हर देश की संस्कृति में कुछ पर्व त्यौंहार और विशिष्ट उत्सवों का समायोजन किया जाता है ताकि जीव जगत को नई दिशा, प्रकाश का नया मार्ग मिल सके। चारों और उल्लास, उमंग का वातावरण बन सके और वह जीवन में खुशियों के गुलाल बीखेर सके। भारत देश वैसे भी पर्व एवं त्योहारों का देश है, जिसमें अक्षय तृतीया एक ऐसा ही पर्व है जिसके साथ जुड़ा है एक इतिहास, एक संस्कृति, एक सभ्यता और एक परंपरा। अक्षय तृतीया संस्कृत शब्द है, जहां अक्षय का अर्थ है शाश्वत, जो कभी कम ना हो। ‘न क्षय इति अक्षय’ यानी जिसका कभी क्षय ना हो वह अक्षय है, सदा सर्वदा के लिए जीवित।
जैन परंपरा अनुसार यह पर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ के वर्षी तप के पारणे का दिन है। ऋषभ उस समय अवतरित हुए जब एक नए संसार की रचना की जरूरत थी। वृषभ इसके सूत्रधार बने। ऋषभ ने धर्म-कर्म के मर्म को, असि-मसि-कृषि से जीवन यापन की पद्धति को समझाया। ऋषभ ने अपनी अबोध जनता को माता का प्यार, पिता की तरह जिम्मेदारी, गुरु की तरह विद्यार्थी को ज्ञान और प्रजा पर राजा का कर्तव्य का प्रशिक्षण और ज्ञान दिया। उन्हें जीने की नई दिशाएं प्रदान की। समाज और राजव्यवस्था को संगठित और सुव्यवस्थित किया। वैदिक ग्रंथ भागवत में ऋषभ, जैन धर्म के आद्य प्रवर्तक होने से श्री आदिनाथ, दिगंबर आम्नाए में वृषभदेव कहलाए। भारतीय परंपरा में नाथ अनेक हुए हैं पर आदिनाथ संबोधन भगवान ऋषभ के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। जन्मोत्सव के दौरान ऋषभ ने खाने के लिए सबसे पहले गन्ने का टुकड़ा उठाया। ऋषभ को इक्षु प्रिय है अतः आगे इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश हुआ।
समय के साथ कुलकर नाभि के पास समस्याओं के निराकरण की शिकायतें आने लगीं मगर उनके पास कोई समाधान नहीं था। ऋषभ के पास इस विषय पर चर्चा चली, तो ऋषभ ने कहा समय के साथ व्यवस्था बदलनी पड़ती है। अपनी आदतों में परिवर्तन करना पड़ता है। अब कुलकर व्यवस्था के स्थान पर राज व्यवस्था होने से ही समस्याएं सुलझ सकती हैं। ऋषभ ने राजा का दायित्व बताया। कुलकर नाभी ने ऋषभ का राज्याभिषेक किया। ऋषभ के पास सबसे पहला काम था खाद्य संकट मिटाने का। ऋषभ ने कहा समय बदल गया है अतः अपने को बदलो। अब हमें श्रम करना होगा, खेतों में अनाज बोना होगा। अतः सब श्रम करो, सुख से जियो।
लोगों का बौद्धिक विकास नहीं के बराबर था। जितना बताया जाता उतना ही समझते, उसके अलावा आस-पास की बातें उनके चिंतन से बाहर थी। खेती पकने के बाद उसे काट कर अनाज निकालने की विधि स्वयं ऋषभ ने बताई। बैलों को अनाज के ढेर पर घुमा कर अनाज एवं भूसा निकालकर अलग किया जाता, परंतु बैलों को भूख लगने पर वह उसी अनाज को खाने लगे जिससे लोगों में चिंता की लहर दौड़ गई कि सारा अनाज बैल खा जाएंगे, तो हम क्या खाएंगे। ऋषभ ने इसके निराकरण के लिए किसानों से कहा बैलों के मुख पर घास की रस्सियों की छींकी बनाकर लगा दो फिर नहीं खाएंगे। छींकी लगा देने के बाद बारह घंटे तक बैलों से काम करवा कर जब उनके आगे चारा डाला गया तो बैलों ने नहीं खाया। नई समस्या खड़ी हो गई। सब ऋषभ के पास गए और पूरी बात बताई। ऋषभ ने स्थिति को समझा, इनमें ज्ञान का विकास नहीं है। ऋषभ के कहने पर किसानों ने छींकी खोली तब जाकर बैलों ने चारा खाया। ऋषभ ने अग्नि की उत्पत्ति के विषय में कहा यह मानवीय सभ्यता तथा समृद्धि की आधार मानी जाएगी।
