करारी हार के बाद अपना वजूद खोता वामपंथी आंदोलन

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– बाल मुकुन्द ओझा
बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरलम में करारी हार के बाद अब कम्युनिष्टों को देश के लोगों ने पूरी तरह सत्ता से बाहर कर दिया है। कम्युनिष्टों की राजनीति तीन लोक से न्यारी है। भाजपा के विरोध के चलते कम्युनिष्ट इंडिया गठबंधन में शामिल है मगर केरल और बंगाल में एक दूसरे के जानी दुश्मन है। एके गोपालन, नंबूद्रीपाद, ज्योति बसु और हर किशन सिंह सुरजीत सरीखे सर्वमान्य नेता अब पार्टी में नहीं रहे है। ऐसा लगता है मौजूदा नेतृत्व दिग्भ्रमित है। कम्युनिष्टों के इस दोहरे चरित्र के कारण वे सियासत से लुप्त होने के कगार पर है।
अच्छा होता वामपंथी तीसरा मोर्चा बना कर चुनाव लड़ते तो उनकी इज्जत बच सकती थी। वामपंथी पिछले दस वर्षों से केरल की सत्ता पर काबिज थे जिन्हें उनके इंडिया गठबंधन के ही एक घटक कांग्रेस ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बंगाल के चुनाव में भी कांग्रेस और वामपंथियों ने मिलकर चुनाव नहीं लड़ा जिसके फलस्वरूप कभी वर्षों तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहे दोनों पार्टियों का सूपड़ा साफ़ हो गया। आश्चर्य है जिस एक मात्र राज्य में कम्युनिष्ट सत्तारूढ़ थे उस राज्य में उसकी साथी पार्टी ही उसे नेस्तनाबूद कर दिया। केरल और बंगाल में वामपंथी और कांग्रेसी एकदूसरे को भरपूर गलियों से नवाज रहे है मगर दिल्ली में बैठकर गलबहियां बढ़ा रहे है। ऐसा दोहरा चरित्र देश में अन्य दलों में देखना दुर्लभ है।
भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन इस समय अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है। देश के गरीब, मजदूर और मेहनतकश वर्गों की लड़ाई में अगुवा रहने वाली वामपंथी पार्टियां लगता है अब अंतिम सांसे ले रही है। कम्युनिस्ट आंदोलन की विदाई दुखद और कष्टकारक है। सोवियत रुस और चीन के नक्शेकदम पर चलने वाली कम्युनिष्ट पार्टी ने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था। आजादी के बाद कम्युनिष्ट दो भागों में बंट गए थे। एक स्थिति ऐसी भी आयी कि कम्युनिष्टों को प्रधान मंत्री का पद भी प्रस्तावित किया गया था। हालाँकि बाद में देश के गृह मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष का पद उन्होंने ग्रहण किया था। पिछले तीन लोकसभा चुनावों में निरंतर ह्रास के बाद वामपंथी हासिये पर आ गए। कभी तीन राज्यों में सरकार, संसद में 64 का आंकड़ा पार करने वाली और देश को गृह मंत्री तथा लोकसभा स्पीकर देने वाली कम्युनिष्ट पार्टिया आज एक अदद सीट के लिए हाथ फैलाने को मजबूर है। कहने को वामपंथी पार्टियां इंडिया गठबंधन में शामिल है। मगर बंगाल और केरल में वामपंथियों को अपने ही साथी घटक दलों से टकराना पड़ रहा है। बंगाल में 1977 से 2011 तक कुल 34 वर्षों तक कम्युनिष्टों का एकछत्र राज रहा है। 34 साल के लम्बे शासन को तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने उखाड फेंका। आज यह स्थिति है कि बंगाल की विधानसभा में नाममात्र की उपस्थिति और देश की लोकसभा में यहाँ से एक भी सदस्य नहीं है। त्रिपुरा में 1978–1988 और 1993 to 2018 तक कम्युनिष्टों का आधिपत्य रहा है। इतनी लम्बी अवधि तक त्रिपुरा में राज करने वाली वामपंथी पार्टियों का यहां से भी एक भी लोकसभा सदस्य नहीं है। यही स्थिति केरल की है। केरल में कम्युनिष्ट सत्ता से बाहर हो गए है, यहाँ लोकसभा की एक सीट ही इनके पास है। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है इंडिया गठबंधन में होने के बावजूद केरल में कांग्रेस और कम्युनिष्ट आपस में ही एक दूसरे को चुनौती दे रहे है। वर्तमान लोकसभा में कम्युनिष्टों के पास पांच सीटें है। इनमें चार सीटें द्रमुक की मेहरबानी से तमिलनाडु में है। बंगाल त्रिपुरा और केरल में राज करने वाले कम्युनिष्टों के पास मात्र एक लोकसभा की सीट है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि कम्युनिष्ट पार्टियां इस समय दो राह पर खड़ी है। बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिष्ट पार्टियां अपने सबसे बुरे दौर में है जहां उनके पास लोकसभा की एक भी सीट नहीं है। वहीं केरल में दस साल सत्ता में रहने के बावजूद उनके पास मात्र एक लोकसभा की सीट है। पार्टियां कहने को कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में शामिल है। मगर जिन राज्यों में उनका थोड़ा बहुत जनाधार बचा है, वहां उनका सीधा चुनावी संघर्ष कांग्रेस या गठबंधन के अन्य घटक दलों से है।

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