बाल मुकुन्द ओझा
आज भारतीय इतिहास के एक महान नायक, जननायक और आदिवासी समाज के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा का शहीद दिवस है। अंग्रेजों के खिलाफ जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ने वाले बिरसा मुंडा की मौत बहुत ही रहस्यमय और दुखद परिस्थितियों में हुई। उन्हें 3 फरवरी 1900 को ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार किया था और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मौत हो गई उस समय वे सिर्फ 25 साल के थे। ब्रिटिश अधिकारियों का दावा था कि उनकी मौत हैजा से हुई, लेकिन इतिहासकारों और कई स्थानीय कथाओं के अनुसार उन्हें धीमा ज़हर देकर मारा गया। बिरसा मुंडा ने अपने छोटे से जीवन में झारखंड, बिहार, ओडिशा और बंगाल के आदिवासियों को एकजुट किया और ब्रिटिश सत्ता के शोषण के खिलाफ ‘उलगुलान’ (महाविप्लव) शुरू किया। उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, बल्कि ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के धर्मांतरण का भी विरोध किया और आदिवासी पहचान और परंपराओं को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। इस दिन हम उनके अद्वितीय साहस, अदम्य भावना और अंग्रेजों के खिलाफ उनके कार्यों को याद करते हैं। मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो वीरता और क्रांति का परिचय दिया, वह सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा।
देश में ऐसे बहुत कम लोग हुए जिन्हें लोगों ने भगवान का दर्ज़ा दिया। इनमें जनजाति अस्मिता के नायक बिरसा मुंडा का नाम सर्वोपरि है। पूरे देश में भगवान बिरसा मुंडा को महान क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है। झारखंड के उलिहातु में 15 नवम्बर 1875 में उनका जन्म हुआ था। बिरसा मुंडा देश के इतिहास में ऐसे नायक थे जिन्होंने आदिवासी समाज की दिशा और दशा बदल कर रख दी थी। उन्होंने आदिवासियों को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त होकर सम्मान से जीने के लिए प्रेरित किया था। अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी आंदोलन के लोकनायक थे बिरसा मुंडा। भगवान बिरसा मुंडा का जीवन किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं है। उनका पूरा जीवन देशवासियों को अदम्य साहस, संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध रहने का संदेश देता है। अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी आंदोलन के लोकनायक थे बिरसा मुंडा।
जनजाति समाज के भगवान माने जाने वाले बिरसा मुंडा के शहीदी दिवस के अवसर पर देश को आदिवासियों की दशा और दिशा पर स्वतंत्र चिंतन मनन की जरुरत है। आज़ादी के बाद से ही यह समुदाय पग पग पर छला गया और सियासत की ठगी का शिकार बना, मगर आज भी आर्थिक और सामाजिक प्रगति की बाट जोह रहा है यह समुदाय। चुनावों के दौरान आदिवासी सियासत को लेकर देश में गर्माहट और छटपटाहट देखने को मिलती है। सच तो यह भी है इनके साथ छल करने वाले और कोई नहीं अपितु इनके ही समुदाय के कथित नेता है जो सत्ता और वोटों के लालच में अपने लोगों को गिरवी रख देते है। सामाजिक बराबरी के लिए आज जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के रखवाले आदिवासियों के आर्थिक सामाजिक और शैक्षिक विकास की जरुरत है। जनजातियों का भारत की स्वतंत्रता और समृद्धि में बहुत बड़ा योगदान है। दुनिया के लगभग 90 से अधिक देशों मे आदिवासी समुदाय की आबादी लगभग 37 करोड़ है। आज आदिवासियों की दशा और दिशा पर गहन चिंतन और मंथन की जरुरत है। आदिवासी समुदाय को प्रकृति का सबसे करीबी माना जाता है। इस समुदाय ने संसाधनों के आभाव में भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। भारत में आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह जनजाति लोगों का एक ऐसा समूह है, जिनकी भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भिन्न है। मगर देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना उनमें कूट कूट कर भरी है। प्रकृति के सवसे करीब होने के साथ ही इस समुदाय का गीत, संगीत और नृत्य से सदा ही गहरा लगाव रहा है। वर्षो पूर्व जब अंग्रेज इस देश को गुलाम बनाकर शासन करने आये तो यहाँ के आदिवसियों ने ही सबसे पहले सशत्र विरोध कर स्वतन्त्रता संग्राम का बिगुल फूंका था। कालांतर में यह वर्ग देश की प्रगति और विकास से समान रूप से नहीं जुड़ पाया। आजादी के आंदोलन में आदिवासियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो, सिद्धु-कान्हू नाम के दो भाईयों के नेतृत्व में 30 जून 1855 को संथाल परगना में सशत्र विद्रोह किया गया जिसमें अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंची थी। इस लड़ाई ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। अंग्रेजों से लड़ते हुए तकरीबन बीस हजार लोगों ने अपनी जान दे दी थी। इस विद्रोह को इतिहास में संथाल विद्रोह के रूप में जाना जाता है।



