पीएम विश्वकर्मा योजना से संवर रही कारीगरों की तकदीर, कौशल को मिल रहा कारोबार का आधार

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-राजस्थान में 2.30 लाख से अधिक कारीगर पंजीकृत, देशभर में चौथे स्थान पर प्रदेश; 62 हजार से अधिक ऋण स्वीकृत और 2.17 लाख से ज्यादा टूलकिट ई-वाउचर जारी
-पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहायता से जोड़ने की पहल, प्रशिक्षण से लेकर स्वरोजगार तक मिल रहा प्रोत्साहन; देश में 30 लाख पंजीकरण का लक्ष्य समय से पहले पूरा

जयपुर। पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों का हुनर भारतीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण ताकत रहा है। बढ़ई, राजमिस्त्री, लोहार, सुनार, दर्जी, कुम्हार और अन्य पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लाखों लोग पीढ़ियों से अपने कौशल के माध्यम से आजीविका अर्जित कर रहे हैं। हालांकि, आधुनिक तकनीक, बेहतर उपकरणों और पर्याप्त पूंजी के अभाव में कई बार इन कारीगरों को अपने व्यवसाय का विस्तार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में संचालित पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक हुनर को आर्थिक मजबूती देने, कारीगरों की कार्यक्षमता बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राजस्थान में भी इस योजना के अंतर्गत पंजीकरण, प्रशिक्षण, टूलकिट सहायता और ऋण स्वीकृति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। प्रदेश में अब तक 2 लाख 30 हजार से अधिक कारीगरों का पंजीकरण हो चुका है। इस उपलब्धि के साथ राजस्थान देशभर में चौथे स्थान पर है। योजना के तहत कारीगरों को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं दी जा रही, बल्कि उनके पारंपरिक कौशल को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने और स्वरोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है। योजना का उद्देश्य ऐसे पारंपरिक कामगारों को सहायता उपलब्ध कराना है, जिनके पास हुनर तो है, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण वे अपने काम को बड़े स्तर पर आगे नहीं बढ़ा पाते। प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों और रियायती ब्याज दर पर ऋण जैसी सुविधाओं के माध्यम से उन्हें अपने व्यवसाय को मजबूत बनाने का अवसर मिल रहा है।

2.30 लाख से अधिक पंजीकरण, राजस्थान देश में चौथे स्थान पर
पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत राजस्थान में कारीगरों और शिल्पकारों को जोड़ने के लिए किए गए प्रयासों के परिणामस्वरूप प्रदेश में 2 लाख 30 हजार से अधिक लाभार्थियों का पंजीकरण हो चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकरण के मामले में राजस्थान चौथे स्थान पर है। यह आंकड़ा प्रदेश में पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कामगारों तक योजना का लाभ पहुंचाने के प्रयासों को दर्शाता है। राजस्थान में बढ़ई और राजमिस्त्री जैसे व्यवसायों से जुड़े कारीगरों की बड़ी संख्या है। योजना के अंतर्गत बढ़ई श्रेणी में 45 हजार 958 और राजमिस्त्री श्रेणी में 38 हजार 450 कारीगरों का पंजीकरण हुआ है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि निर्माण कार्य और लकड़ी से जुड़े पारंपरिक व्यवसाय प्रदेश में योजना के प्रमुख लाभार्थी समूहों में शामिल हैं। पंजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से पात्र कारीगरों को सरकारी सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ने का अवसर मिलता है। इससे उन्हें अपने काम की गुणवत्ता सुधारने, बाजार की जरूरतों के अनुसार कौशल विकसित करने और आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

2 लाख 22 हजार से अधिक लाभार्थियों का बेसिक प्रशिक्षण पूरा
योजना का एक प्रमुख उद्देश्य कारीगरों के पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीक और व्यावसायिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना है। इसी उद्देश्य से लाभार्थियों को बुनियादी और उन्नत प्रशिक्षण उपलब्ध करवाया जाता है। राजस्थान में अब तक 2 लाख 22 हजार 473 लाभार्थियों का बुनियादी प्रशिक्षण पूरा हो चुका है। प्रशिक्षण के दौरान कारीगरों को अपने कार्य में उपयोग होने वाली तकनीकों, उपकरणों के बेहतर इस्तेमाल, उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार और कार्यक्षमता बढ़ाने से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। पारंपरिक व्यवसायों में अनुभव का विशेष महत्व होता है। हालांकि, बदलते समय के साथ काम करने के तरीके, ग्राहकों की पसंद और बाजार की मांग में भी बदलाव आया है। ऐसे में प्रशिक्षण कारीगरों को अपने पुराने अनुभव के साथ नई तकनीक का इस्तेमाल करने में मदद कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, बढ़ई आधुनिक उपकरणों के माध्यम से लकड़ी से संबंधित काम को अधिक सटीकता के साथ कर सकते हैं। इसी प्रकार राजमिस्त्री निर्माण कार्य में नई तकनीकों और उपकरणों का इस्तेमाल कर कार्य की गुणवत्ता बेहतर बना सकते हैं। अन्य पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कामगारों के लिए भी प्रशिक्षण अपने काम को अधिक व्यवस्थित और प्रतिस्पर्धी बनाने का अवसर प्रदान करता है। प्रशिक्षण के माध्यम से कारीगरों को उद्यमशीलता से संबंधित जानकारी देने पर भी जोर दिया जाता है, जिससे वे अपने व्यवसाय को केवल पारंपरिक कार्य तक सीमित रखने के बजाय उसे आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार कर सकें।

