-कांतिलाल मांडोत
राजस्थान में डायबिटीज अब केवल एक बीमारी नहीं बल्कि एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6) की हाल ही में जारी रिपोर्ट ने प्रदेश की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर चिंताजनक संकेत दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार वर्षों में मधुमेह के मरीजों की संख्या में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। महिलाओं में डायबिटीज की दर 6.8 प्रतिशत से बढ़कर 9.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 8.3 प्रतिशत से बढ़कर 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे बदलते खानपान, जीवनशैली और स्वास्थ्य के प्रति घटती सजगता का परिणाम है।
डायबिटीज को अक्सर “साइलेंट रोग” कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती है और लंबे समय तक इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते। जब तक व्यक्ति को बीमारी का पता चलता है तब तक कई बार शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हो चुके होते हैं। यही कारण है कि आज यह बीमारी घर-घर तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
कुछ दशक पहले तक मधुमेह को उम्रदराज लोगों की बीमारी माना जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। युवा वर्ग और मध्यम आयु के लोग भी बड़ी संख्या में इसकी चपेट में आ रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण जीवनशैली में आया बदलाव है। आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो बढ़ाई हैं लेकिन शारीरिक गतिविधियां कम कर दी हैं। लोग घंटों तक कार्यालयों, दुकानों और घरों में बैठकर काम करते हैं। पैदल चलने की आदत कम हो गई है। वाहन हर छोटी दूरी के लिए उपयोग में आने लगे हैं। इसका सीधा असर शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ रहा है।
खानपान की आदतों में आए बदलाव ने भी इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। पहले घरों में ताजा और संतुलित भोजन तैयार होता था। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में प्रोसेस्ड फूड और फास्ट फूड का चलन तेजी से बढ़ा है। बाजार में मिलने वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थ, कोल्ड ड्रिंक्स, चिप्स, बर्गर, पिज्जा और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। इनमें पोषक तत्वों की तुलना में कैलोरी, चीनी और वसा की मात्रा अधिक होती है। नियमित रूप से ऐसे भोजन का सेवन शरीर में अतिरिक्त चर्बी बढ़ाता है और धीरे-धीरे डायबिटीज का खतरा पैदा करता है।
एनएफएचएस-6 की रिपोर्ट बताती है कि डायबिटीज के साथ-साथ मोटापा भी तेजी से बढ़ रहा है। महिलाओं में मोटापे की दर 29.6 प्रतिशत से बढ़कर 35.6 प्रतिशत और पुरुषों में 20.5 प्रतिशत से बढ़कर 25.8 प्रतिशत हो गई है। मोटापा स्वयं में एक बीमारी है और कई अन्य रोगों की जड़ भी है। जब शरीर में आवश्यकता से अधिक वसा जमा होने लगती है तो इंसुलिन का प्रभाव कम होने लगता है। इससे रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है और मधुमेह की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
कोविड महामारी के बाद यह समस्या और अधिक गंभीर रूप में सामने आई है। महामारी के दौरान लंबे समय तक लोगों की दिनचर्या प्रभावित रही। घरों में रहने, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव और अनियमित खानपान के कारण स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। कई चिकित्सकों का मानना है कि कोविड संक्रमण के बाद बड़ी संख्या में लोगों में ब्लड शुगर नियंत्रण संबंधी समस्याएं सामने आईं। इसका असर अब सर्वेक्षण के आंकड़ों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
तनाव भी मधुमेह के बढ़ते मामलों का एक महत्वपूर्ण कारण है। आज का व्यक्ति आर्थिक, सामाजिक और व्यावसायिक दबावों से घिरा हुआ है। निरंतर तनाव शरीर में ऐसे हार्मोन बढ़ाता है जो रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावित करते हैं। जब तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और चयापचय प्रक्रिया दोनों प्रभावित होती हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति विभिन्न बीमारियों की चपेट में आने लगता है।
राजस्थान की स्वास्थ्य स्थिति का दूसरा चिंताजनक पक्ष बच्चों में कुपोषण है। एक ओर वयस्क आबादी मोटापा और डायबिटीज से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर बच्चों का एक बड़ा वर्ग पर्याप्त पोषण से वंचित है। सर्वेक्षण के अनुसार पांच वर्ष से कम आयु के लगभग हर तीसरे बच्चे की शारीरिक वृद्धि उम्र के अनुरूप नहीं हो रही है। कम वजन वाले बच्चों की संख्या में मामूली सुधार जरूर हुआ है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि समाज में पोषण का संतुलन बिगड़ चुका है।
डायबिटीज केवल रक्त में शर्करा बढ़ने तक सीमित नहीं रहती। यह धीरे-धीरे हृदय, किडनी, आंखों और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। अनियंत्रित मधुमेह के कारण हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी फेल होने की समस्या और आंखों की रोशनी तक जा सकती है। कई मामलों में यह बीमारी मृत्यु का कारण भी बनती है। इसलिए इसे सामान्य बीमारी मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए सबसे पहले लोगों को अपने खानपान में सुधार करना होगा। ताजा भोजन, हरी सब्जियां, मौसमी फल, साबुत अनाज और संतुलित आहार को प्राथमिकता देनी होगी। अत्यधिक मीठे, तले हुए और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना आवश्यक है। बाहर का भोजन स्वाद तो देता है लेकिन कई बार स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित होता है।
नियमित व्यायाम भी स्वस्थ जीवन का आधार है। प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा पैदल चलना, योग करना, साइकिल चलाना या कोई भी शारीरिक गतिविधि करना शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। व्यायाम से वजन नियंत्रित रहता है और रक्त शर्करा का स्तर भी संतुलित बना रहता है।
इसके साथ ही समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना भी जरूरी है। कई लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक बीमारी गंभीर रूप नहीं ले लेती। नियमित जांच से डायबिटीज का प्रारंभिक अवस्था में पता लगाया जा सकता है और समय रहते उसका उपचार संभव हो सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता बनाएं। आधुनिक जीवन की सुविधाएं तभी सार्थक हैं जब शरीर स्वस्थ हो। बाहर के भोजन की आदत, तनावपूर्ण जीवन, शारीरिक निष्क्रियता और अनियमित दिनचर्या हमें धीरे-धीरे बीमारियों की ओर ले जा रही है। यदि समय रहते हमने अपनी आदतों में बदलाव नहीं किया तो डायबिटीज और मोटापा आने वाले वर्षों में और अधिक गंभीर संकट बन सकते हैं।
स्वस्थ जीवन किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी संपत्ति है। इसे बनाए रखने के लिए संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, सकारात्मक सोच और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आवश्यक है। यदि हम आज से ही अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना शुरू कर दें तो न केवल स्वयं को बल्कि पूरे समाज को भी एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।

बदलती जीवनशैली की बढ़ती कीमत डायबिटीज और मोटापे की गिरफ्त में आता समाज
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