ब्रिक्स में भारत की जय-जयकार आतंकवाद पर एकजुट दुनिया और बदलती वैश्विक व्यवस्था

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नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बदलती वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती भूमिका का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और कठोर रुख रखा, वैश्विक दक्षिण को निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भूमिका देने की बात कही और अलग-अलग मत रखने वाले देशों को एक साझा घोषणापत्र पर सहमत कराया, उससे भारत की कूटनीतिक क्षमता सामने आई है। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति पर सहमति जताई। पहलगाम आतंकी हमले की निंदा ने भारत के उस लंबे प्रयास को मजबूती दी है जिसमें वह आतंकवाद को किसी भी राजनीतिक या रणनीतिक बहाने से अलग रखकर उसके खिलाफ वैश्विक एकजुटता की मांग करता रहा है।
ब्रिक्स का दिल्ली घोषणापत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस संगठन में ऐसे देश शामिल हैं जिनके बीच अनेक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर मतभेद हैं। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अरब देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे देशों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं। ऐसे वातावरण में सभी सदस्य देशों को एक साझा दस्तावेज पर सहमत कराना आसान काम नहीं था। भारत ने किसी एक देश को कठघरे में खड़ा करने के बजाय आतंकवाद, युद्ध, आर्थिक दबाव और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे व्यापक मुद्दों पर सहमति बनाने का रास्ता चुना। यही भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी विशेषता रही।
घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा और सीमा पार आतंकवाद सहित आतंकवाद के किसी भी रूप के खिलाफ शून्य सहनशीलता का संदेश भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। आतंकवाद के वित्तपोषण और उसे संरक्षण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत पर जोर देकर ब्रिक्स ने यह संकेत दिया है कि आतंकवाद केवल किसी एक देश की सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए चुनौती है। यह भारत के लिए इसलिए भी बड़ी उपलब्धि है क्योंकि आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर लंबे समय से वह अधिक स्पष्ट और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग करता रहा है।
ब्रिक्स घोषणापत्र का एक और महत्वपूर्ण पक्ष संयुक्त राष्ट्र और उसकी प्रमुख संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर सहमति है। सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका का समर्थन वैश्विक शासन व्यवस्था में बदलाव की बढ़ती मांग को दर्शाता है। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि वर्तमान वैश्विक संस्थाएं आज की दुनिया की वास्तविकताओं का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। जब विश्व की आर्थिक और जनसंख्या संबंधी तस्वीर बदल चुकी है, तब निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी इसका प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वैश्विक दक्षिण को केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं बल्कि नियम तय करने वाला बनना होगा।
प्रधानमंत्री का यह संदेश ब्रिक्स की मूल भावना से भी जुड़ा हुआ है। भारत ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स किसी देश के खिलाफ बनाया गया मंच नहीं है। इसका उद्देश्य परस्पर सहयोग, विकास और वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए संवाद को बढ़ावा देना है। यह रुख ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ व्यापार, शुल्क और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को लेकर दुनिया में तनाव बढ़ा हुआ है। घोषणापत्र में एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों, मनमाने शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं का विरोध तथा विश्व व्यापार संगठन में सुधार की आवश्यकता पर जोर देकर ब्रिक्स देशों ने नियम आधारित और अधिक संतुलित वैश्विक व्यापार व्यवस्था की मांग रखी है।
आर्थिक क्षेत्र में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और सीमा पार भुगतान व्यवस्था को तेज तथा सरल बनाने पर जोर भी भविष्य की दिशा का संकेत देता है। इसका उद्देश्य डॉलर आधारित व्यवस्था को तत्काल समाप्त करना नहीं बल्कि देशों के बीच व्यापार के लिए अधिक विकल्प तैयार करना है। यदि ब्रिक्स देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान की व्यवस्था को मजबूत करते हैं तो इससे आपसी आर्थिक निर्भरता बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नई व्यवस्थाओं को गति मिल सकती है। ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी सम्मेलन में महत्वपूर्ण चर्चा हुई। ऊर्जा का निर्बाध प्रवाह, महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं पर जोर पश्चिम एशिया के तनाव की पृष्ठभूमि में विशेष महत्व रखता है।
