पैट्रोल-डीज़ल की बढ़ती खपत-बचत हेतु आगे आए

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कोई समय था जब लोग कहते थे कि धरती के नीचे से क्या कभी पैट्रोल-डीज़ल ख़त्म हो सकता हैं ? मगर अब हम ऐसी समस्या का सामना कर रहें हैं,जिस से पैट्रोल -डीज़ल की कमी आ रही हैं । अब कई मौक़े ऐसे आ चुके हैं जब पम्पों से पेट्रोल-डीज़ल न मिला हो या माँग से कम एक सीमा में मिला हो । जब चाहे खाड़ी देशों के युद्ध कारण या किसी अन्य दो देशों के गुट में युद्ध हो रहा हो, तो उस की कमी आ जाती हैं । ट्रांसपोर्ट की हड़ताल के कारण भी लोगों को पैट्रोल-डीज़ल की सप्लाई सामान्य रूप से नहीं मिल पाती । कई और कारण भी हैं जिस कारण इस की आपूर्ति प्रभावित होती हैं । हमारा देश भारत अपनी माँग का केवल 15 से 18 प्रतिशत कच्चा तेल ही उत्पादित कर रहा हैं । आज कल भारत में सबसे बड़ा स्थलीय कच्चा तेल उत्पादक राजस्थान है । जब कि देश का पहला तेल भंडार,पैट्रोलियम 1889 में देश का पहला तेल भंडार ( डिगबोई ) असम में मिला था । भारत बाक़ी माँग की पूर्ति हेतु रूस और ईराक़ आदि से कच्चा तेल आयात करता है और देश में स्थापित रिफ़ायनरियों में रिफाइन करता हैं । अब सोचने की बात है जब 80 प्रतिशत माँग दूसरे देशों से तेल आयात करके पूरी हो रही हैं तो हमें कुछ न कुछ तेल बचत के लिए आगे आना चाहिए । कई बार जब समाचार आता है कि कल से पैट्रोल-डीज़ल मंहगा हो रहा हैं तो लोग अपने वाहनों में टैंकी भरवाने के लिए बड़ी-बड़ी लाइनें लगा लेते हैं, स्वाभाविक है, क्यों कि हर आदमी पैसे बचाने की कोशिश करता है और करनी भी चाहिए पर ऐसे मौक़े पर हम ने कभी यह नहीं सोचा कि जब हम लाइन में वाहन लेकर खड़े होते हैं तो बार-बार वाहन स्टार्ट करने से कितनी इंधन खपत होता हैं?
बहुत से चालक जब अपने वाहन में पम्प से हवा भरवाने आते हैं तो चाहे वहाँ लाइन लगी हो या एक ही वाहन हो ,वह अपने वाहन का इंजन बंद नहीं करते,ख़ासकर दो पहिया वाहनों वाले । दो पहिया वाहनों वाले जब अपने वाहन में पेट्रोल भरवाते हैं तो कुछ लोग लंबी लाइन में लगे होने के बावजूद भी वाहन स्टार्ट रखते हैं या फिर बार-बार स्टार्ट करके दो पहिया वाहन को आगे करते रहते हैं ।एक डाटा मुताबिक़ एक स्टार्ट खड़ा दो पहिया वाहन एक मिनट में लगभग पाँच एम. एल. पैट्रोल की खपत करता हैं । जो कि बिना मतलब की बर्बादी है । जिस से इंधन की बर्बादी होती हैं । जो लोग जागरूक हैं और बिना किसी परेशानी के पैट्रोल-डीज़ल की बचत करना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वह महीने में कम से कम एक दो दिन वाहन न चलाए । कुछ जागरूक नागरिक ड्यूटी आदि पर जाने के लिए अलग-अलग वाहनों का प्रयोग न करके एक ही वाहन प्रयोग करते हैं ।मैंने बहुत लोग ऐसे देखे हैं जो कई-कई किलोमीटर पैदल सैर के रूप में चलते हैं मगर जब बाज़ार आदि जाना होता है तो वाहन पर जाते हैं । मेरी ऐसे लोगों को सलाह है कि अगर आराम से हो सके तो वे चाहे सैर के किलोमीटर कुछ कम कर लें मगर बाज़ार आदि पैदल ही जाए । कुछ लोग (बहुत कम) ऐसे भी हैं जो घर से पार्क तक तो वाहन पर जाते हैं मगर पार्क के बाहर वाहन खड़ा करके सैर करते हैं जो कि सोचने की बात है ? आज कल रोष रैली के रूप मे वाहनों की रैलियों का प्रचलन भी बढ़ता जा रहा हैं जो कि पैट्रोल-डीज़ल की खपत के मध्यनजर रखते हुए चिंता का विषय हैं । चुनाव के दौरान भी ऐसी रैलियों को रोकने के लिए राजनीतिक पार्टियों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को आगे आना चाहिए ।
कई सड़कों पर लगी टरैफिक लाइटों पर टाइमर नहीं लगे होते जिस से रेड लाइट रूकने के लिए कितने समय की हैं, पता नहीं चलता । इस मौक़े पर अगर कोई अपने वाहन का इंजन बंद भी करना चाहता है तो नहीं कर सकता । क्योंकि कि उसे नहीं पता होता कि कितने मिनट / सेकेंड बाद हरी लाइट का जाएँगी । इस लिए स्थानीय प्रशासन, टरैफिक पुलिस आदि को चाहिए कि टरैफिक लाइट्स पर टाइमर लगाना सुनिश्चित करें । जो फ़्लाई ओवर या दूसरे पुल बना जाते हैं उनकी चढ़ाई बिलकुल एक दम तीखी नहीं होनी चाहिए क्यों कि तीखी चढ़ाई पर गाड़ियों को चढ़ाने से इंजन का ज़ोर लगता हैं और इंधन ज़्यादा खपत होती हैं । इंधन बचत हेतु हमें वाहन ओवर लोड भरने से बचना चाहिए । आज कल कई लोग अपने शौक की ख़ातिर कारों आदि के टायर निश्चित मापदंडों से अधिक चौड़े डलवा लेते हैं जो कि ग़ैर क़ानूनी भी हैं और इंधन बर्बादी का कारण भी है । मेरा पैट्रोल-डीज़ल बचत करने का उद्देश्य यह है कि जब लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल हम देश में आयात करके काम चला रहे हैं तो हमें बिना किसी की और देखे किसी न किसी ढंग से इस की बचत करना सुनिश्चित करना ही पड़ेगा ।

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