करगिल विजय दिवस : शौर्य, बलिदान और भारतीय सैन्य पराक्रम की अमर गाथा

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नई दिल्ली। उत्तर भारत की बर्फ़ से ढकी दुर्गम पर्वत-श्रृंखलाओं में, जहां सांस लेना भी कठिन होता है और तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे पहुंच जाता है, वहीं 1999 में भारतीय सैनिकों ने अद्वितीय साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति का ऐसा इतिहास रचा, जो सदैव अमर रहेगा। करगिल की ऊंची चोटियों पर लड़ा गया यह युद्ध केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सीमाओं का संघर्ष नहीं था, बल्कि सत्य की असत्य पर, विश्वास की विश्वासघात पर और साहस की कायरता पर विजय का प्रतीक था। इस युद्ध ने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत शांति और संवाद का समर्थक है, किंतु उसकी संप्रभुता, अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान को चुनौती देने वाले किसी भी प्रयास का वह दृढ़ता से सामना करता है। 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक पूरा करते हुए करगिल की सभी महत्वपूर्ण चोटियों पर पुनः तिरंगा फहराया। इसी ऐतिहासिक विजय की स्मृति में प्रतिवर्ष 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस मनाया जाता है। यह दिवस उन वीर सैनिकों को कृतज्ञ राष्ट्र की भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया और राष्ट्रभक्ति, वीरता तथा कर्तव्यनिष्ठा का अमिट आदर्श स्थापित किया।

भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि और पाकिस्तान का विश्वासघात

करगिल युद्ध की पृष्ठभूमि ऐसे समय में तैयार हुई, जब भारत और पाकिस्तान के संबंधों में शांति और सहयोग की नई उम्मीद जगी थी। फरवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस सेवा के माध्यम से पाकिस्तान की यात्रा की। इस पहल का उद्देश्य दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच विश्वास बहाली, संवाद को मजबूत करना और आपसी विवादों का शांतिपूर्ण समाधान तलाशना था। इसी दौरान दोनों देशों ने ‘लाहौर घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर कर शांति और अच्छे पड़ोसी संबंधों की प्रतिबद्धता दोहराई।हालांकि, यह विश्वास अधिक समय तक कायम नहीं रह सका। पाकिस्तान की सेना ने तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व में ‘ऑपरेशन बद्र’ के तहत करगिल क्षेत्र में गुप्त घुसपैठ की योजना बनाई। पाकिस्तानी सैनिकों ने नियंत्रण रेखा पार कर रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा और अंततः करगिल युद्ध का मार्ग प्रशस्त हुआ।

करगिल युद्ध की घटनाओं का क्रम
फरवरी 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच शांति, विश्वास और संवाद को बढ़ावा देना था। लेकिन इसी दौरान पाकिस्तान ने गुप्त रूप से ‘ऑपरेशन बद्र’ की योजना बनाकर नियंत्रण रेखा (LoC) पार भारतीय क्षेत्र की रणनीतिक चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया। घुसपैठ का पता चलते ही भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। सेना ने अदम्य साहस, रणनीतिक कौशल और पराक्रम का परिचय देते हुए एक-एक कर सभी महत्वपूर्ण चोटियों को दुश्मन के कब्ज़े से मुक्त कराया और करगिल में दोबारा तिरंगा फहराकर ऐतिहासिक विजय हासिल की।

पाकिस्तान का रणनीतिक उद्देश्य :

पाकिस्तान की करगिल योजना का उद्देश्य श्रीनगर–लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर रणनीतिक दबाव बनाना था। इसके लिए उसने द्रास, करगिल और आसपास की ऊंची चोटियों पर कब्जा कर भारतीय सेना की आवाजाही और रसद आपूर्ति बाधित करने की कोशिश की। इन चोटियों से लद्दाख और सियाचिन में तैनात भारतीय सैनिकों तक आवश्यक सामग्री पहुंचाना कठिन हो सकता था। इसलिए इन रणनीतिक क्षेत्रों को मुक्त कराना भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक था।

कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश

पाकिस्तान की रणनीति केवल भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ तक सीमित नहीं थी। उसका उद्देश्य कश्मीर मुद्दे को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाना भी था। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि यदि वह नियंत्रण रेखा (LoC) पर महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्ज़ा कर लेता है, तो भारत पर सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। चूंकि उस समय दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न थे, इसलिए पाकिस्तान को विश्वास था कि युद्ध के व्यापक रूप लेने की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय समुदाय हस्तक्षेप करेगा और भारत पर बातचीत के लिए दबाव बनाएगा। इस तरह वह कश्मीर मुद्दे को फिर से वैश्विक चर्चा का विषय बनाना चाहता था।

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