टूलकिट सहायता से आधुनिक उपकरण खरीदने में मदद
पारंपरिक कारीगरों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों में बेहतर उपकरणों की उपलब्धता भी शामिल है। कई बार आवश्यक औजारों के अभाव में कारीगर अपने काम को अपेक्षित गति और गुणवत्ता के साथ पूरा नहीं कर पाते। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए पीएम विश्वकर्मा योजना में पात्र लाभार्थियों के लिए टूलकिट सहायता का प्रावधान किया गया है। योजना के तहत पात्र कारीगरों को टूलकिट खरीदने के लिए 15 हजार रुपये तक की सहायता उपलब्ध कराई जाती है। राजस्थान में इस उद्देश्य से अब तक 2 लाख 17 हजार 84 ई-वाउचर जारी किए जा चुके हैं। इस सहायता से पात्र कारीगर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपने व्यवसाय से संबंधित आधुनिक उपकरण प्राप्त कर सकते हैं। बेहतर औजारों की उपलब्धता से कार्य की गुणवत्ता, उत्पादकता और समय प्रबंधन में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं। आधुनिक उपकरणों का लाभ केवल काम की गति तक सीमित नहीं रहता। बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार करने से कारीगरों को ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप काम करने और बाजार में अपनी पहचान मजबूत बनाने में भी सहायता मिल सकती है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पारंपरिक व्यवसाय बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का आधार हैं, वहां टूलकिट सहायता स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकती है।

62 हजार से अधिक ऋण स्वीकृत, कारोबार बढ़ाने का मिल रहा अवसर
किसी भी छोटे व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए पूंजी की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। कारीगरों को अपने काम के विस्तार, आवश्यक सामग्री की खरीद और व्यवसाय से जुड़े अन्य खर्चों के लिए आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है। पर्याप्त पूंजी नहीं होने पर कई बार वे अपने काम को सीमित स्तर पर ही संचालित कर पाते हैं। पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों को रियायती ब्याज दर पर अधिकतम 3 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराने का प्रावधान है। राजस्थान में अब तक 62 हजार से अधिक ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं। यह सुविधा कारीगरों को अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने का अवसर देती है। ऋण के माध्यम से पात्र लाभार्थी अपने काम की जरूरतों के अनुसार उपकरणों, कच्चे माल और व्यवसाय विस्तार से संबंधित आवश्यकताओं पर खर्च कर सकते हैं। योजना में ऋण सहायता का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना और उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने में मदद करना है। हालांकि, ऋण की वास्तविक उपलब्धता और राशि लाभार्थी की पात्रता, निर्धारित शर्तों और स्वीकृति प्रक्रिया पर निर्भर करती है। टूलकिट सहायता, प्रशिक्षण और ऋण जैसी सुविधाओं को एक साथ उपलब्ध कराने का उद्देश्य कारीगरों को केवल तत्काल राहत देना नहीं, बल्कि उनकी दीर्घकालिक आजीविका को मजबूत बनाने के अवसर उपलब्ध कराना भी है।

देशभर में 30 लाख पंजीकरण का लक्ष्य समय से पहले पूरा
पीएम विश्वकर्मा योजना के प्रति देशभर में कारीगरों और शिल्पकारों की भागीदारी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2028 तक 30 लाख कारीगरों एवं शिल्पकारों के पंजीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया था, जिसे तय समय से पहले हासिल कर लिया गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2026 तक देशभर में 30 लाख 3 हजार 925 कारीगर एवं शिल्पकार पंजीकृत हो चुके थे। यह संख्या निर्धारित 30 लाख के लक्ष्य से अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर योजना के अंतर्गत 24.39 लाख से अधिक लाभार्थियों का बुनियादी प्रशिक्षण पूरा हो चुका है। इसके अलावा लगभग 5,350 करोड़ रुपये के 6.23 लाख से अधिक ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं। देशभर में 26.17 लाख से अधिक टूलकिट ई-वाउचर भी जारी किए गए हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि योजना के माध्यम से पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोगों को पंजीकरण से लेकर प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता तक विभिन्न सुविधाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। राजस्थान का चौथे स्थान पर पहुंचना भी इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रदेश की भागीदारी को रेखांकित करता है। प्रदेश में पंजीकरण के साथ बड़ी संख्या में लाभार्थियों का प्रशिक्षण पूरा होना और टूलकिट ई-वाउचर जारी किया जाना योजना के क्रियान्वयन के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

