जाने का अनुमान है, यानी 2031 तक इस देश में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जाएंगे। यह जानकारी एक सरकारी रिपोर्ट में दी गई है। दुनिया के कुछ देश बुजुर्गों को एक ही छत के नीचे स्वास्थ्य सहित सभी प्रकार की मूलभूत सुविधाएं सुलभ करा रहे है। मगर हमारे देश में बुजुर्गों को पेंशन की सुविधा जरूर दी जा रही है मगर अन्य आवश्यक सुविधाओं की दृष्टि से हम बहुत पीछे है।
भारत में कभी बुजुर्गों की पूजा की जाती थी। बुजुर्ग घर की आन बान और शान थे। बिना बुजुर्ग को पूछे कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता था। आज वही बुजुर्ग अपने असहाय होने की पीड़ा से गुजर रहा है। दुर्भाग्य से उसे यह मर्मान्तक पीड़ा देने वाले कोई और नहीं अपितु उनके परिजन ही है। बुजुर्गो का सम्मान करने और सेवा करने की हमारे समाज की समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या है और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन की जरूरत है। आज घर घर में बुजुर्ग है। ये इज्जत से जीना चाहते है। मगर यह कैसे संभव है यह विचारने की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र की इंडिया एजिंग रिपोर्ट के मुताबिक देश और दुनिया की आबादी बूढ़ी हो रही है। वैश्विक स्तर पर बात करें तो 7.9 अरब की आबादी में से करीब 1.1 अरब लोगों की उम्र 60 साल से अधिक होगी। यह जनसंख्या का लगभग 13.9 प्रतिशत है। 2050 तक वैश्विक आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़कर लगभग 2.2 बिलियन हो जाएगी। भारत की बात करें तो देश में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने का सिलसिला 2010 से शुरू हुआ है। वर्तमान चलन के अनुसार, 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 15 वर्षों में दोगुनी हो रही है। मगर आबादी की वृद्धि के बावजूद बुजुर्गों को जीविनोपयोगी पूरी सुविधाएं आज भी नहीं मिल रही है। वृद्धावस्था जीवन का वह सच है जिसे आज नहीं तो कल सब को स्वीकारना होगा। एक दिन बुढापा आपको भी आएगा जिसके आगोश में हर किसी को आना है। जो लोग आज इस सच्चाई को स्वीकार नहीं रहे है उन्हें बुढ़ापा अपनी रंगत जरूर दिखायेगा।
-बाल मुकुन्द ओझा



