मातृभाषा, संस्कृति और शिक्षा : राजस्थानी के पक्ष में ऐतिहासिक निर्णय

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-सुनील कुमार महला
भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और शैक्षिक चेतना के लिए 12 मई 2026 का दिन ऐतिहासिक माना जाएगा। दरअसल, 12 मई 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय(माननीय सुप्रीम कोर्ट) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए राजस्थान सरकार को यह निर्देश दिया है कि वह राज्य के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को विषय के रूप में पढ़ाने तथा चरणबद्ध तरीके से इसे शिक्षा का माध्यम बनाने हेतु(प्राथमिक , माध्यमिक और उच्च शिक्षा में) व्यापक नीति तैयार करे। न्यायालय ने इस संबंध में 30 सितंबर 2026 तक पालना रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने को कहा है। वास्तव में, यह निर्णय केवल एक भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मातृभाषा आधारित शिक्षा, हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का भी एक व्यापक व बड़ा संदेश देता है।

पाठकों को बताता चलूं कि यह फैसला पदम मेहता एवं अन्य द्वारा दायर याचिका पर न्यायमूर्ति (जस्टिस) विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति(जस्टिस) संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया है। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस पूर्व निर्णय को पलट दिया, जिसमें यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी गई थी कि शिक्षा नीति के मामलों में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। वास्तव में, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि मातृभाषा में शिक्षा केवल नीति का विषय नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकारों और व्यक्ति की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा प्रश्न है। न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति का अपनी भाषा में समझना, सीखना और अभिव्यक्त होना उसके ‘अस्तित्वगत अधिकार’ का हिस्सा है।न्यायालय ने अपने निर्णय में मातृभाषा आधारित शिक्षा को बच्चों के बौद्धिक विकास, आत्मविश्वास और बेहतर सीखने की क्षमता से जोड़ा। अदालत ने यह भी माना कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 4.36 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली राजस्थानी भाषा की उपेक्षा करना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। याचिका में राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (रीट) में राजस्थानी भाषा को शामिल करने की मांग भी की गई थी, जिसे न्यायालय ने गंभीरता से स्वीकार किया।

बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस फैसले के बाद अब राजस्थानी भाषा को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में शामिल करने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी। इतना ही नहीं, सरकार को चरणबद्ध क्रियान्वयन, पाठ्यक्रम निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण तथा अध्ययन सामग्री विकसित करने की नीति तैयार करनी होगी। वास्तव में, इससे जहां एक ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मातृभाषा आधारित शिक्षा की भावना को भी बल मिलेगा। साथ ही, भविष्य में राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग और अधिक मजबूत हो सकती है।

वास्तव में यह निर्णय राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और लोक अस्मिता के संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। इससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, लोकगीतों, लोककथाओं, साहित्य और इतिहास से पुनः जुड़ सकेगी। राज्य में राजस्थानी भाषा के पाठ्यक्रम, शोध, शिक्षक प्रशिक्षण और स्थानीय भाषाई अध्ययन के नए अवसर विकसित होंगे। हालांकि, यह बात अलग है कि इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी सामने हैं, जैसे राजस्थानी की विभिन्न बोलियों-मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, शेखावाटी, ढूंढाड़ी, वागड़ी आदि-के बीच मानकीकरण, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता तथा गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों का निर्माण। फिर भी यह निर्णय भाषा संरक्षण और सांस्कृतिक गौरव की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।हाल फिलहाल, यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि राजस्थानी भाषा का इतिहास अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली रहा है। राजस्थानी की बात करें तो,यह इंडो-आर्यन भाषा परिवार से संबंधित भाषा है, जिसकी उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से मानी जाती है। माना जाता है कि इसका विकास लगभग 9वीं शताब्दी के आसपास हुआ तथा 13वीं शताब्दी से इसकी साहित्यिक परंपरा विकसित होने लगी। पहले इसे ‘मरू भाषा’ के नाम से भी जाना जाता था। डिंगल और पिंगल साहित्य की समृद्ध परंपरा, लोककाव्य, वीरगाथाएँ तथा लोकगीत इसकी सांस्कृतिक संपन्नता के प्रमाण हैं।

