बाल मुकुन्द ओझा
विश्व बांस दिवस हर साल 18 सितम्बर को मनाया जाता है। यह सालाना दिवस बांस के लाभों के बारे में जागरुकता बढ़ाने और रोजमर्रा के उत्पादों में इसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है। इस वर्ष इस दिवस की थीम सीमाओं से परे बाँस रखी गई है। विश्व बांस संगठन के अनुसार यह समुदायों, उद्योगों और संस्थानों को यह समझने के लिए प्रोत्साहित करता है कि बांस किस तरह पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दे सकता है। छात्रों के लिए, यह पौधों से मिलने वाले संसाधनों को जलवायु-अनुकूल आदतों और व्यावहारिक टिकाऊपन से जोड़ने का एक आसान ज़रिया है। मुख्य रूप से पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में विभिन्न उद्देश्यों के लिए बाँस का उपयोग किया जाता है। बांस प्रकृति का अनमोल उपहार है। यह पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। बांस प्रकृति का उपहार है जो सुंदरता और स्थायित्व का अद्भुत संगम है। प्रकृति हमें कई प्रकार के उपहार प्रदान करती है जो हमारे अस्तित्व, कल्याण और समृद्धि के लिए आवश्यक हैं। हम जिस हवा में सांस लेते हैं उससे लेकर हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन तक, प्रकृति हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इनमें बांस का नाम भी प्रमुखता से लिया जा सकता है। बांस देखने में पेड़ जैसा लगता है, लेकिन वनस्पति विज्ञान के अनुसार यह घास परिवार का सदस्य है। इसके खोखले तने, मजबूत गांठें, भूमिगत फैलने वाली जड़ें और तेजी से निकलने वाले नए अंकुर इसे दूसरी वनस्पतियों से अलग बनाते हैं।
विश्व बांस दिवस वर्ष 2009 में मनाने की शुरुआत की गई थी। बांस को अधिक से अधिक उगाने और इसके उपयोग के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए यह दिन मनाया जाता है। इस दिन को रोपण कार्यक्रमों, सांस्कृतिक आयोजनों और नीतिगत चर्चाओं के माध्यम से बाँस की भूमिका को जलवायु कार्रवाई और आर्थिक विकास में रेखांकित किया जाता है। बाकी पेड़ों के तुलना में बांस बहुत तेजी से विकसित होने वाला या सबसे तेजी से बढ़ने वाले पौधा माना जाता हैं। बांस पेड़ नहीं बल्कि घास की एक प्रजाति है और इसकी कुछ प्रजातियां बेहद तेजी से बढ़ती हैं। बांस प्रकृति का एक अनमोल उपहार है, जिसका उपयोग हजारों वर्षों से मानव जीवन में होता आया है। बांस सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण का रक्षक है, गरीबों का सहारा है और भारत की हरित अर्थव्यवस्था की शान है। बांस का पर्यावरणीय महत्व भी बहुत अधिक है। यह पौधा मिट्टी के क्षरण को रोकने में मदद करता है और जलवायु परिवर्तन को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा, वाँस के जंगल कई जीव-जन्तुओं के लिए आवास प्रदान करते हैं। बांस के एक नहीं अपितु अनेकों लाभ हैं जो इसे एक महत्वपूर्ण पौधा बनाते हैं। हमारे लोक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है बांस। जीवन-मरण के समय बांस की अहम भूमिका होती है।
एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 14 मिलियन हेक्टेयर में बांस की खेती की जाती है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में कुल बांस भंडार का 2/3 हिस्सा है, जो इसके सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व को दर्शाता है। प्रकृति-पर्यावरण के लिए भी बांस को काफी अच्छा माना जाता है। सदियों से बांस मानवीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। जन्म से मृत्यु तक बांस प्रकृति के सबसे अनमोल खजाने में से एक है और इसका हमारे जीवन में कई तरह से उपयोग होता है, इसका प्रयोग गांव-देहात में पहले कच्चे घर बनाने में सबसे अधिक होता था, आज भी कहीं कहीं छप्पर डाले जाता है तो उसमे भी इसका प्रयोग होता है। शहरी जिंदगी भी इससे अछूती नहीं है, शहरी घरों में लकड़ी के फर्नीचर में इसका उपयोग होता है। इसके आलावा इसका उपयोग बच्चों के खिलौने, बांसुरी, हाथ गाड़ी, बुजुर्गों की लाठी, पुलिस के डंडे, घरों में उपयोग होने वाली सीढ़ी, घर की चारपाई, टोकरी, खिलौने, झोपड़ी, नाव, शादी विवाह में मंडप, छतरी, चटाई, बल्ली, सीढ़ी और दुल्हन की डोली, फर्नीचर में सोफा, कुर्सी, अगरबत्ती,अलमारी, कृषि यंत्र, अर्थी अन्य बहुत तरीकों से यह हमारे जन जीवन में जुड़ा हुआ है। बांस से निर्मित दऊरा, दऊरी, सुपली, डोलची, सूप, बेना आज भी प्रचलन में है।
बांस के पौधे को काटने को लेकर भी हमारे समाज में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। लोक मान्यता के अनुसार बांस को वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत सरकार ने इसे ग्रीन गोल्ड का दर्जा दे रखा है। ऐसी मान्यता है कि बांस के पौधे रखने से सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

प्रकृति का अनमोल उपहार है बांस
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