भूजल संकट से पेयजल के साथ खेती किसानी प्रभावित

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बाल मुकुन्द ओझा
देश में बढ़ते भूजल संकट से आने वाले समय में देश की जनता को एक बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक नई रिपोर्ट के अनुसार भारत का भूजल लगातार गिर रहा है, जितना पानी जमीन से निकाला जा रहा है, उतना वापस नहीं पहुंच रहा है। उत्तर और उत्तर-पश्चिम में निकासी रिचार्ज से ज्यादा हो रही है, जिससे वॉटर संतुलन बिगड़ रहा है। स्टेट ऑफ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज 2025 रिपोर्ट ने यह गंभीर चेतावनी दी है और कहा है भारत में भूजल की समस्या मुख्य रूप से अत्यधिक निकासी से जुड़ी है। खेती में ट्यूबवेल और बोरवेल का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। गेहूं और चावल जैसी फसलों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में यह संकट और गहरा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत जैसे देश में जहां आबादी बढ़ रही है और खेती अर्थव्यवस्था का आधार है, वहां भूजल का गिरना खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है। इस संकट से निपटने के लिए सिर्फ चेतावनी काफी नहीं है अपितु जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी है।
यूनेस्को भूजल संकट की पहले ही चेतावनी जारी कर चूका है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार देश के उत्तर पश्चिम क्षेत्रों में लगातार गिरते भूजल समस्या से कृषि प्रभावित हो रही है। लगातार भू-जल दोहन से भारत में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भूजल का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। भारत में सिंधु-गंगा के मैदान के कुछ क्षेत्र पहले ही भूजल की कमी के खतरनाक स्तर को पार कर चुके हैं। जब कभी भू जल स्त्रोत अपर्याप्त होते हैं तो इसका नकारात्मक प्रभाव खेती पर भी पड़ता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, भारत में कृषि भूमि की सिंचाई के लिये हर साल 230 बिलियन मीटर क्यूबिक भूजल निकाला जाता है, जिससे देश के कई हिस्सों में भूजल का तेज़ी से क्षरण हो रहा है। भूजल बोर्ड के मुताबिक निकाले गए भूजल का 89 प्रतिशत सिंचाई क्षेत्र में उपयोग किया जाता है, इसके बाद घरेलू उपयोग के लिये भूजल का स्थान आता है जो निकाले गए भूजल का 9 प्रतिशत है।
इंटरकनेक्टेड डिजास्टर रिस्क रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा यूजर है, जो यूएसए और चीन के कुल उपयोग से भी अधिक है। भारत का उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र देश की बढ़ती 1.4 अरब आबादी के लिए रोटी की टोकरी के रूप में काम करता है, जिसमें पंजाब और हरियाणा राज्य 50 प्रतिशत उत्पादन करते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है पंजाब और हरियाणा में कुओं का तेज दोहन हुआ है और पूरे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में गंभीर रूप से कम भूजल उपलब्धता का अनुभव होने का अनुमान है। इससे फसल उत्पादन पर बुरा पड़ सकता है।
भारत में भूजल की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यदि मानसूनी वर्षात ने धोखा दे दिया तो देश में जल संकट उपस्थित होते देर नहीं लगेगी। देश में भूजल का गिरता स्तर स्पष्ट संकेत देने लगा है कि भविष्य में हालात और भी ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। आज जिस तरह से मानवीय जरूरतों की पूर्ति के लिए निरंतर व अनवरत भूगर्भ जल का दोहन किया जा रहा है, उससे साल दर साल भूगर्भ जल का स्तर गिरता जा रहा है। आज दुनिया अपनी जल जरूरतों की पूर्ति के लिए सर्वाधिक रूप से भूगर्भ जल पर ही निर्भर है। लिहाजा, अब एक तरफ तो भूगर्भ जल का अनवरत दोहन हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर तेज औद्योगीकरण के चलते प्रकृति को हो रहे नुकसान और पेड़-पौधों के अनियंत्रित दोहन के कारण बरसात में भी काफी कमी आ गई है। तेजी से गिरता भूजल स्तर दुनियाभर के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।
पेयजल का मुख्य स्रोत भूगर्भ जल ही है। भूजल वह जल होता है जो चट्टानों और मिट्टी से रिस जाता है और भूमि के नीचे जमा हो जाता है। जिन चट्टानों में भूजल जमा होता है, उन्हें जलभृत कहा जाता है। भारी वर्षा से जल स्तर बढ़ सकता है और इसके विपरीत, भूजल का लगातार दोहन करने से इसका स्तर गिर भी सकता है। भूजल की वर्तमान स्थिति को सुधारने के लिये भूजल का स्तर और न गिरे इस दिशा में काम किए जाने के अलावा उचित उपायों से भूजल संवर्धन की व्यवस्था हमें करनी होगी। पानी की कमी के चलते निरन्तर खोदे जा रहे गहरे कुओं और ट्यूबवेलों द्वारा भूमिगत जल का अन्धाधुन्ध दोहन होने से भूजल का स्तर निरन्तर घटता जा रहा है। देश में जल संकट का एक बड़ा कारण यह है कि जैसे-जैसे सिंचित भूमि का क्षेत्रफल बढ़ता गया वैसे-वैसे भूगर्भ के जल के स्तर में गिरावट आई है। भूजल दोहन के अंधाधुंध दुरुपयोग को यदि समय रहते रोका नहीं गया, तो आने वाली पीढियों को इसके भयानक परिणाम भुगतने होंगे। सरकार को जनता में जागरूकता लाने के लिए विशेष प्रबन्ध और उपाय करने होंगे।

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