– बाल मुकुन्द ओझा
भारत में बच्चों को मोबाइल और टीवी देखने की पूरी आज़ादी है। यहाँ उम्र की कोई बाधा नहीं है। सच तो यह है भारत में बच्चों का बचपन आभासी दुनियां में खो गया है। बच्चों में ज्यादा स्क्रीन टाइम को लेकर होने वाले दुष्परिणामों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार देशवासियों को सचेत कर रहे है। अब एम्स की एक स्टडी रिपोर्ट में भी इस खतरे से सचेत किया गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स की एक नई स्टडी में सामने आया है कि 1 साल से कम उम्र के बच्चों में ज्यादा स्क्रीन टाइम से 3 साल की उम्र तक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। डॉक्टर्स की मानें तो बच्चों की कम उम्र में स्क्रीन के अधिक संपर्क में रहने से बच्चों के दिमाग के विकास और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय भी बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करने को लेकर गाइडलाइन जारी कर चुका है। स्टडी से पता चला है कि जितनी जल्दी और जितनी ज्यादा देर के लिए आपके बच्चे को स्क्रीन टाइम दिया, उन बच्चों में ऑटिज्म के साथ कनेक्शन ज्यादा पाया गया है। इसलिए महत्वपूर्ण है कि स्क्रीन टाइम कम करना है।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस के मुताबिक 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। 18 महीने से 6 साल के बच्चों के लिए सीमित और एक्टिव स्क्रीन देने की सलाह दी जाती है। वहीं जब बच्चा 7 साल से ज्यादा हो जाए तो स्क्रीन टाइम को अधिकतम 2 घंटे तक सीमित किया जा सकता है। इसके साथ ही माता पिता को बच्चों की एक्टिविटी पर नजर रखना जरूरी है। बच्चे क्या देखकर हैं ये आपको पता होना चाहिए। बच्चों को वही दिखाएं जो उनके लिए सही है। बेहतर होगा कि हम बच्चे से बातें करें, जितना ज्यादा आप बच्चे से बात करेंगे बच्चे का विकास बेहतर होगा।
दरअसल, बच्चों के लिए मोबाइल फोन और टीवी का आकर्षण अब आम बात हो गई है। अभिभावक भी अपने काम के चक्कर में बच्चों को मोबाइल फोन देकर या टीवी के सामने बैठा देते हैं। इसका बच्चों पर बहुत खराब असर पड़ता है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम आंखों की रोशनी, नींद की समस्याओं और मोटापे का कारण बन सकता है। स्क्रीन के सामने अधिक समय बिताने से बच्चों के सोशल स्किल कमजोर हो सकते हैं। सोशल मीडिया और विज्ञापनों के माध्यम से बच्चे अवास्तविक अपेक्षाएं पाल सकते हैं।
स्क्रीन टाइम ज्यादा होने का सबसे पहला असर बच्चों की आंखों की रोशनी पर पड़ रहा है। स्क्रीन को नजदीक और एकटक देखने से आंखें ड्राई होने लगती हैं यही हालात रहने पर आंखों की रोशनी कम होने लगती है। मोबाइल बच्चों का दोस्त है या दुश्मन। बिना विलंब किए अभिभावकों को इस पर गहनता से मंथन की जरुरत है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।
देश में इंटरनेट के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल में बचपन खोता जा रहा है जिसकी परवाह न सरकार को है और न ही समाज इससे चिंतित है। ऐसा लगता है जैसे गैर जरुरी मुद्दे हम पर हावी होते जारहे है और वास्तविक समस्याओं से हम अपना मुंह मोड़ रहे है। यदि यह यूँ ही चलता रहा तो हम बचपन को बर्बादी की कगार पर पहुंचा देंगे। देश के साथ यह एक बड़ी नाइंसाफी होगी जिसकी कल्पना भी हमें नहीं है। जब से इंटरनेट हमारे जीवन में आया है तबसे बच्चे से बुजुर्ग तक आभासी दुनियां में खो गए है। हम यहाँ बचपन की बात करना चाहते है। देखा जाता है पांच साल का बच्चा भी आँख खोलते ही मोबाइल पर लपकता है। पहले बड़े इसे अपने काम के लिए करते थे। अब बच्चे भी इंटरनेट के शौकीन होते जा रहे हैं। बाजार ने उनके लिए भी इंटरनेट पर इतना कुछ दे दिया है कि वह पढ़ने के अलावा बहुत कुछ इंटरनेट पर करते रहे हैं। पेरेंट्स को बच्चों की ऐसी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए और समय रहते उनकी ऐसी आदत को पॉजेटिव तरीके से दूर करना चाहिए।

बढ़ते स्क्रीन टाइम के खतरे से अनजान बच्चों का बचपन
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