योग और महिला सशक्तिकरण

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21 जून को विश्व योग दिवस है। पूरी दुनिया इस दिन एक साथ योग करेगी और योग के महत्व और लाभ को समझते हुए उसे नियमित रूप से प्रतिदिन करने का संकल्प भी लेगी। दिवस मनाना तो एक सम्मान है। वर्षगांठ मनाना हमें याद दिलाता है कि हमने वर्ष भर में क्या किया और अगले वर्ष हमें क्या करना है? वार्षिक दिवस लेखा-जोखा का दिन होता है, रिचार्ज करने का दिन होता है। योग किसी धर्म विशेष, जाति विशेष, क्षेत्र विशेष, उम्र विशेष, लिंग विशेष का नहीं है। यह इस धरती पर हर इंसान के लिए जरूरी है। आज सभी स्वस्थ रहना चाहते हैं और जो स्वस्थ रहना चाहता है उसे अपने जीवन की क्रियाओं को साधना होगा, जीवन जीने की कला सीखनी होगी, अनुशासन एवं मर्यादाओं का पालन करना होगा। अनुशासन एवं मर्यादाओं से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। व्यक्तित्व से चरित्र का विकास होता है और चरित्र से एक नए समाज का निर्माण होता है। योग हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पहलुओं में सामंजस्य को स्थापित करता है, साथ ही यह हमारी स्वचेतना विकसित करने, तनाव कम करने और हमारे समग्र स्वास्थ्य और जीवन शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है। योग से मन की शांति प्राप्त होती है, एकाग्रता बढ़ती है, तनाव मुक्त जीवन जी सकते हैं।

महिलाएं कभी भी पुरुषों से पीछे नहीं रही हैं। महिलाओं का प्राचीन काल से स्वर्णिम इतिहास रहा है। अपवाद हर समाज और हर देश में होते हैं। पिछली कुछ शताब्दियों में कुछ घटनाएं सुनने को अधिक मिलती हैं जिसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जिनमें भौगोलिक, प्राकृतिक, आर्थिक, राजनीतिक कारण प्रमुख हैं। वामपंथी विचारधारा तथा भारतीय सभ्यता और संस्कृति से विरोधी मानसिकता रखने वालों ने भी भ्रामकताएं फैलाईं हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास को पूरी तरह तोड़ मरोड़ कर गलत तरीके से लिखा। कुछ लोग जैसे की धारणा बनी हुई है यही कहते हैं कि लैंगिक भेदभाव होते हैं। महिलाओं का शोषण करना, महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिलना, उनकी भूमिका पुरुषों से कम बताना आदि आरोप लगाने वालों को सोचना चाहिए कि उन्हें हासिए पर धकेलने का काम किसने किया? इस्लामी आक्रमण और पर्दा प्रथा, आततायियों से सुरक्षा का खतरा, उपनिवेशीकरण… पर उस पर कोई नहीं बोलेगा।

अगर हम अपने प्राचीन भारत की ओर लौटें तो जानेंगे कि योग, दर्शन और आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में केवल केवल पुरुषों का ही अधिकार नहीं था बल्कि महिलाओं का भी था। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक योग के इतिहास में नारी में अनेक भूमिकाएं निभाई हैं। प्राचीन काल में गार्गी, मैत्रेयी… जैसी विदुषियों का नाम प्रमुखता के साथ लिया जाता है। हमारे यहां प्राचीन कथाओं में योगिनियों का उल्लेख भी मिलता है जिन्हें हम महिला संत, साध्वी कह सकते हैं जो अध्यात्म और योग की वाहक रही हैं, जिन्होंने शक्ति और ऊर्जा के संतुलन को योग दर्शन में स्थापित किया। वे महिलाएं ज्ञान से परिपूर्ण, शक्तिशाली, बुद्धिमान, विवेकशील, तर्कशील और आध्यात्मिक रूप से जागृत महिलाएं थीं। वैदिक काल में महिलाओं को लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की शिक्षाएं दी जाती थी। वैदिक काल में नारी ऋषि भी बनती थी जिन्हें योगिनियां, ऋषिकाएं, साध्वियां, ब्रह्मवादिनियां कहा जाता था ने भारत की आध्यात्मिक परंपराओं को संरक्षित और विस्तारित करने में अहम योगदान दिया। बौद्ध और जैन काल में भी विदुषी नारियों के प्रमाण मिलते हैं। हर क्षेत्र में उनके योगदान की गाथाएं भरी पड़ी हैं। भगवान ऋषभ ने अपनी दोनों पुत्रियों ब्राह्मी सुन्दरी को लिपि, गणित का ज्ञान सिखाया। वैदिक काल में सोमा, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, विश्ववारा, शचि, गार्गी, मैत्रेयी, यामी, इंद्राणी, देवयानी, उभया भारती, अक्का महादेवी आदि का नाम शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय हैं जिनका पूरी दुनिया में डंका बजता है। भक्त वत्सला मीराबाई का नाम विश्व प्रसिद्ध है। उन्हें भक्ति योग साधिका भी कहा जा सकता है। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली वीरांगनाओं में महारानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी, मैडम भीकाजी कामा, अरुणा आसफ अली का नाम प्रमुख है। सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, मुत्थु लक्ष्मी रेड्डी आदि महिलाओं का सेवा, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में प्रमुख स्थान है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रसर हैं ऐसे में योग के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी निश्चित ही एक उपलब्धि है।

