जयपुर। ‘सामाजिक दायित्व और परिस्थितियां लेखन में पात्रों का चरित्र तय करती हैं। लेखक अपनी रचनाओं के जरिये अपना अनुभव व्यक्त करते हैं। नए लेखकों को चाहिए कि वे अपने रचनाकर्म में मानवीय दृष्टिकोण ध्यान रखें।’ यह बात वरिष्ठ साहित्यकार नन्द भारद्वाज ने कलमकार मंच और राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के संयुक्त तत्वावधान आयोजित पुस्तक चर्चा एवं काव्य संध्या कार्यक्रम में कही। संस्था के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा ने इस अवसर पर कहा कि आज के डिजिटल युग में प्रकाशित किताबों पर चर्चा करना आवश्यक है। ऐसी चर्चाओं से लेखक के लेखन पक्ष की बारीकी से पड़ताल हो जाती है और लेखक को भी अपने लेखन को आलोचकों और पाठकों की कसौटी पर परखने का अवसर मिलता है।
वरिष्ठ साहित्यकार फारुक आफरीदी ने कहा कि आज एआई का जमाना है, लेकिन आने वाले सौ साल तक प्रकाशित साहित्य का सिलसिला कायम रहेगा। समाज की सच्चाई को अपने लेखन के माध्यम से पाठकों के सामने लाना ही साहित्यकार की जिम्मेदारी है। पटाखा फिल्म फेम लेखक चरणसिंह पथिक ने कहा कि लेखन की भाषा और शैली में वक्त के अनुसार परिवर्तन स्वाभाविक है। लेखक को इस परिवर्तन के कारणों को समझना होगा।वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र बोड़ा ने कहा कि लेखक को कथानक अपने तरीके से कहना चाहिए। लेखन की रूमानियत और अलौकिकता पाठक के मन में पढ़ने की जिज्ञासा पैदा करती है।
किताब ‘एहसास’ और ‘मंथरा’ पर चर्चा
कार्यक्रम में कवि सुन्दर बेवफ़ा के कविता संग्रह ‘एहसास’ पर पूनम भाटिया ने किताब के अंश को रेखांकित करते हुए कहा कि संवेदनाओं में लिपटे अल्फाज जो कह जाते हैं, सिर्फ उसी के मायने नहीं है, बल्कि जो छूट गया वो और भी मायने रखता है। समझ यह भी आता है कि जब बात दिल से निकली हो और दिल तक पहुंचानी हो तो एक तय सांचे की जरूरत को नज़रअंदाज किया जा सकता है। सुनीता बिश्नोलिया ने कहा कि बिना अलंकारिक शब्दावली के भी स्वयं में गहन अर्थ समेटे इस संग्रह की कविताएं पाठक के हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ते हुए जुबान पर चढ़ जाती हैं।
अपनी किताब पर चर्चा के दौरान लेखक सुन्दर बेवफ़ा ने कहा कि इससे लेखन के सभी पहलुओं का विश्लेषन होता है और बहुत कुछ सीखने को मिलता है जो भविष्य के लेखन में काम आता है।पत्रकार एवं साहित्यकार राजेश शर्मा की किताब ‘मंथरा’ पर महेश कुमार ने कहा कि लेखक ने अपनी किताब में मंथरा के इस पात्र की पृष्ठभूमि और कार्य कारण को नियति और प्रकृति से जोड़ते हुए यह बताया है कि यह पात्र पापिन की तरह लोक मानस में व्याप्त है लेकिन नियति के विधि विधान के तहत ही इसने अपनी भूमिका अदा की है।
किताब पर कविता मुखर ने कहा कि एक कसी हुई कहानी की हर घटना, प्रत्येक प्रसंग, दृश्य और एक-एक पात्र अति महत्वपूर्ण होता है। इतना कि उसके हटा देने पर पूरा ताना बाना बिखरने का खतरा रहता है। लोकमान्यता अनुसार कैकेयी और मंथरा अत्यधिक घृणा के पात्र हैं। परन्तु पुस्तक पढने के बाद इन दोनों पात्रों के प्रति अपार श्रद्धा उमडू आती है। यह सर्वथा नवीन दृष्टिकोण है। लेखक राजेश शर्मा ने कहा कि मंथरा और कैकेयी जैसे पात्र नहीं होते तो क्या रामायण आज भी प्रासांगिक होती। न राम वनवास जाते, न राम रावण युद्ध होता। रामायण की पटकथा ही बदल जाती।
काव्य संध्या में हुआ रचना पाठ
काव्य संध्या में एक दर्जन से अधिक कवियों ने रचना पाठ कर उपस्थित श्रोताओं की प्रशंसा बटोरी। महेश कुमार ने ‘ हिंदू हूं, मुसलमान से डर लगता है, हूं मुस्लिम तो हिंदू से डरता हूं, मैं मौत से नहीं, हिंदू मुसलमान से डर जाता हूं’, पूनम भाटिया ने ‘मुझे कम बोलने वाले पसंद हैं, जो प्रतिकार नहीं करते, जो प्रतिरोध दर्ज नहीं कराते, बस सुनते हैं, सुनते ही रहते हैं’, कविता मुखर ने ‘क्या तुम ज़िंदा हो’, कवि अरुण ठाकर ने ‘घड़ी भर को जीना, है हंगामा इतना’ और ‘है हक़ीक़त वक्त यारों, अपना बन नसीब था’, सुनीता बिश्नोलिया ने ‘सूख जाता है घाव ऊपर से, लेकिन रह-रह कर चलती टीसें, भीतर से रखती हैं हरा हमेशा, दबा दी जाती है चीखें’, प्रेम प्रकाश भूमिपुत्र ने ‘अनगिनत कथाएं लिखी जाती है।
परत दर परत फैले हुए पन्नों पर’, धीरेंद्र ठाकुर ने ’शब्द छने रातों को मेरे. सुबह हुई निशब्द हुआ’ और लक्ष्मण सिंह ने ’मौसम सा तेरा बदलना अच्छा लगे है औ फिर पलट के यूँ मिलना अच्छा लगे है’ सुनाई तो सभागार श्रोताओं की तालियों से गुंजायमान हो गया। इस अवसर पर चन्द्रशेखर शर्मा ‘चन्द्रेश’, लाभेश चन्द्र शर्मा, रमेश चन्द्र शर्मा ‘चिंतक’ ने भी रचना पाठ किया।कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा, सिद्धार्थ भट्ट, अनिल यादव, साहित्यकार उमा, नवल पांडेय, सोमाद्री शर्मा, उमा शर्मा, सुषमा, शोभा शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद थे। अंत में राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सचिव राजेंद्र बोड़ा ने आगुन्तकों का आभार व्यक्त किया।