ऋषभ ने सुरक्षा व्यवस्था (असि कर्म), लिखा-पढ़ी (मसि कर्म), खाद्यान्न उत्पादन (कृषि कर्म) और सेवा व्यवस्था का आविष्कार किया। ऋषभ ने दंड विद्या, कला- प्रशिक्षण आदि को स्थापित किया। असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छः कर्मों का उपदेश दिया और अनेकों पाप रहित आजीविका के उपाय बताए। उनका परिवार संस्कारी था। ऋषभ ने पुत्र और पुत्री को समानता का दर्जा दिया। दोनों को ही उचित शिक्षा देकर अपने-अपने कर्म क्षेत्रों में निष्णात बनाया। ऋषभ ने अपनी दोनों पुत्रियों ब्राह्मी एवं सुंदरी को अठारह प्रकार की लिपियां, गणित एवं स्त्रियों की चौंसठ कलाओं का ज्ञान दिला कर स्त्री शिक्षा का प्रचार किया। भगवान ऋषभ के जेष्ठ पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत प्रसिद्ध हुआ।
तात्कालिक व्यवहारिक जीवन की कठिनाइयों का समाधान करने के बाद ऋषभ ने धर्म नीति का प्रवर्तन करने का निश्चय किया। लोगों को पीड़ा हुई कि ऋषभ उनको छोड़कर जा रहे हैं। चैत्र कृष्ण अष्टमी के दिन चार हजार लोगों के साथ ऋषभ ने अभिनिष्क्रमण किया। ऋषभ ने संपूर्ण वस्त्राभूषण उतार कर के केश लुंचन किया। जब सिर के आगे, दाएं, बाएं और पीछे के केश लुंचन के बाद मध्य के केसों का लुंचन करने लगे तो इंद्र ने कहा इन्हें रहने दीजिए यह बहुत सुंदर लगते हैं। संभवत शिखा की परम्परा वहीं से चली है।
दीक्षा के साथ ही ऋषभ के पूर्व अर्जित अंतराय कर्म का विपाकोदय हो गया था। लोग भिक्षा विधि से अपरिचित थे। ऋषभ जब घर-घर भिक्षा के लिए जाते, तो किसी ने हाथी, किसी ने घोड़ा किसी ने रथ तो किसी ने उन्हें नंगे पैर देखकर रत्न जड़ित पादुका, किसी ने मुकुट, किसी ने नाना प्रकार के आभूषण दिए, किंतु ऋषभ के प्रति अपार श्रद्धा रखते हुए भी आहार-पानी (खाने-पीने) के लिए किसी ने नहीं कहा। ऋषभ को अभी भी वे अपना राजा ही मान रहे थे।
शुद्ध आहार के अभाव में ऋषभ को बिना खाए पिए बारह मास बीत गए। यह बारह मास उस बारह घंटे की अवधि का फल है जिसमें ऋषभ ने कृषि शिक्षा में बारह घंटे तक बैलों को छींकी बंधवाई थी। बारह घंटे के अंतराय कर्म बारह मास में पूरे हुए। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन हस्तिनापुर में प्रभु भिक्षा के लिए घर-घर गवेषणा कर रहे थे। प्रातः काल ऋषभ भिक्षा के लिए राजपथ पर घूम रहे थे तभी उनके प्रपौत्र श्रेयांश की नजर उन पर पड़ी और उसे अपने परदादा ऋषभ नजर आए। जाति स्मरण ज्ञान से श्रेयांश कुमार ने जाना कि प्रभु प्रासुक (निर्दोष) आहार की गवेषणा कर रहे हैं और लोग उनकी भिक्षा विधि से अनजान हैं।
