विविधता में एकता की परिचायक राष्ट्र भाषा हिन्दी …..

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-गोविन्द शर्मा
भारत की एकता उसकी विविधता में है, पर इस विविधता को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक मात्र हिन्दी भाषा है।देश का बड़ा वर्ग इस भाषा को समझता है। जनगणना के अनुसार देश के लगभग 44% लोग हिन्दी को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं और 70% से अधिक लोग उसे समझते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक जब एक मजदूर, एक सैनिक, एक व्यापारी आपस में बात करता है तो वह हिन्दी का ही सहारा लेता है। हिन्दी जन-जन की भाषा है। इसका प्रचलन बढ़ने से उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम का भाषाई अंतर घट ने लगा है हिन्दी से ही राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होना सम्भव है। हिन्दी का प्रचलन बढ़ाने का अर्थ किसी अन्य भारतीय भाषा या अंग्रेजी का विरोध नहीं है। इसका अर्थ है – अपने देश में अपनी भाषा को उसका सम्मानित स्थान दिलाना। आवश्यकता इस बात की है कि हम सरकारी कामकाज में, शिक्षा में, और सबसे महत्वपूर्ण – हम दैनिक जीवन में हिन्दी को अपनाएं। अपने बच्चों से हिन्दी में संवाद करें, हस्ताक्षर हिन्दी में करें, दुकानों के नामपट्ट हिन्दी में लगाएं।
जिस देश की अपनी भाषा नहीं, उसका अपना भविष्य भी नहीं होता। इसलिए देश के स्वाभिमान, एकता और सर्वांगीण विकास के लिए हिन्दी का प्रचलन बढ़ना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी देश की पहचान उसकी भाषा से होती है। भाषा सिर्फ बोलने का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कार और स्वाभिमान की आत्मा होती है। भारत के लिए वह आत्मा हिन्दी है। हिन्दी की प्रगति तीन चरणों में देखी जा सकती है:साहित्यिक प्रगति:कबीर, सूर, तुलसी और मीरा ने हिन्दी को भक्ति की भाषा बनाया। प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला ने उसे आधुनिक साहित्य की ऊँचाई दी। आज हिन्दी साहित्य का अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में हो रहा है।राष्ट्रीय प्रगति:स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी ने पूरे देश को एक धागे में पिरोया। गांधी जी ने कहा था – “हिन्दी जनमानस की भाषा है।” 14 सितम्बर 1949 को इसे राजभाषा का दर्जा मिला, जो इसकी सबसे बड़ी संवैधानिक प्रगति थी।
– आज हिंदी प्रचलन तेजी बढ़ रहा है अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है।फिजी और मॉरीशस में इसे राजकीय सम्मान प्राप्त है।
– इंटरनेट पर हिन्दी सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है। गूगल, यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर बहुत लोकप्रियता मिल रही है।ज्यादा भारतीय हिन्दी में ही कंटेंट देखना पसंद करते हैं।
-वर्तमान में हिन्दी रोजगार की भाषा है – अनुवाद, पत्रकारिता, सिनेमा, डबिंग और कंटेंट क्रिएशन में लाखों युवाओं को रोजगार दे रही अंग्रेजी हमें दुनिया से जोड़ती है, पर हिन्दी हमें भारत से जोड़ती है। तमिलनाडु का व्यक्ति कश्मीर में जाकर हिन्दी में ही बात करता है।
आज जापान, चीन और फ्रांस भी अपनी भाषा में ही तरक्की कर रहे हैं। अपनी भाषा में काम करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और मौलिक सोच पैदा होती है।
हिन्दी हमारे देश की सांकृतिक धरोहर है हिन्दी में हमारे त्योहार, रीति-रिवाज और मूल्य रचे बसे हैं। ‘रामचरितमानस’ की एक चौपाई जो बात समझा देती है, वह अंग्रेजी के पन्नों में भी समझ में नहीं आती।
हिन्दी की प्रगति किसी अन्य भाषा का विरोध नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ना है। हमें हिन्दी को केवल 14 सितंबर को याद नहीं करना, बल्कि रोज जीना होगा।

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