मोबाइल ने छीना बच्चों का मैदानी खेलकूद

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बाल मुकुंद ओझा
देश की सर्वोच्च अदालत ने डिजिटल युग में बच्चों की शारीरिक गतिविधियों में आई भारी गिरावट पर बेहद गंभीर चिंता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि आज के दौर में बच्चे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और स्मार्टफोन में इस कदर व्यस्त हैं कि उनका मैदानी खेल-कूद लगभग खत्म हो गया है, जबकि सर्वांगीण विकास के लिए यह बेहद जरूरी है। याचिका में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खेलों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग की गई है। यह पूरी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में स्पोर्ट्स को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। यह याचिका खेल शोधकर्ता डॉ. कनिष्का पांडे द्वारा दाखिल की गई है। इसमें मुख्य मांग ये है कि भारतीय संविधान के भाग-3 (अनुच्छेद 21A) के तहत खेलों को भी शिक्षा की तरह बच्चों का ‘मौलिक अधिकार’ घोषित किया जाए।
मोबाइल के चलन से बच्चों की मासूमियत खत्म होती जा रही है। आज ज्यादातर बच्चे परंपरागत खेलों के बजाय इंटरनेट के जरिये मोबाइल पर गेम्स पर समय बिताते हैं। बचपन एक कमरे तक सिमट कर रह गया है। उनके खेल व मनोरंजन के तरीके बदल गए हैं। बच्चे पहले लुका-छिपी, खो खो, गिल्ली- डंडा, रस्सी कूद, क्रिकेट, फुटबॉल, बालीबाल पतंग उड़ानें जैसे पारंपरिक खेलों से अपना मन बहलाते थे, वहीं अब बच्चे इन खेलों से दूर हो गए हैं। शारीरिक व्यायाम वाले इन सब खेलों की जगह अब पूरी तरह से मोबाइल गेम ने ले ली है। ऐसा लगता है अब मोबाइल ही उनकी जिंदगी का अहम् हिस्सा बन गए है यहाँ तक की माता पिता भी बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा देते है ताकि व अपने अन्य काम आसानी से कर सके। हमारा बच्चा मोबाइल की दुनिया में कैद है। एशियन जरनल ऑफ मेडिसिन साइंस’ की एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। देश में 2 से 5 साल के एज ग्रुप के बच्चे रोजाना करीब 4 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं. जबकि 5 से 10 साल की उम्र के बच्चे 5 घंटे से ज्यादा और 10 से 18 वर्ष के बच्चे 6 घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा है उनमें से 41 फीसदी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है स्वास्थ्य की बात करें तो ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताने वाले करीब 30 फीसदी बच्चे ओबेसिटी के शिकार हो रहे हैं। जबकि करीब 25 फीसदी बच्चे अंडरवेट और करीब 14 फीसदी बच्चे ओवरवेट के शिकार हो रहे है।
आज बड़ों के साथ-साथ बच्चों में भी जबरदस्त स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की लत देखने को मिल रही है। एक मीडिया खबर के अनुसार लगभग 23.80 प्रतिशत बच्चे सोने से पहले बिस्तर पर स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। लगभग 37.15 प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन के उपयोग के कारण एकाग्रता के स्तर में कमी का अनुभव करते हैं। साथ ही अधिक स्मार्टफोन यूज करने के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आजकल मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों को इंटरनेट एडिक्शन की तरफ ले जा रहा है। इस तरह के एडिक्शन से मानसिक बीमारियां पैदा होती हैं और ऐसे में बच्चे कोई न कोई गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।
मौजूदा दौर में बच्चों में खेलकूद का स्थान इंटरनेट ने ले लिया है। इसका सीधा प्रभाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ा है। शहरों के साथ अब गांवों में भी मोबाइल की पहुँच होने से बच्चों में इंटरनेट की लत बढ़ गई है। इससे उनमें संवादहीनता का खतरा बढ़ रहा है। बच्चे के ऐसे व्यवहार को अनदेखा करने की जगह इस पर सजग और सावधान होने की जरूरत है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इससे बच्चों का स्वाभाविक विकास बुरा प्रभाव पड़ता है। एक अभिभावक का कहना है उसका बेटा स्कूल से आते ही कंप्यूटर पर बैठ जाता है, कई आवाज लगाने पर भी हिलता तक नहीं। बाहर घूमने की जगह उनका बेटा कंप्यूटर पर व्यस्त रहता है, लेकिन अब उसके व्यवहार पर चिंता होने लगी है। वह किसी से बात करना तक पसंद नहीं करता, ज्यादा कुछ बोलों तो चिढ़ जाता है या चिल्लाकर जवाब देता है। एक दूसरा अभिभावक अपनी बेटी के व्यवहार से चिंतित है। वह कहती हैं कि अभी आठवीं कक्षा में ही है, लेकिन उसके अंदर इस उम्र के बच्चों सी चपलता और चंचलता नहीं है। काफी कम बोलती है। इंटरनेट सर्फिग में उसका खाली समय बीतता है।

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