वर्तमान आधुनिक युग में योग के क्षेत्र में इंद्रा देवी और गीता अयंगर का नाम प्रमुखता के साथ लिया जाता है। इंद्रा देवी ने कई बाधाओं को तोड़ते हुए योग जगत में महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त किया। इंद्र देवी को तो ‘प्रथम महिला योग गुरु’ माना जाता है जिन्होंने योग को पश्चिमी देशों और अमेरिका में लोकप्रिय बनाया। गीता आयंगर ने महिलाओं के स्वास्थ्य, गर्भावस्था और मासिक धर्म के दौरान योग पर गहन शोध किया और ‘योग ए जेम फॉर वूमेन’ जैसी पुस्तकें लिखी।

गत कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है भारत सहित विश्व स्तर पर महिलाओं में योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और वे योग में अधिक रुचि ले रही हैं। योग सिर्फ पुरुषों का विषय ही नहीं है या उस पर सिर्फ पुरुषों का ही आधिपत्य नहीं है। हर उम्र आयु वर्ग की महिलाओं को भी योग की आवश्यकता है। योग क्या करता है? योग का अभ्यास आत्मनिरीक्षण करने, स्वयं की देखभाल करने और खुद को विकसित होने के लिए कुछ समय और स्थान देने का अवसर प्रदान करता है। महिलाओं के लिए योग उनके संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और हार्मोनल स्वास्थ्य को संतुलित रखने के लिए बेहद फायदेमंद है।

जब महिला सशक्तिकरण की बात होती है तो फिर योग भी उसमें शामिल होना चाहिए। ‘महिला सशक्तिकरण के लिए योग’ विषय बहुत ही सारगर्भित विषय है क्योंकि आज महिलाओं की जो स्थिति है उनमें सुधार की अपेक्षा है, ऐसे में योग महिलाओं को सशक्त बनाने और उनकी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यापक उपकरण के रूप में कार्य करेगा। योग उन्हें सशक्त करेगा जिससे वे दुर्व्यवहार, हिंसा, पूर्वाग्रह, भेदभाव और शोषण जैसी स्थिति में वे लड़ने में सक्षम हो पाएंगी। इससे उनकी हर स्थिति में सुधार होगा। सशक्त महिलाओं से परिवार सुधरेगा, समाज सुधरेगा, समाज की स्थिति मजबूत होगी। जब महिलाएं सशक्त होंगी तो देश सशक्त होगा। सशक्त महिलाएं ही देश के नेतृत्व, मार्गदर्शन और सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। महिला सशक्तिकरण सभी के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।

स्वस्थ सुखी दीर्घ जीवन के लिए योग हमारी प्राचीन विद्या रही है। पहले हम शारीरिक श्रम खूब किया करते थे, सुबह से लेकर शाम तक के सारे काम हाथों से करते थे, शारीरिक मेहनत होती थी फिर भी नित्य प्रति योग प्राणायाम भी करते थे। आजकल का इंसान सुविधा भोगी हो गया है। अपने शरीर को जरा भी परेशानी नहीं देना चाहता। मेहनत से कतराता है ऐसे में निरोग कहां से रहेगा और जब निरोग नहीं रहेगा तो फिर उसे योग प्राणायाम व्यायाम सब याद आते हैं। सिर्फ एक दिन या कुछ दिनों के लिए या दिखावे के लिए कोई क्रिया करता है उसका नाम योग नहीं है। योग एक सतत प्रक्रिया है। आज देखता हूॅं बड़े शहरों, महानगरों में रहने वाले लोग अपना निजी काम खुद से नहीं करते। उनके सारे काम नौकर चाकर करते हैं। यहां तक की पानी का गिलास भी खुद भरकर नहीं पीते। ऐसे लोगों को अनेक शारीरिक व्याधियों ने घेर रखा है, जिनका जीवन अस्त व्यस्त, तनावपूर्ण और अस्वस्थ दिनचर्या से घिरा हुआ है। ऐसे लोग सुबह-सुबह बाइक गाड़ी लेकर फिटनेस सेंटर जाते हैं। जिम जाकर वर्कआउट करते हैं, एरोबिक सेंटर जाकर डांसिंग स्टेप में व्यायाम करते हैं। महिलाएं घर में काम ना करके योग सेंटर, जिम में जाकर उसी स्टाइल (झाड़ू-पोछा लगाने, कपड़े धोने…) की एक्सरसाइज, योग करती हैं। यह योग नहीं है। सोशल मीडिया पर भी कुछ महिलाएं योग के नाम पर जिस प्रकार का भद्दा अश्लील प्रदर्शन कर रही हैं वह भी योग नहीं है। योग मजाक उड़ाने, अभ्रदता अश्लीलता का प्रदर्शन करने, टाइम पास करने का विषय नहीं है।

योग क्या है? मन की संतुलित स्थिति ही योग है। जीते तो सभी हैं मगर कैसे जीना चाहिए यह जानने की क्रिया, विधि का नाम है योग। जीने की कला का नाम है जीवन विज्ञान। योग से व्यक्ति निरोग रहता है, दीर्घ जीवन जीता है। शांत चित्त, प्रसन्न चित्त जीवन का माध्यम है योग। योग के माध्यम से न केवल शरीर के अंगों बल्कि मन, मस्तिष्क और आत्मा में संतुलन बनाया जाता है। योग केवल कायिक स्वास्थ्य के लिहाज से आसन प्राणायाम तक ही सीमित नहीं है बल्कि योग में आसन, प्राणायाम के साथ साथ ध्यान भी समाहित है। स्वस्थ जीवन शैली से जुड़ने और जोड़ने का नाम है योग। यह दिमाग और शरीर की एकता और सजगता का प्रतीक है। इंसान और प्रकृति के बीच सामंजस्य है। योग वास्तव में एक जीवन शैली है।

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