जिसे संसार में आने नहीं दिया, ढूंढेंगे पूजन को घर घर जाकर

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आ गई अष्टमी, आ गई नवमी। घरों में तैयारियाँ हैं, मंदिरों में घंटियों की गूँज है, माँ के दरबार सजे हैं और रसोई में कन्या भोज की सुगंध फैल रही है। कहीं हलवा बन रहा है, कहीं पूड़ियाँ छन रही हैं, कहीं छोटी-छोटी बच्चियों के लिए उपहार सजाए जा रहे हैं। हर घर में एक उत्साह है, एक श्रद्धा है। लोग सुबह से ही कन्याओं को आमंत्रित करने निकल पड़ते हैं। किसी को नौ कन्याएँ चाहिए, किसी को ग्यारह, तो किसी को जितनी मिल जाएँ, उतनी ही देवी का प्रसाद मानकर पूजने की इच्छा है।
छोटी-छोटी बच्चियाँ घरों में प्रवेश करती हैं। उनके नन्हे पैरों को थाली में रखकर धोया जाता है, माथे पर तिलक लगाया जाता है, हाथ जोड़कर प्रणाम किया जाता है और प्रेमपूर्वक भोजन कराया जाता है। कुछ बच्चियाँ इस सम्मान को देखकर मुस्कराती हैं, कुछ उपहार पाकर खिलखिलाती हैं। उन्हें शायद यह भी पता नहीं होता कि आज उन्हें देवी कहा जा रहा है। वे तो बस बच्चियाँ हैं, मासूम, निश्छल और प्रेम की भूखी।
लेकिन इसी पवित्र दृश्य के बीच मन के किसी कोने में एक प्रश्न उठता है, जो उत्सव के शोर में दब जाना चाहता है। क्या आज कन्या के चरणों में झुकने वाला प्रत्येक सिर, जीवन में भी कन्या के सम्मान के सामने झुकता है?
क्या हर वह हाथ, जो आज छोटी बच्ची के पैरों को श्रद्धापूर्वक धो रहा है, कल किसी बेटी के जन्म की खबर सुनकर भी उतना ही प्रसन्न होगा? क्या हर वह परिवार, जो आज कन्या को देवी मानकर भोजन करा रहा है, अपनी बहू के गर्भ में पल रही बेटी का भी उसी उत्साह से स्वागत करेगा?
ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए हैं। शायद हमारे लिए भी, आपके लिए भी। एक दिन देवी, बाकी दिन बोझ क्यों?
हमारा समाज कितना विचित्र है! एक ओर हम माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना करते हैं, कन्याओं के चरणों में सिर झुकाते हैं, उनसे आशीर्वाद माँगते हैं और दूसरी ओर आज भी कहीं-कहीं बेटी के जन्म पर घरों में उदासी छा जाती है।
बेटा पैदा हो तो मिठाइयाँ बँटती हैं, ढोल बजते हैं, बधाइयाँ दी जाती हैं। बेटी जन्म ले तो कुछ चेहरों पर मुस्कान आने से पहले चिंता की रेखाएँ खिंच जाती हैं। कोई दहेज की चिंता करता है, कोई वंश का नाम आगे बढ़ाने की बात करता है, तो कोई मन ही मन यह हिसाब लगाने लगता है कि इस बच्ची के पालन-पोषण और विवाह में कितना खर्च होगा।
और इससे भी अधिक पीड़ादायक वह मानसिकता है, जो गर्भ में पल रही बच्ची को संसार देखने का अधिकार तक नहीं देना चाहती। लिंग के आधार पर भ्रूण का गर्भपात, जहाँ भी होता है, वहाँ केवल एक जीवन की संभावना समाप्त नहीं होती, बल्कि मनुष्यता के विवेक पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।
अष्टमी नवमी आती आते ही वही समाज कन्या खोजने निकल पड़ता है। वही हाथ, जो बेटी के जन्म पर कभी निराशा से झुक गए थे, आज देवी के चरणों में फूल चढ़ाते हैं। वही मन, जो कभी बेटी को जिम्मेदारी समझता था, आज उसके सामने सुख-समृद्धि की प्रार्थना करता है।
यह कैसी विडंबना है कि जिस बेटी के जन्म से कभी घर का आँगन उदास हो जाता है, उसी बेटी के चरणों में सुख-समृद्धि की कामना लेकर पूरा घर सिर झुकाता है!
क्या हमारी आस्था इतनी कमजोर है कि वह नौ दिनों में जागती है और बाकी दिनों में सो जाती है? या हमने धर्म के बाहरी स्वरूप को इतना महत्त्व दे दिया है कि उसके भीतर छिपे जीवन-मूल्यों को ही भूल बैठे हैं?