फिलिस्तीन के मुद्दे पर दो-राष्ट्र समाधान और संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की पूर्ण सदस्यता के समर्थन से ब्रिक्स ने पश्चिम एशिया में संवाद और कूटनीति के माध्यम से दीर्घकालिक शांति की जरूरत दोहराई है। भारत ने भी लगातार यही रुख अपनाया है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता और बातचीत तथा कूटनीति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस दृष्टिकोण से भारत एक ऐसे देश के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है जो अलग-अलग पक्षों के बीच संवाद का रास्ता खुला रखने में विश्वास करता है।
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय मुलाकात भी विशेष चर्चा में रही। दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने और मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने पर जोर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि दोनों देशों के संबंधों के निरंतर विकास के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता आवश्यक है। उन्होंने आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित के सिद्धांतों का पालन करने की जरूरत भी बताई। चीन के राष्ट्रपति ने दोनों देशों के एक-दूसरे की ताकत से सीखने और साझा विकास की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। इस बातचीत से यह संकेत जरूर मिला कि दोनों देश तनाव कम करने और संबंधों में व्यावहारिक सुधार की संभावनाएं तलाश रहे हैं, हालांकि सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दों का समाधान समय और निरंतर संवाद से ही संभव होगा।
भारत-चीन संबंधों में सामान्य स्थिति की ओर बढ़ने का एक संकेत दोनों देशों के बीच हवाई संपर्क की बहाली भी है। चीन की विमानन कंपनी द्वारा 21 सितंबर से ग्वांगझू और नई दिल्ली के बीच नियमित उड़ान सेवा फिर शुरू करने की घोषणा दोनों देशों के लोगों और व्यापारिक संबंधों के लिए सकारात्मक कदम है। कोविड महामारी के बाद निलंबित हुई उड़ान सेवाओं और सीमा तनाव के कारण दोनों देशों के बीच संपर्क प्रभावित हुआ था। हवाई संपर्क की बहाली से व्यापार, पर्यटन और लोगों के बीच संबंधों को गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की आर्थिक स्थिति से जुड़ी एक और सकारात्मक खबर सामने आई है। चार सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 44.9 अरब डॉलर बढ़कर 785.7 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। इस वृद्धि के साथ भारत विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस को पीछे छोड़कर दुनिया का चौथा सबसे बड़ा भंडार रखने वाला देश बन गया है। भारत से आगे चीन, जापान और स्विट्जरलैंड हैं। विदेशी मुद्रा भंडार में इतनी बड़ी वृद्धि ऐसे समय हुई है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई तरह की अनिश्चितताओं से गुजर रही है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार भारत को वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव के दौरान अपनी मुद्रा और अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूती से संभालने की क्षमता देता है।
ब्रिक्स सम्मेलन की तस्वीर को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारत के सामने केवल एक शिखर सम्मेलन की सफलता नहीं बल्कि वैश्विक नेतृत्व की नई संभावना दिखाई देती है। आतंकवाद के खिलाफ साझा सहमति, पहलगाम हमले की निंदा, सुरक्षा परिषद में भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन, वैश्विक दक्षिण को निर्णय प्रक्रिया में अधिक अधिकार देने की आवाज, आर्थिक व्यवस्था में सुधार की मांग, पश्चिम एशिया में संवाद और शांति का आग्रह तथा चीन के साथ संबंधों में तनाव कम करने की कोशिश, इन सभी घटनाओं को एक साथ रखकर देखा जाए तो भारत की कूटनीति का व्यापक स्वरूप सामने आता है।
भारत की ताकत केवल आर्थिक विकास या सैन्य क्षमता में नहीं बल्कि अलग-अलग विचारधारा और हित रखने वाले देशों को संवाद की मेज पर लाकर सहमति बनाने की क्षमता में भी दिखाई दे रही है। दिल्ली घोषणापत्र इसी क्षमता का प्रमाण है। आने वाले समय में ब्रिक्स कितना प्रभावी वैश्विक मंच बनता है, यह उसके सदस्य देशों की घोषणाओं को वास्तविक नीतियों में बदलने की क्षमता पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि नई दिल्ली में हुए सम्मेलन ने भारत को केवल मेजबान देश के रूप में नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में एक सक्रिय, संतुलित और निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। यही इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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