बाल मुकुन्द ओझा
राम और कृष्ण के देश में इस समय एक दूसरे के प्रति नफरत और घृणा की बयार बह रही है। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक तक बयानवीरों ने जैसे नफरती बयानों का ठेका ले लिया है। हिन्दू – मुस्लिम तो आज़ादी के बाद से हमारा प्रिय शगल रहा है। अब दक्षिण से सनातन को समाप्त करने की आवाज उठ रही है तो उत्तर से ब्राह्मणों के बारे में अपशब्दों की बौछारें हो रही है। देश में इस समय नफरत भरे बयानों की बाढ़ सी आ गई है। नफरत की इस सियासत ने हमारे सामाजिक ताने बाने को ध्वस्त कर दिया है। बहती गंगा में हाथ धोने के लिए सभी उतावले हो रहे है। राजनीति के इस हमाम ने सभी नंगे हो रहे है। मीडिया में बने रहने का जैसे कोई काला जादू सीख लिया है। देश में साधारण से लेकर असाधारण घटना के घटित होते ही बयान वीरों के तरकश से नफरत और घृणा के तीरों की बाढ़ सी लग जाती है। हिंसा के साथ मारों – काटों की गूंज सुनाई देने लगती है। किसी व्यक्ति विशेष या समाज के विरुद्ध नफरत और घृणा फैलाना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता। कई बार ऐसे बयानों से हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।
गंगा जमुनी तहजीब से निकले देशवासी नफरत और घृणा के तूफान में बह रहे हैं। विशेषकर नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद घृणा और नफरत के तूफानी बादल गहराने लगे है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सुचिता के स्थान पर नफरत, झूठ, अपशब्द, तथ्यों में तोड़-मरोड़ और असंसदीय भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता देखा जा सकता हैं। हमारे नेता अब आए दिन सामाजिक संस्कारों और मूल्यों को शर्मसार करते रहते हैं। स्वस्थ आलोचना से लोकतंत्र सशक्त, परंतु नफरत भरे बोल से कमजोर होता है, यह सर्व विदित है। आलोचना का जवाब दिया जा सकता है, मगर नफरत के आरोपों का नहीं। चुनाव आते ही हमारे नेताओं की बांछे खिल जाती है। मंच और भीड़ देखते ही सियासत की तकदीर लिखने लगते है। भाषणों में नफरत के तीर चलने लग जाते है। बंद जुबाने खुल जाती है। सियासी शत्रुता के गुब्बार फूटने लगते है। नीतियों और मुद्दों की बाते गौण हो जाती है।
नफरत और घृणा पर घमासान हो रहा है। अक्सर यह देखा जाता है न्यूज़ चैनलों की बहस और चर्चा में भाषा की मर्यादा ताक पर रख दी जाती है। कार्यक्रम संचालकों-प्रस्तोताओं को टीआरपी बटोरने के लिए नाना प्रकार से प्रेरित किया जाता है। ऐसे में उग्र और नफरत चर्चा और आरोप प्रत्यारोपों को रोकने के बजाय उसे और भड़का दिया जाता है। इससे सार्थक चर्चा नहीं हो पाती और पूरा समय गंदे बोलों के बीच समाप्त हो जाता है। लगता है इन चर्चाओं में भाग लेने के लिए ऐसे लोगों को बुलाया जाता है जो अपने निम्न स्तरीय बयानों के लिए जाने जाते है। आज छोटे से लेकर बड़े नेता तक ने जैसे नफरत फैलाने का ठेका ले लिया है। चुनाव के दौरान इसका अधिक उपयोग होने लगा है। घृणा की इस बहती गंगा में हाथ धोने से कोई भी नहीं चूक रहा है। समूचे ब्रम्हांड में जैसे घृणा के काले पीले बादल मंडरा रहे है। देश में नफरत की भावना का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है। या यूँ कहे समाज में कुछ लोग ऐसे है जो किसी भी हालत में सद्भावना और प्यार महोब्बत को मिटाने पर तुले हुए है। इनमें उनके निहीत स्वार्थ है। इस दौरान मिडिल ईस्ट में भयंकर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। महंगाई अपने चरम पर है। रोजी रोटी का संकट बढ़ रहा है। एक बार फिर आर्थिक मंदी, अर्थव्यवस्था में सुधार, महंगाई और युवाओं को रोजगार और विकास कहीं पीछे छूट गए है। प्रतियोगिता परीक्षाओं के पेपर लीक की घटनाओं से युवाओं में भारी निराशा व्याप्त हो रही है। देशवासी भी इन मुद्दों पर कोई ज्यादा गंभीर दिखाई नहीं देते। सियासी बोलों पर तालिया पीटने के आदि हो गए है हम।
आज पक्ष और विपक्ष में मतभेद और मनभेद की गहरी खाई है। यह अंधी खाई हमारी लोकतान्त्रिक परम्पराओं को नष्ट भ्रष्ट करने को आतुर है। भारत सदा सर्वदा से प्यार और मोहब्बत से आगे बढ़ा है। हमारा इतिहास इस बात का गवाह है हमने कभी नफरत को नहीं अपनाया। हमने सदा सहिष्णुता के मार्ग का अनुसरण कर देश को मजबूत बनाया। देश में व्याप्त नफरत के इस माहौल को खत्म कर लोकतंत्र की ज्वाला को पुर्नस्थापित करने की महती जरूरत है और यह तभी संभव है जब हम खुद अनुशासित होंगे और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं करेंगे।

नेताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है नफरत का काला जादू
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