कल्पना कीजिए, अष्टमी की सुबह है। एक व्यक्ति कन्या पूजन की तैयारी कर रहा है। उसने पूजा की थाली सजाई है, हलवा-पूड़ी बनवाई है और घर के आँगन में आसन बिछाए हैं। बच्चियाँ आती हैं। वह उनके चरण धोता है, तिलक लगाता है और श्रद्धापूर्वक भोजन कराता है।
सब कुछ विधिपूर्वक हो रहा है। लेकिन अचानक उसकी दृष्टि दीवार पर लगे आईने पर पड़ती है। उस आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई देता है। वही चेहरा, जो आज देवी के सामने विनम्र है। वही चेहरा, जिसने कभी बेटी के जन्म की संभावना पर चिंता व्यक्त की थी। वही चेहरा, जिसने किसी परिवार में बेटी पैदा होने पर अनजाने में सहानुभूति के नाम पर दुख जताया था। या शायद वही चेहरा, जिसने अपनी बहू पर बेटे को जन्म देने का दबाव बनाया था।
तब क्या वह आईना केवल चेहरे की झुर्रियाँ दिखाएगा? क्या वह आँखों के नीचे का थकान भरा अँधेरा ही बताएगा? या वह मनुष्य को उसके भीतर छिपे उस सच से भी परिचित कराएगा, जिसे वह दुनिया से ही नहीं, स्वयं से भी छिपाता आया है?
आईना कभी झूठ नहीं बोलता। लेकिन जीवन का सबसे कठिन आईना वह है, जिसमें हमें अपना चरित्र दिखाई देता है। उसमें चेहरा सुंदर हो सकता है, वस्त्र साफ हो सकते हैं, माथे पर तिलक हो सकता है, पर यदि मन में बेटी के प्रति भेदभाव है, तो वह तिलक उस सोच को पवित्र नहीं बना सकता।
कन्या के चरणों में झुकना आसान है। अपनी सोच के अहंकार को झुकाना कठिन है। देवी को भोग लगाना आसान है। अपनी बहू, बेटी और पत्नी के अधिकारों का सम्मान करना कठिन है। किसी बच्ची को उपहार देना आसान है। उसे जीवनभर सुरक्षित, स्वतंत्र और सम्मानित वातावरण देना कठिन है।
लेकिन धर्म की वास्तविक परीक्षा वहीं होती है, जहाँ दिखावे की सुविधा समाप्त होती है और जिम्मेदारी आरंभ होती है।
जिस बेटी को जन्म नहीं लेने दिया, उसकी कल्पना से भी पूछिए
यदि किसी परिवार ने कभी लिंग के आधार पर अपनी बेटी को गर्भ में ही समाप्त करने का निर्णय लिया हो, तो अष्टमी के दिन कन्या के चरण धोते समय क्या उसके मन में कभी यह विचार आता होगा कि यदि वह बेटी जन्म लेती, तो आज उसकी उम्र भी इतनी ही होती? उसके भी नन्हे हाथ होते, उसकी भी आँखों में सपने होते। वह भी माँ की गोद में सिर रखकर सोती, पिता की उँगली पकड़कर चलना सीखती और घर के आँगन में खिलखिलाती।
वह भी शायद पहली बार स्कूल जाते समय रोती। वह भी अपने जन्मदिन पर केक काटने की जिद करती। वह भी राखी बाँधती, त्योहार मनाती और अपने परिवार की खुशियों में रंग भरती। लेकिन यह सब केवल कल्पना है। जिस जीवन को संसार में आने का अवसर ही नहीं मिला, उसकी आवाज हम कभी सुन नहीं सकते।
यह विचार किसी को अपराधबोध में डुबोने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति सजग करने के लिए है। बीते हुए निर्णयों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन आने वाले निर्णयों में संवेदना, विवेक और समानता को स्थान अवश्य दिया जा सकता है।
यदि कभी हमने बेटी को लेकर भेदभावपूर्ण विचार रखे हैं, तो आज उन विचारों को बदलने का अवसर है। यदि हमने किसी परिवार में बेटी के जन्म पर निराशा व्यक्त की है, तो आज अपनी सोच सुधारने का अवसर है। और यदि हम समाज में ऐसी मानसिकता देखते हैं, तो उसके विरुद्ध सम्मानपूर्वक आवाज उठाने का अवसर है।
क्योंकि परिवर्तन की शुरुआत स्वीकार करने से होती है और सुधार की शुरुआत अपने भीतर झाँकने से।
