बाल मुकुन्द ओझा
मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था। भारत की राजनीति में मधु लिमये स्वच्छ, सादगी, ईमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रबल पक्षधर के रूप में सर्व विख्यात रहे है। उन्होंने दो बार अपने विचारों और सिद्धांतों से समझौता किया जिसका पश्चाताप ताजिंदगी उन्हें खलता रहा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से अपने वैचारिक मतभेद वे कभी छिपाते नहीं थे। उनके नेता डॉ राम मनोहर लोहिया कांग्रेस को सत्ताच्युत करने के लिए शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार थे। लोहिया के प्रयासों से ही 1967 में अनेक प्रदेशों में गैर कांग्रेस संविद सरकार बनी। उस समय मधुजी ने संघ समर्थित जनसंघ से गठजोड़ का विरोध लोहियाजी के सामने किया था। लोहियाजी ने यह कहकर उनका मुंह बंद कर दिया था कि तुम्हारा नेता कौन है। मधुजी की लोहिया के प्रति अगाध श्रद्धा थी और इस कारण वे आगे कुछ भी नहीं बोल पाए। दूसरा मौका आपातकाल के बाद जनता पार्टी के गठन का था। मधुजी चाहते थे कि जनसंघ विलय के बाद संघ से अपने किसी तरह का सम्बन्ध नहीं रखे। यह संभव नहीं था। मगर लोकनायक जय प्रकाश नारायण बिना शर्त एका चाहते थे, यहाँ भी उन्हें झुकना पड़ा। दोहरी सदस्यता का मामला भी पार्टी में उन्होंने जोर शोर से उठाया। कई लोग जनता पार्टी को तोड़ने का आरोप मधु लिमये पर लगाते है जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया।
डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, आचार्य नरेंद्र देव, एस एम् जोशी जैसे समाजवादी विचारकों के सान्निध्य में मधु लिमये भारत में समाजवादी आंदोलन के शख्सियत के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। मधु लिमये समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया के अनुयायी और राज नारायण कर्पूरी ठाकुर एवं जॉर्ज फर्नांडिस जैसे समाजवादियों के प्रखर सहयोगी थे। एक मई मधु लिमये की जयंती है। मधुजी कोई साधारण इंसान नहीं थे। वे जाने माने संसदविद थे। उनके संसद में प्रवेश करते ही कई कॉंग्रेसजनों की भृकुटि टेडी पड़ जाती और वे यह सोच में पड़ जाते कि आज वे क्या सवाल उठाएंगे। मधु लिमये किसी भी प्रकार के पाखंड से कोसों दूर थे। वे संसद में पैदल अथवा रिक्शे से आते थे। उनकी जेब खाली रहती थी। उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी अथवा सांसद होने की पेंशन नहीं ली। लिमये ने जनता सरकार में मंत्री पद नहीं लिया। उन्होंने जॉर्ज, दंडवते और पुरुसोत्तम कौशिक को समाजवादी धडे से मंत्री पद नवाजा। यह लिमये थे जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गाँधी द्वारा लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था। वे सबसे पहले 1964 में मुंगेर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। चार बार सांसद रहने के बाद उन्होंने 1982 में राजनीति से सन्यास ले लिया था।
समाजवादी नेता और मधु जी के सहयोगी रहे प्रो राजकुमार जैन के मुताबिक, आजकल भ्रष्टाचार की बड़ी चर्चा है। इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के आधुनिक उपकरणों तथा आरटीआई के माध्यम से जल्द ही तथ्यों को पकड़ा जा सकता है तथा इसका श्रेय भी उतनी तीव्रता से मिल जाता है। परन्तु आप कल्पना कीजिये कि जब सारे रास्ते बन्द थे, गोपनीय थे, उस समय मधु लिमये ने अकेले अपने दम पर भारतीय संसद में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जो जेहाद छेड़ा था वह कल्पना से परे है। स्टील पार्टर डील और अमीचंद प्यारेलाल कांड (सी० सुब्रहण्यम्) कृत्रिम धागा तथा खादी भंडार के दियासलाई की चोरी का कांड (मनुभाई शाह) जयंती शिपिंग-धर्मतेजा, एपीजे शिपिंग (सदोवा पाटील) विदेशी मुद्रा की चोरी (वित्त मंत्री सचिन चौधरी), छोटी सादड़ी सोना कांड (राजस्थान के मुख्यमंत्री- मोहन लाल सुखाड़िया) ऐसे कई काले कारनामों को मधु जी ने संसद के सामने रखा। चौथी और पांचवी लोकसभा में क्रांति देसाई का होड़साल कांड पांडिचेरी लाइसेंस कांड, मारूति कांड, आदि बाते काफी मशहूर हुई। सरकारी गलत कामों में या भ्रष्टाचार के मामले में वे किसी को बख्शते नहीं थे। आज उनके बस्ते से कौन-सी चीज बाहर निकलनी है, इस डर से सब मंत्री तथा वरिष्ठ अधिकारी डरते थे । परंतु लोकसभा में शेर की तरह दहाड़ने वाले मधु लिमये सेंट्रल हॉल में अपने दोस्तों के साथ ही नही बल्कि विरोधी लोगों के साथ ही कॉफी पीते हुए बाहर निकलते थे।
रामचंद्र महादेव लिमये के पुत्र मधु लिमये का जन्म 1 मई 1922 को पुणे में हुआ था। उन्होंने प्रोफेसर चंपा लिमये से शादी की। वह पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1938-48 और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी 1938-1948 के साथ जुड़े। स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी के कारण उनकी शिक्षा बाधित हुई थी। 1940-45 के बीच 4 वर्षों के लिए उन्हें कैद कर दिया गया था। 1947 में भारतीय समाजवादी आंदोलन के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के एडमबर्ग सम्मेलन में शामिल हुए। 1948 में नासिक सम्मेलन में सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य चुने गए। वे 1949-52 में सोशलिस्ट पार्टी के सचिव चुने गए। फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में होते हुए लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। संविधान और सियासत के जीते-जागते ज्ञानकोश थे मधु लिमये।

संविधान और सियासत के जीते-जागते ज्ञानकोश थे संसदविज्ञ मधु लिमये
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