प्रशिक्षण के बाद 93 प्रतिशत लाभार्थियों की आय में वृद्धि का आकलन
योजना के प्रभाव का आकलन केवल पंजीकरण और सहायता के आंकड़ों से ही नहीं, बल्कि लाभार्थियों की आजीविका में होने वाले बदलावों से भी किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आईआईएम मुंबई के समवर्ती मूल्यांकन में सर्वेक्षण में शामिल 93 प्रतिशत लाभार्थियों ने प्रशिक्षण के बाद अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होने की बात कही। यह निष्कर्ष प्रशिक्षण और कौशल विकास के संभावित आर्थिक लाभों की ओर संकेत करता है। हालांकि, यह आंकड़ा सर्वेक्षण में शामिल लाभार्थियों से संबंधित है। इसे योजना के सभी लाभार्थियों की आय में समान वृद्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी, प्रशिक्षण के बाद आय में वृद्धि की जानकारी इस बात को रेखांकित करती है कि कौशल विकास और बेहतर कार्य पद्धतियां कारीगरों की आजीविका सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कारीगरों के लिए बेहतर प्रशिक्षण का अर्थ अपने काम में दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप उत्पाद और सेवाएं उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित करना भी है। इससे उनके व्यवसाय को स्थिरता देने और आय के अवसर बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

पारंपरिक हुनर को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की पहल
भारत में पारंपरिक कारीगरों की भूमिका केवल वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन तक सीमित नहीं है। वे स्थानीय अर्थव्यवस्था, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक तकनीकों को भी संरक्षित रखते हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे इन व्यवसायों में स्थानीय जरूरतों के अनुरूप काम करने की क्षमता होती है, लेकिन बदलते बाजार में टिके रहने के लिए आधुनिक संसाधनों और तकनीक की आवश्यकता भी बढ़ रही है। पीएम विश्वकर्मा योजना इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक कौशल को प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों और वित्तीय सहायता से जोड़ती है। इसका उद्देश्य कारीगरों को अपने व्यवसाय में सुधार करने तथा स्वरोजगार के अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करना है। राजस्थान में बढ़ई और राजमिस्त्री सहित विभिन्न श्रेणियों के कारीगरों का पंजीकरण, बड़ी संख्या में लाभार्थियों का प्रशिक्षण पूरा होना और टूलकिट सहायता के लिए ई-वाउचर जारी किया जाना इस दिशा में महत्वपूर्ण पहलू हैं। योजना का वास्तविक और दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करेगा कि लाभार्थी प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता का उपयोग किस प्रकार करते हैं, उन्हें अपने उत्पादों के लिए बाजार तक कितनी पहुंच मिलती है और उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए अन्य आवश्यक सुविधाएं कितनी प्रभावी ढंग से उपलब्ध होती हैं।

आजीविका संवर्धन और आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
पीएम विश्वकर्मा योजना के माध्यम से पारंपरिक कारीगरों को कौशल विकास, आधुनिक टूलकिट और रियायती ऋण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। इससे उन्हें अपने पारंपरिक व्यवसाय को समय की जरूरतों के अनुरूप विकसित करने का अवसर मिल रहा है। राजस्थान में 2.30 लाख से अधिक पंजीकरण, 2 लाख 22 हजार से अधिक लाभार्थियों का बुनियादी प्रशिक्षण पूरा होना, 62 हजार से अधिक ऋणों की स्वीकृति और 2 लाख 17 हजार से अधिक ई-वाउचर जारी होना योजना के क्रियान्वयन से जुड़े प्रमुख आंकड़े हैं। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर 30 लाख पंजीकरण का लक्ष्य समय से पहले पूरा होना योजना के व्यापक दायरे को दर्शाता है। प्रशिक्षण के बाद लाभार्थियों की आय में वृद्धि से संबंधित सर्वेक्षण के निष्कर्ष भी कौशल विकास के महत्व को सामने लाते हैं। कुल मिलाकर, पीएम विश्वकर्मा योजना पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और वित्तीय संसाधनों से जोड़कर कारीगरों की आजीविका को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रही है। राजस्थान में योजना के तहत हुई प्रगति से प्रदेश के पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोगों को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं। आने वाले समय में प्रशिक्षण की गुणवत्ता, ऋण की प्रभावी उपलब्धता और बाजार तक बेहतर पहुंच इस योजना के लाभों को अधिक व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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