सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला विवाहित पुत्रियों को भी मिलेगा समान अधिकार

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-कांतिलाल मांडोत
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है। समय के साथ न्यायपालिका ने अनेक ऐसे निर्णय दिए हैं जिन्होंने समाज में व्याप्त भेदभावपूर्ण व्यवस्थाओं को चुनौती दी है और समान अधिकारों की अवधारणा को मजबूत किया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति अथवा अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाता है बल्कि समाज में लंबे समय से चली आ रही रूढ़ियों को भी चुनौती देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया जिनमें कहा गया था कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए परिवार की परिभाषा में विवाहित बेटी शामिल नहीं होती। न्यायालय ने कहा कि किसी भी कल्याणकारी योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सहायता प्रदान करना होता है और यदि कोई पुत्री विवाह के बाद भी अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही है तो उसे केवल विवाहित होने के आधार पर योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह मामला एक विवाहित पुत्री से जुड़ा था जिसने उचित मूल्य की दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। उसने वर्ष 2019 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी थी जिसमें विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह विवाह के बाद भी अपने माता पिता के परिवार के साथ रह रही थी। वह अपनी विकलांग बहन की देखभाल करती थी और अपनी मां के साथ दुकान के संचालन में भी सहयोग करती थी। मां की मृत्यु के बाद जब उसने लाइसेंस के लिए आवेदन किया तो उसका आवेदन केवल इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि वह विवाहित है।
मामले की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठा कि जब विवाहित पुत्रों पर ऐसी कोई रोक नहीं है तो फिर विवाहित पुत्रियों को परिवार का सदस्य मानने से क्यों इंकार किया जाता है। यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति के अधिकार का नहीं था बल्कि देश की लाखों महिलाओं से जुड़ा हुआ था जो विवाह के बाद भी अपने माता पिता और परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी व्यक्ति के अधिकारों को निर्धारित करने का आधार नहीं हो सकती। यदि कोई महिला अपने परिवार के साथ जुड़ी हुई है और उनकी जिम्मेदारियां निभा रही है तो उसे केवल इसलिए योजनाओं से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका विवाह हो चुका है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी सोच संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
इस निर्णय का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारतीय समाज में लंबे समय तक यह धारणा रही है कि विवाह के बाद बेटी अपने मायके के परिवार का हिस्सा नहीं रहती। जबकि वास्तविकता यह है कि आज बड़ी संख्या में बेटियां अपने माता पिता की देखभाल करती हैं और आर्थिक तथा सामाजिक जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अनेक परिवारों में बेटियां ही माता पिता का सहारा होती हैं। ऐसे में उन्हें अधिकारों और योजनाओं से वंचित करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन निर्णयों का भी समर्थन किया जिनमें यह माना गया था कि किसी महिला को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के कारण कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। यह दृष्टिकोण आधुनिक भारत की सामाजिक वास्तविकताओं के अधिक अनुरूप है।
अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक संकट से उबारना होता है। यदि परिवार का कोई सदस्य वास्तव में आश्रित है और परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहा है तो उसके अधिकार का मूल्यांकन उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर नहीं बल्कि उसकी वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी सिद्धांत को मजबूत करता है।
यह फैसला महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सम्मान की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। जब महिलाओं को समान अवसर और अधिकार मिलते हैं तब वे न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे समाज के विकास में योगदान देती हैं। न्यायालय का यह निर्णय सरकारी नीतियों और योजनाओं में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाला माना जाएगा।
इस फैसले का प्रभाव केवल अनुकंपा नियुक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में विभिन्न सरकारी योजनाओं और लाभों से जुड़े मामलों में भी यह निर्णय एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे उन नियमों और प्रावधानों की समीक्षा का मार्ग प्रशस्त होगा जिनमें विवाह को महिलाओं के अधिकार सीमित करने का आधार बनाया गया है।
आज भारत तेजी से बदल रहा है। शिक्षा रोजगार और सामाजिक भागीदारी के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में न्यायपालिका के इस प्रकार के निर्णय समाज को अधिक न्यायपूर्ण और समानतापूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से स्पष्ट संदेश दिया है कि बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित उसके अधिकार समान हैं और उसे केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी योजना से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय संविधान की भावना के अनुरूप है और महिलाओं के सम्मान तथा समानता के अधिकार को नई मजबूती प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य सहायता पहुंचाना है न कि भेदभाव करना। इसलिए किसी भी पात्र पुत्री को केवल विवाह के आधार पर योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और आने वाले समय में सामाजिक न्याय की नई मिसाल के रूप में याद किया जाएगा।

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