-अशोक गहलोत के हालिया बयानों से कांग्रेस में नई चर्चा शुरू।
-सचिन पायलट की चुप्पी को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई अटकलें।
-प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर फिर तेज हुईं चर्चाएं।
जयपुर। राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। वर्ष 2020 के राजनीतिक संकट से जुड़े पुराने वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किए जा रहे हैं। खास बात यह है कि इन वीडियो को पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता और समर्थक भी बड़े पैमाने पर प्रसारित कर रहे हैं, जिससे वर्षों पुराना विवाद फिर सुर्खियों में लौट आया है।
हाल के दिनों में पूर्व मुख्यमंत्री Ashok Gehlot के कुछ बयानों को राजनीतिक हलकों में खास नजर से देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इन टिप्पणियों ने उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर बड़ा टकराव सामने आया था। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या उस अध्याय को वास्तव में बंद माना जाए या उसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि अब भी बनी हुई है।
दूसरी ओर, Sachin Pilot ने पूरे घटनाक्रम पर सार्वजनिक तौर पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी है। उनकी यह चुप्पी राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। माना जा रहा है कि पायलट फिलहाल टकराव की राजनीति से दूरी बनाकर संगठनात्मक भूमिका पर अधिक फोकस कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पार्टी नेतृत्व के प्रति संयमित रुख अपनाया है, जिससे उनकी राजनीतिक रणनीति पहले की तुलना में अलग दिखाई देती है।
कांग्रेस के भीतर आज भी 2020 के घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग राय मौजूद है। एक वर्ग मानता है कि उस समय राजनीतिक फैसले जल्दबाजी में लिए गए थे, जबकि दूसरा वर्ग इसे नेतृत्व और सम्मान से जुड़े संघर्ष के रूप में देखता है। यही वजह है कि यह मुद्दा समय-समय पर फिर चर्चा में आ जाता है।
इसी बीच संगठन में संभावित बदलावों को लेकर भी अटकलें तेज हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय से चर्चाएं चल रही हैं और माना जा रहा है कि आगामी चुनावी चुनौतियों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व संगठनात्मक फेरबदल पर विचार कर सकता है। यदि भविष्य में पायलट को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी जाती है, तो इसे राजस्थान की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसा कोई भी फैसला प्रदेश कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि पार्टी के विभिन्न गुट संगठन में संभावित बदलावों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।
कांग्रेस की रणनीति फिलहाल आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर संगठन को मजबूत करने की है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुटीय मतभेद बार-बार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनते रहे, तो इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राजस्थान में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि आंतरिक एकजुटता बनाए रखना है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या गहलोत और पायलट के बीच राजनीतिक मतभेद पूरी तरह अतीत की बात हो चुके हैं, या फिर नेतृत्व और संगठन को लेकर प्रतिस्पर्धा अब भी जारी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पुराने वीडियो, नेताओं के बयान और कार्यकर्ताओं की सक्रियता इस बहस को लगातार जीवित रखे हुए हैं।
अब सबकी निगाहें Indian National Congress के शीर्ष नेतृत्व पर हैं, जिसे राजस्थान में संगठनात्मक संतुलन और भविष्य की रणनीति को लेकर अहम निर्णय लेने हैं।



