पेपर लीक के नाम पर राजनीति का प्रदर्शन नहीं चलेगा

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दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए तथाकथित “चलो संसद” मार्च ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में हर आंदोलन वास्तव में जनहित के लिए होता है या फिर कुछ आंदोलन केवल राजनीतिक उद्देश्य साधने के लिए खड़े किए जाते हैं। सोनम वांगचुक के अनशन और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आयोजित इस प्रदर्शन को जिस तरह से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने खुलकर समर्थन दिया, उससे यह आंदोलन एक स्वतंत्र जनआंदोलन कम और विपक्षी दलों के राजनीतिक मंचन का प्रयास अधिक दिखाई दिया।
जंतर-मंतर से संसद तक मार्च निकालने की कोशिश के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग तोड़ने का प्रयास किया, कई लोग संसद मार्ग की ओर बढ़े और कुछ प्रदर्शनकारी मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच गए, जहां नारेबाजी भी हुई। ऐसे समय में जब संसद का सत्र चल रहा हो और राजधानी में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता हो, तब बिना अनुमति संसद की ओर मार्च निकालना स्वाभाविक रूप से कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाता है। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार संविधान देता है, लेकिन उसके साथ कानून का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यह रही कि मंच पर और प्रदर्शन में कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के कई प्रमुख नेता मौजूद रहे। मनीष सिसोदिया, आतिशी, संजय सिंह और अन्य विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि आंदोलन अब शिक्षा सुधार की मांग से आगे बढ़कर राजनीतिक रंग ले चुका है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि यह वास्तव में छात्रों का आंदोलन था तो फिर विपक्षी दलों की इतनी सक्रिय भूमिका क्यों दिखाई दी।
पेपर लीक का मुद्दा निश्चित रूप से गंभीर है और किसी भी परीक्षा में अनियमितता होने पर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को विफल घोषित कर देना या हर परीक्षा को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना उचित नहीं कहा जा सकता। लाखों विद्यार्थियों ने कठिन परिश्रम के बाद परीक्षाएं दीं और बड़ी संख्या में छात्रों ने उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर अपनी मेहनत का प्रमाण दिया। ऐसे में यह कहना कि पूरी व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, उन लाखों ईमानदार विद्यार्थियों की मेहनत का भी अपमान माना जा सकता है।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी लगातार शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रही हैं। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि देश की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा दशकों तक उन्हीं सरकारों के अधीन विकसित हुआ, जिनका नेतृत्व कांग्रेस ने किया। यदि आज विपक्ष शिक्षा सुधार की बात करता है तो उसे यह भी बताना चाहिए कि लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए उसने कौन-सी ऐसी व्यवस्था विकसित की थी जिसने भविष्य की चुनौतियों का समाधान सुनिश्चित किया। केवल वर्तमान सरकार पर आरोप लगाना और अतीत की जिम्मेदारियों से दूरी बना लेना राजनीतिक सुविधा तो हो सकती है, लेकिन यह संतुलित दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता।
यह भी देखने योग्य है कि इस पूरे आंदोलन में अभिजीत दीपके को प्रमुख चेहरा बनाया गया, लेकिन वास्तविक राजनीतिक समर्थन विपक्षी दलों की ओर से दिखाई दिया। इससे यह धारणा बनती है कि दीपके एक ऐसे चेहरे के रूप में सामने लाए गए हैं, जिसके माध्यम से विपक्ष अपनी राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाना चाहता है। आंदोलन के पीछे वास्तविक शक्ति कौन है, इसका उत्तर प्रदर्शन में शामिल राजनीतिक दलों की सक्रियता स्वयं देती हुई प्रतीत होती है।
देश इस समय आधारभूत संरचना, डिजिटल प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष, परिवहन और वैश्विक कूटनीति जैसे अनेक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, आर्थिक विस्तार और विकास परियोजनाओं को दुनिया गंभीरता से देख रही है। ऐसे समय में यदि हर उपलब्धि के बीच लगातार असंतोष का माहौल तैयार करने का प्रयास हो, तो यह भी स्वाभाविक है कि उसके पीछे की राजनीति पर चर्चा होगी। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, लेकिन आलोचना तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलन का स्थान महत्वपूर्ण होता है, परंतु आंदोलन तभी प्रभावी होते हैं जब वे निष्पक्षता, तथ्यों और जनहित पर आधारित हों। यदि किसी आंदोलन का स्वरूप धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन में बदल जाए, तो उसके मूल उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। संसद मार्च के दौरान जिस प्रकार विपक्षी दलों की सक्रिय भागीदारी सामने आई, उससे यह धारणा मजबूत हुई कि यह केवल शिक्षा सुधार का अभियान नहीं बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक माहौल बनाने का प्रयास भी था।
लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक होती है। वह यह समझती है कि कौन-सा आंदोलन वास्तविक जनहित के लिए है और कौन-सा आंदोलन राजनीतिक लाभ के लिए। शिक्षा सुधार पर गंभीर चर्चा अवश्य होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए रचनात्मक संवाद, संस्थागत सुधार और ठोस नीति आवश्यक है, न कि केवल सड़क पर राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन। देश के विद्यार्थियों का भविष्य किसी भी दल की राजनीति से ऊपर होना चाहिए और शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाने से बचना चाहिए।

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