आज के समय में राजस्थानी भाषा केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और पाकिस्तान के सिंध तथा बहावलपुर क्षेत्रों तक भी देखा जाता है। यह नागरी लिपि में लिखी जाती है, जबकि पारंपरिक ‘बाण्याँ वाटी’ लिपि का उपयोग आज भी कुछ व्यापारी समुदाय बहीखातों में करते हैं। विकिपीडिया सहित विभिन्न भाषाई अध्ययनों के अनुसार राजस्थानी करोड़ों लोगों द्वारा बोली, पढ़ी और समझी जाती है। राजस्थानी भाषा को भारत की साहित्य अकादमी तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) अलग भाषा के रूप में मान्यता दे चुके हैं। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय,महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर में इसका अध्ययन कराया जाता है। इतना ही नहीं, राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर द्वारा वर्ष 1973 से राजस्थानी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया गया है। राजस्थानी भाषा की समृद्धि का एक बड़ा उदाहरण डॉ. सीताराम लालस द्वारा रचित ‘राजस्थानी-हिंदी वृहद कोश’ है, जिसे विश्व के सबसे बड़े शब्दकोशों में गिना जाता है। इसमें दो लाख से अधिक शब्द संकलित हैं। मारवाड़ी भाषा का पहला व्याकरण रामकरण आसोपा द्वारा लिखा गया था, जो इस भाषा की प्राचीन विद्वत परंपरा को दर्शाता है।

इसके अलावा, पाठक यह बात जानते होंगे कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग भी लंबे समय से जारी है। 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, किंतु राजनीतिक उदासीनता के कारण अब तक यह मांग अधूरी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस मांग को नई ऊर्जा प्रदान कर सकता है।इसी बीच तकनीकी क्षेत्र में भी राजस्थानी भाषा को महत्वपूर्ण पहचान मिल रही है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि कुछ वर्ष पूर्व गूगल ट्रांसलेट ने मारवाड़ी, संताली और तुलु सहित 110 नई भाषाओं को अपने अनुवाद प्लेटफॉर्म में शामिल किया। गूगल ने अपने पीएएल एम-2 भाषा मॉडल की सहायता से यह विस्तार किया, जिसे अब तक का सबसे बड़ा भाषाई विस्तार बताया गया। जून 2024 तक गूगल ट्रांसलेट 243 भाषाओं को समर्थन दे रहा था। नई जोड़ी गई भाषाएँ विश्व की लगभग आठ प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसमें अवधी, बोडो, खासी, कोकबोरोक, मारवाड़ी, संथाली और तुलु जैसी भारतीय भाषाएँ भी शामिल हैं।

इसी बीच, मारवाड़ी को गूगल ट्रांसलेट में शामिल किया जाना राजस्थानवासियों के लिए विशेष गर्व का विषय है। इससे अब विश्व की विभिन्न भाषाओं का मारवाड़ी में अनुवाद संभव हो सकेगा तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थानी भाषा की पहुँच और अधिक विस्तृत होगी। यद्यपि वर्तमान में अनुवाद पूर्णतः सटीक नहीं है, किंतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग से इसकी गुणवत्ता में लगातार सुधार संभव है। इससे भाषाई विविधता को वैश्विक मंच मिलेगा और भारतीय भाषाएँ और अधिक समृद्ध होंगी।

राजस्थानी भाषा की मिठास और सांस्कृतिक आत्मीयता लोकसाहित्य में भी स्पष्ट दिखाई देती है। प्रसिद्ध कवि सुखवीर सिंह कविया के गीत ‘मायड़ बोली’ में मातृभाषा के प्रति गहरा प्रेम झलकता है-‘मीठो गुड़ मिश्री मीठी, मीठी जेडी खांड,मीठी बोली मायड़ी और मीठो राजस्थान।’ यह पंक्तियाँ केवल भाषा की मिठास नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं।हाल फिलहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि राजस्थानी भाषा राजस्थान की प्रमुख लोकभाषा है, जो अपनी मिठास, समृद्ध लोकसंस्कृति और वीरता से भरपूर साहित्य के लिए प्रसिद्ध है। इसकी प्रमुख बोलियों में मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावाटी, हाड़ौती और ढूंढाड़ी शामिल हैं। राजस्थानी भाषा में लोकगीत, दोहे, वीरगाथाएं और लोककथाएं विशेष रूप से लिखी गई हैं, जिनमें राजस्थान की संस्कृति, परंपरा और जनजीवन का सुंदर चित्रण मिलता है। इसकी भाषा शैली सरल, भावपूर्ण और प्रभावशाली होती है। राजस्थानी साहित्य को समृद्ध बनाने में विजयदान देथा, कन्हैयालाल सेठिया और सूर्यमल्ल मिश्रण जैसे महान रचनाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। राजस्थानी भाषा आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और लोकगौरव को जीवित रखे हुए है। महात्मा गांधी जी ने भी कहा था कि कोई देश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक वह अपनी मातृभाषा को सम्मान और महत्व नहीं देता। वास्तव में भाषाओं का विकास ही समाज और संस्कृति के विकास का आधार होता है। राजस्थानी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राजस्थान की लोकसंस्कृति, इतिहास, परंपराओं और भावनात्मक पहचान की जीवंत धरोहर है।

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