-बाल मुकुन्द ओझा
पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का उद्देश्य पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना है। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम प्रकृति से प्रेरित: जलवायु और हमारे भविष्य के लिए रखी गई है। पर्यावरण को लेकर आज समूचा विश्व चिन्तित है। आखिर यह पर्यावरण है क्या और इससे चिन्तित होने के कारण क्या हैं? पर्यावरण वायु, जल, मृदा, मानव और वृक्षों को लेकर बना है। इनमें से किसी भी एक तत्व का क्षरण होता है तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है। प्रदूषण भी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी बना हुआ है। पेड़, पौधे, जलवायु मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। किसी भी एक तल के असंतुलित होने पर पर्यावरण प्रक्रिया असहज हो जाती है जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है। विश्व ने जैसे-जैसे विकास और प्रगति हासिल की है वैसे-वैसे पर्यावरण असंतुलित होता गया है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, कल-कारखाने, उससे निकलते धुंए, वाहनों से निकलने वाले धुएं, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदी और तालाबों का प्रदूषित होना आदि घटनाएं पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है। हमने प्रगति की दौड़ में मिसाल कायम की है मगर पर्यावरण का कभी ध्यान नहीं रखा जिसके फलस्वरूप पेड़ पौधों से लेकर नदी तालाब और वायुमण्डल प्रदूषित हुआ है और मनुष्य का सांस लेना भी दुर्लभ हो गया है।
प्रकृति पर्यावरण और प्रदूषण एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति में कोई विकृति आएगी तो पर्यावरण बिगड़ेगा जिसका खामियाज़ा हमें प्रदूषण के रूप में उठाना होगा। इन तीनों में सामंजस्य हुआ तो मनुष्य को बेहतर जीवन जीने का अवसर मिलेगा। प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। मनुष्य के जन्म के साथ ही उसका प्रकृति से निकट का सम्बन्ध जुड़ जाता हैं। प्रकृति अपनी चीजों का उपभोग स्वयं नहीं करती। हमारी आधारभूत जरूरतें जैसे हवा, पानी, भोजन आदि सभी प्रकृति से ही प्राप्त होते है साथ ही प्रकृति ने हमें कई प्रकार के फूल, पक्षियां, पशु, पेड़ पौधे, नीला आकाश, ज़मीन, नदिया, समुद्र, पहाड़, प्रदान किया है। जिससे मनुष्य एक बेहतर और अच्छा जीवन व्यतीत कर पाता है। यह कहा जा सकता है प्रकृति ही मानव का पोषण करती आई हैं। मनुष्य प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करता रहा तो प्रकृति भी एक दिन इंसान के वजूद के साथ छेड़छाड़ शुरू कर देगी । मनुष्य का यह शरीर भी प्रकृति के पाँच तत्वों से मिल कर बना है, वायु, अग्नि, जल, आकाश, मिट्टी और फिर यह प्रकृति हीं इस शरीर को वापस अपने में मिला लेती है। हम पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को जारी रखना चाहते हैं तो प्रकृति का संतुलन हर हालत में बनाये रखना होगा। यदि प्रकृति के अनुरूप हमने अपने आप को ढा़ल लिया तो ठीक नहीं तो अस्तित्व समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा।
प्रकृति का संरक्षण हमारे सुनहरे भविष्य का आधार है। मनुष्य जन्म से ही प्रकृति और पर्यावरण के सम्पर्क में आ जाता है। प्राणी जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति की रक्षा अति आवश्यक है। वर्तमान समय में विभिन्न प्रजाति के जीव जंतु, वनस्पतियां और पेड़-पौधे विलुप्त हो रहे हैं जो प्रकृति के संतुलन के लिए बहुत ही भयावह है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय समय पर प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है। अगर प्रकृति के साथ खिलवाड़ होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमें शुद्ध पानी, हवा, उपजाऊ भूमि, शुद्ध पर्यावरण, वातवरण एवं शुद्ध वनस्पतियाँ नहीं मिल सकेंगी। इन सबके बिना हमारा जीवन जीना मुश्किल हो जायेगा। पर्यावरण स्वास्थ्य का तात्पर्य किसी विशेष क्षेत्र की भौतिक, रासायनिक, जैविक और सांस्कृतिक स्थिति से है। खराब वायु गुणवत्ता, पारिस्थितिक विविधता का नुकसान, रासायनिक असंतुलन आदि जैसे पहलू किसी क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
आज घर घर में प्लास्टिक ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है। सरकार के लाख प्रतिबंदों के बावजूद हमारा फ्री प्लास्टिक का सपना पूरा नहीं हो प् रहा है और इसका एक मात्र कारण इसका सस्ता, टिकाऊ और हल्का होना है। पॉलीथिन के उपयोग पर प्रतिबंध के बाद भी इसका असर दिखाई नहीं दे रहा है। हर जगह पॉलीथिन का उपयोग हो रहा है। किराना सामान खरीदना हो या फिर सब्जी, फल हों या अन्य सामग्री, हर जगह अमानक स्तर की पॉलीथिन उपयोग की जा रही है।
वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी पर्यावरण को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई है। विश्व में हर साल एक करोड़ हैक्टेयर से अधिक वन काटा जाता है। भारत में 10 लाख हैक्टेयर वन प्रतिवर्ष काटा जा रहा है। वनों के कटने से वन्यजीव भी लुप्त होते जा रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल के नष्ट हो जाने से रेगिस्तान के विस्तार में मदद मिल रही है। मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को भी संरक्षित रखा जा सकता है।

प्राणी जीवन की रक्षा हेतु प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक
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