-बाल मुकुन्द ओझा
बंगाल की सियासत में इस समय जैसे को तैसा की कहावत चरितार्थ हो रही है। बुरी तरह पराजित होने के बाद तृणमूल कांग्रेस और उनके नेता हार के सदमे से उबर नहीं पाये है। तृणमूल के नेताओं को देखते ही लोग गुस्से से उबल पड़ते है। चोर चोर के नारों से उनका स्वागत हो रहा है। अभिषेक और कल्याण बनर्जी की पिटाई के समाचार भी मिल रहे है। तृणमूल कांग्रेस के विधायक पार्टी छोड़ रहे है। ममता बनर्जी की बुलाई बैठक से 60 विधायकों के गायब रहने के बाद टीएमसी ने संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी जैसे नेताओं को निलंबित कर दिया है। बागियों का साफ आरोप है कि अभिषेक बनर्जी और चुनावी परामर्शदाता आई-पैक (I-PAC) की नीतियों ने पार्टी को बर्बाद किया है। टीएमसी के वरिष्ठ और जमीनी नेताओं का आरोप है कि अभिषेक बनर्जी ने पार्टी की कमान संभालते ही पुराने और वफादार नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया। उनके स्थान पर ऐसे युवाओं को तरजीह दी गई जिनका जमीनी राजनीति से कोई सरोकार नहीं था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बागियों का आरोप है कि टिकट वितरण से लेकर सांगठनिक फैसलों तक में आई-पैक का दखल इतना बढ़ गया था कि विधायकों को अपने ही क्षेत्रों में रबर स्टैंप बना दिया गया. चुनाव में मिली करारी हार के लिए सीधे तौर पर आई-पैक और अभिषेक की रणनीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।
आजादी के बाद से ही बंगाल में यह अनोखा ट्रेंड रहा है कि सत्ता गंवाने वाली पार्टियां कभी वापसी नहीं करतीं। कांग्रेस 1977 तक 25 साल शासन में रही और फिर कभी सत्ता में नहीं लौटी। वामपंथी पार्टियां 2011 तक 34 साल तक सत्ता में रही और फिर कभी वापस नहीं लौटी। लम्बे अरसे तक सत्तारूढ़ रहने वाली कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां का सियासत से अस्तित्व मिट गया। आज के हालात को देखते हुए कुछ लोगों का कहना है 2011 से 2026 तक बंगाल पर निर्विवाद राज करने वाली पार्टी टीएमसी सत्ता से बेदखल होते ही बिखराव के रास्ते पर है। उसका भी वही हस्र होगा जो पूर्ववर्ती पार्टियों का हुआ है। हालाँकि यह भविष्य के गर्भ में छिपा है कि टीएमसी का क्या होगा। बहरहाल ममता की पार्टी के नेता पार्टी छोड़ते जा रहे है।
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में लोकतंत्र की हत्या के आरोप लगाकर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है। बंगाल की लड़का महिला ममता पुलिस पर भी अपने कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने के आरोप लगा रही है। कल तक पुलिस उनके इसारे पर नाच रही थी और आज वही पुलिस ममता को नचा रही है।
बंगाल में कम्युनिष्टों के साथ अपनी मातृ संस्था कांग्रेस को जड़ से उखाड़ने का श्रेय ममता को दिया जा सकता है। ममता बनर्जी अपने लड़ाकू अंदाज़ के लिए देशभर में जानी जाती है। प. बंगाल में 34 साल तक एक छत्र शासन करने वाले कम्युनिष्टों को सत्ताच्युत कर ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल का झंडा फहराया। ममता को बंगाल की शेरनी भी कहा जाता है। सूती धोती और मामूली चप्पल ममता की पहचान है। पार्टी हाई कमान भी वे स्वयं हैं और अपने सभी प्रकार के निर्णय खुद ही लेती हैं। इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को की थी। उस दौरान ममता को लगा था की कांग्रेस में रहकर कम्युनिष्टों को नहीं हटाया जा सकता। तभी वो कांग्रेस से अलग हो गयी और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाली। ममता ने दिग्गज कम्युनिष्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर देश में धमाका कर दिया था। ममता येन केन प्रकारेण कम्युनिष्टों को सत्ता से हटाना चाहती थी। उन्होंने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू में भाजपा से हाथ मिलाया था। 1997 में कांग्रेस से अलग होने और टीएमसी के गठन के बाद, बनर्जी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और रेल मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल का भी हिस्सा थीं। मगर जल्द ही भाजपा से उनका मोह भांग हो गया और उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस से हाथ मिलकर अपनी सियासत शुरू की। आखिर ममता की मेहनत रंग लाई। 2011 में, टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में 34 साल के सीपीआई (एम) के शासन को खत्म कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 20 मई को बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लीं। अब अर्श से वापस फर्श पर पहुँचने के बाद ममता ने एक बार फिर सड़कों पर संघर्ष का सहारा लिया है। देखने वाली बात यह है कि ममता अपनी पार्टी को बिखराव से रोक पाती है या नहीं अथवा वामपंथी पार्टियों की तरह तीन तेरह होने की कगार पर है।

बंगाल में सत्ता गंवाने वाली पार्टियां कभी वापसी नहीं करतीं
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