लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस अपने अतीत और वर्तमान के सवालों का जवाब कब देगी

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चेन्नई में युवाओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती दी कि कितनी भी पुलिस बुला ली जाए, वे पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सरकार पर संविधान को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी लगाए। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और उसकी नीतियों की आलोचना करना है, लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल चुनौती देने तक सीमित नहीं होती। उसे अपने आरोपों के तथ्य भी सामने रखने होते हैं और अपने राजनीतिक इतिहास का जवाब भी देना होता है। इसलिए राहुल गांधी के बयानों के साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या कांग्रेस आज जिन लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई दे रही है, उन पर उसका अपना अतीत पूरी तरह खरा उतरता है?
राहुल गांधी नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जैसे व्यक्तियों को अपनी राजनीतिक लड़ाई के केंद्र में रख रहे हैं। किसी भी नेता को सरकार की आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत निशाना साधने के बीच अंतर समझना जरूरी है। यदि निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल हैं तो प्रमाण और कानूनी आधार प्रस्तुत किए जाने चाहिए। यदि किसी सरकारी निर्णय पर आपत्ति है तो उसके विरुद्ध संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। केवल इस्तीफे की मांग या आक्रामक भाषण से आरोप सिद्ध नहीं हो जाते।
कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि उसका विरोध किन नीतियों के विरुद्ध है और उसका विकल्प क्या है। क्या वह निर्वाचन व्यवस्था में सुधार चाहती है, या निर्वाचन आयोग के हर उस निर्णय पर सवाल उठाएगी जो उसके राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं है? क्या वह अवैध प्रवास के प्रश्न पर स्पष्ट नीति रखती है, या सरकार के हर कदम का विरोध करना ही उसकी राजनीति बन गया है? लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अधिकार है, लेकिन प्रश्नों के उत्तर और विकल्प प्रस्तुत करना भी राजनीतिक जिम्मेदारी है।
आपातकाल का इतिहास कांग्रेस को आज भी देता है आईना
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कांग्रेस का योगदान रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर देश की शुरुआती संस्थाओं के निर्माण तक उसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इतिहास का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों से नहीं होता। गलतियों को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है। वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू किया था। उस दौर में नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई। लोकतंत्र के लिए यह एक गंभीर दौर था, जिसकी याद भारतीय राजनीति में आज भी मौजूद है।
जिस कांग्रेस के शासनकाल में विपक्ष की आवाज पर प्रतिबंध लगे और अनेक नेताओं को जेल जाना पड़ा, उसी कांग्रेस के नेताओं को आज यह समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक असहमति की रक्षा केवल सत्ता से बाहर रहने पर नहीं, बल्कि सत्ता में रहते हुए भी की जानी चाहिए। वर्ष 1977 के चुनाव में जनता ने आपातकाल के बाद कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। यह भारतीय मतदाता की लोकतांत्रिक शक्ति का प्रमाण था। जनता ने दिखाया कि सरकार कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंतिम मूल्यांकन मतदाता ही करता है।
कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख-विरोधी दंगों में हजारों लोगों की जान गई। इन घटनाओं और पीड़ितों को न्याय दिलाने में हुई देरी ने भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन पर गहरे घाव छोड़े। इन घटनाओं की जिम्मेदारी, जांच और न्याय से जुड़े सवाल आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी दल को पीड़ितों के दर्द को राजनीतिक सुविधा के अनुसार याद करने या भुलाने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
घुसपैठ और मतदाता सूची पर राजनीति नहीं तथ्य चाहिए
आज अवैध प्रवास, मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिकता का विषय राजनीतिक बहस के केंद्र में है। सरकार यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता या निवास संबंधी स्थिति की जांच करती है, तो कार्रवाई कानून और उचित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। किसी रोहिंग्या व्यक्ति को केवल उसकी पहचान के आधार पर अपराधी मान लेना उचित नहीं है, लेकिन अवैध रूप से देश में रहने के प्रश्न को पूरी तरह राजनीतिक संरक्षण का विषय बना देना भी सही नहीं है। नागरिकता, शरण और निर्वासन के मामलों में कानून, मानवीय परिस्थितियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी है।
इसी प्रकार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को अपने आरोप प्रमाणों के आधार पर रखने चाहिए। यदि किसी पात्र भारतीय नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसकी शिकायत का निवारण होना चाहिए। यदि किसी अपात्र व्यक्ति का नाम सूची में है, तो उसकी जांच भी कानून के अनुसार होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। लेकिन बिना प्रमाण सभी प्रक्रियाओं को अवैध घोषित कर देना लोकतांत्रिक विश्वास को कमजोर कर सकता है।
मृत व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में बने रहने की शिकायतें हों तो उनकी जांच होनी चाहिए और अभिलेखों को ठीक किया जाना चाहिए। हालांकि किसी मृत व्यक्ति का आधार कार्ड होना अपने आप में उसकी वर्तमान नागरिकता या मतदाता होने का प्रमाण नहीं है। आधार पहचान से जुड़ा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। इसी तरह मतदाता सूची में नाम होने के लिए निर्धारित कानूनी पात्रता जरूरी है। कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए कि वह सूची की त्रुटियां दूर करने के पक्ष में है या पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर राजनीतिक विरोध के कारण सवाल उठा रही है। सरकार और निर्वाचन आयोग को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक पात्र मतदाता किसी परिस्थिति में अपने अधिकार से वंचित न हों।
राहुल गांधी यदि निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग करते हैं, तो उन्हें अपने आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य रखने चाहिए। किसी अधिकारी के इस्तीफे की मांग करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन इस्तीफे की मांग से अपने आप कोई आरोप सही साबित नहीं हो जाता। इसी तरह सरकार को भी आलोचना का जवाब तथ्यों, पारदर्शिता और संवैधानिक प्रक्रिया से देना चाहिए।
कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना है। देश को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, महंगाई और राष्ट्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट नीतियां चाहिए। विदेशी निवेश और भारतीय कारोबारियों के संबंध में भी बहस तथ्यों पर होनी चाहिए। किसी विदेशी उद्योगपति का समर्थन या विरोध अपने आप में राष्ट्रहित का प्रमाण नहीं है। असली कसौटी यह है कि किसी नीति से भारतीय उद्योग, रोजगार, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं को क्या लाभ या नुकसान होता है।
राहुल गांधी को यह समझना होगा कि राजनीतिक संघर्ष में ऊंची आवाज से अधिक महत्व विश्वसनीय तर्क का है। कांग्रेस को अपने आपातकाल के इतिहास, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अपने पुराने व्यवहार और वर्तमान आरोपों पर आत्ममंथन करना चाहिए। वहीं केंद्र सरकार को भी यह साबित करना होगा कि संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता उसके लिए सर्वोपरि हैं।
लोकतंत्र किसी एक दल की जागीर नहीं है। न सत्ता को हर आलोचना को शत्रुता समझना चाहिए और न विपक्ष को हर सरकारी कार्रवाई को षड्यंत्र बताना चाहिए। जनता को नारों से अधिक तथ्य और आरोपों से अधिक समाधान चाहिए। राहुल गांधी की चुनौती का जवाब भी अंततः राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि संविधान के दायरे में होने वाली कार्रवाई, निष्पक्ष चुनाव और जनता के निर्णय से ही मिलेगा। कांग्रेस यदि सचमुच लोकतंत्र की रक्षा करना चाहती है, तो उसे केवल सरकार से सवाल नहीं पूछने चाहिए, बल्कि अपने इतिहास और वर्तमान राजनीति से जुड़े कठिन सवालों का उत्तर भी देना चाहिए। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है और यही जनता के विश्वास की असली कसौटी है।

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