तत्काल श्रेयांस कुमार नीचे उतर कर ऋषभ के चरणों में विधिवत वंदना कर आहार (भोजन करने) के लिए प्रार्थना की। श्रेयांस कुमार ने राज महल में प्रासुक आहार के रूप में इक्षु रस को देखा। इक्षु रस के मौसम का अंतिम समय होने के कारण किसान इक्षु रस के घड़े भेट में लाए थे, जो एक ही स्थान पर यथावत रखे थे। श्रेयांश कुमार ने निवेदन किया “भंते! इक्षु रस के 108 घड़े प्रासुक हैं, आप ग्रहण करें।” ऋषभ ने वहां स्थिर होकर दोनों हथेलियों को सटाकर अंजलि बनाकर मुख से लगा लिया। राजकुमार श्रेयांस उल्लसित भावना से इक्षु रस का दान दिया। इस प्रकार इक्षु रस से भगवान में पारणा किया। दान की परम्परा का सूत्रपात हुआ।
दान की महिमा एवं विधि से लोग परिचित हुए। ऋषभ के एक संवत्सर की तपस्या के बाद दान व धर्म की स्थापना हुई। इक्षु रस के दान से वैशाख शुक्ल तृतीया का दिन अक्षय हो गया। इसे इक्षु तीज, आखातीज या अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाने लगा। ऋषभ के वर्षी तप के पारणे का इतिहास इसके साथ जुड़ जाने से यह वर्ष का स्तंभ दिन माने जाने लगा। आज भी जैन धर्म में वर्षी तप (एकांतर) किया जाता है। एक दिन खाना और एक दिन उपवास। साल भर चलने वाले क्रम का पारणा अक्षय तृतीया के दिन इक्षु रस से ही किया जाता है।
पुराणों में भी उल्लेख है कि यह तिथि सर्वकार्य सिद्धि के रूप में भी मनाया जाता है। वैदिक परंपरा में आज के दिन गंगा स्नान तथा पितृ तर्पण का विशेष महत्व माना गया है। यह तिथि पुण्य दायिनी एवं धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से गौरवशाली, पापमोचनी एवं स्वर्गप्रदायिनी है। हिंदू परंपरा में अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ। सतयुग- त्रेता युग का प्रारंभ भी इसी दिन से माना जाता है। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि को सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ है। ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था। कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था। कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। कृषक समुदाय में इस दिन का बड़ा महत्व है। कृषक समुदाय इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। अक्षय तृतीया का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस दिन हमारे यहां मोठ- बाजरी का खीचड़ा, बड़ी (मुंगोड़ी) की सब्जी, दोलड़िया फुल्के, इमलानी (इमली का खट्टा मीठा रस) जैसे पकवान बनाए जाते। आज के दिन गन्ने के रस की विशेष प्रधानता होती है। ठंडी कोरी मटकी में पानी भरा जाता। इमली का रस ठंडी तासीर का होता है। इसे पीने से लू और गर्मी से बचाव होता है। गन्ने का रस गुणकारी होता है। ठंडी कोरी मटकी का पानी भीषण गर्मी में अमृत के समान होता है जो प्यासे कंठों को तर कर देता है। इस प्रकार अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है। यह दिन (तिथि) शुभ कार्यों के लिए अबूझ दिन माना गया है। आज भी अक्षय तृतीया का दिन अनेक घटनाओं व परंपराओं का संगम बना हुआ है।
-अशोक बैद ‘बाडेलावाला’