कन्या पूजन संपन्न हो जाएगा। बच्चियाँ भोजन करके अपने घर लौट जाएँगी। पूजा की थाली समेट दी जाएगी, बर्तन धुल जाएँगे और घर के लोग अपने दैनिक कार्यों में लग जाएँगे।
लेकिन उस दिन के बाद भी एक बेटी स्कूल जाएगी। एक बेटी अपने घर में पढ़ाई के लिए जगह माँगेगी। एक बेटी अपने सपनों को पूरा करने के लिए परिवार का सहयोग चाहेगी। एक बहू अपने निर्णयों का सम्मान चाहेगी। एक माँ अपने बुढ़ापे में अपने बच्चों से अपनापन चाहेगी।
तब क्या हम उन्हें वही सम्मान दे पाएँगे, जो अष्टमी के दिन देवी को दिया था?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है, तो हमारा कन्या पूजन केवल परंपरा नहीं, संस्कार है। लेकिन यदि पूजा के बाद भी घर में बेटी और बेटे के बीच भेदभाव जारी रहता है, तो हमें अपनी श्रद्धा के अर्थ पर फिर से विचार करना होगा।
कन्या के पैरों में शुभ रंग लगाने से पहले, उसके जीवन में सम्मान के रंग भरना अधिक आवश्यक है। उसके माथे पर तिलक लगाने से पहले, उसके भविष्य पर लगे भेदभाव के धब्बे मिटाना अधिक आवश्यक है।
आइए, इस बार कन्या पूजन करते समय केवल माता रानी से सुख-समृद्धि न माँगें। अपने भीतर इतनी संवेदना माँगें कि किसी बेटी के जन्म पर हमारा चेहरा कभी उदास न हो। इतनी हिम्मत माँगें कि बेटी और बेटे के बीच भेदभाव करने वाली परंपराओं का विरोध कर सकें। इतना विवेक माँगें कि किसी बच्ची की गरिमा को कभी अपनी प्रतिष्ठा से छोटा न समझें।
जब किसी कन्या के चरण धोएँ, तो मन ही मन यह भी संकल्प लें कि किसी बेटी के सपनों को नहीं कुचलेंगे। जब उसे भोजन कराएँ, तो याद रखें कि समाज में कोई बच्ची भूख, अभाव या उपेक्षा से न जूझे, इसके लिए भी हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करना है। जब उसे उपहार दें, तो यह भी सोचें कि हर बेटी को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार मिले।
क्योंकि देवी की आराधना का अर्थ केवल शक्ति के सामने सिर झुकाना नहीं, बल्कि हर उस जीवन की शक्ति को पहचानना भी है, जिसे समाज ने कभी कमजोर समझ लिया था।
अष्टमी और नवमी फिर आएँगी। मंदिर फिर सजेंगे। कन्या पूजन फिर होगा। लेकिन इस बार यदि किसी घर में बेटी जन्म ले, तो उसके स्वागत में भी वही प्रसन्नता हो जो आज कन्या पूजन के समय दिखाई देती है। यदि कोई बेटी अपने सपनों की बात करे, तो उसे रोकने के बजाय उसके साथ चलने का साहस दिखाया जाए। यदि कोई परिवार बेटी के जन्म को लेकर निराश हो, तो उसे समझाया जाए कि संतान का मूल्य उसके लिंग से नहीं, उसके जीवन और अस्तित्व से है। तभी यह उत्सव हमारे भीतर कुछ बदल पाएगा।
याद रखिए, देवी को नौ दिनों तक पूजना हमारी परंपरा है, लेकिन बेटी को जीवनभर सम्मान देना हमारा धर्म है।
अष्टमी-नवमी का आईना आज हमारे सामने है। उसमें केवल अपना चेहरा मत देखिए, अपनी सोच भी देखिए। अपनी पूजा मत गिनिए, अपने व्यवहार को भी परखिए।
और जब कन्या आपके घर से विदा हो, तो उसके साथ केवल दक्षिणा और उपहार ही न जाएँ; उसके मन में यह विश्वास भी जाए कि यह संसार उसका है, उसका जीवन अनमोल है और वह किसी से कम नहीं है।
क्योंकि सच्ची विजय उस दिन होगी, जब कन्या पूजन के लिए हमें गलियों में देवी खोजने की जरूरत तो पड़े, लेकिन किसी घर में बेटी के जन्म पर उदासी खोजने की जरूरत कभी न पड़े।
यही अष्टमी-नवमी का वास्तविक संदेश है। यही माँ दुर्गा के प्रति सच्ची श्रद्धा है। और यही वह संस्कार है, जिसकी आज हमारे समाज को सबसे अधिक आवश्यकता है। जय माता दी!

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