– बाल मुकुन्द ओझा
वोट चोरी को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। नेताओं के जहरीले बयानों और भाषणों से वातावरण विषाक्त हो रहा है। इससे हमारी लोकतांत्रिक परम्परायें कमजोर और क्षतिग्रस्त हुई हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया में संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों सहित देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का उपयोग और प्रयोग हो रहा है वह हम सब के लिए बेहद चिंता और निराशाजनक है। सोशल मीडिया इसमें सबसे आगे है जहाँ ऐसे ऐसे शब्दों को देखा जा रहा है जिनकों इस आलेख में लिखा जाना कतई मुनासिब नहीं है। राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अनाप सनाप बयान दिए जा रहे है। प्रधान मंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को सरेआम गालियों से नवाज़ा जा रहा है। कांग्रेस और उनके सहयोगी इंडि ब्लॉक के नेता और कार्यकर्त्ता नेपाल जैसे आंदोलन का आह्वान कर मोदी सरकार को सत्ताच्युत करने की योजना को अंतिम रूप देने का प्रयास कर रहे है। सरकार के खिलाफ भगवान शिव की बारात की तरह विभिन्न समूहों को एक झंडे के नीचे आने का आह्वान किया जा रहा है। पलटवार करते हुए भाजपा के नेता, कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को नालायक कहने से गुरेज नहीं कर रहे है। लगता है कांग्रेस और उनके गठबंधन को यह लगने लगा है कि वोट के जरिये मोदी को हराना मुश्किल है। भाजपा का कहना है जहां कांग्रेस और उनके सहयोगी जीतते है वहां सब कुछ ठीक है मगर भाजपा जीतती है वहां वोट चोरी हो रही है। दूसरी तरह जिस अखबार की खबर पर इतना बड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ है उस पर तीनों चुनाव आयुक्तों ने एक साथ कोई बयान या प्रेस कांफ्रेंस के जरिये अपनी बात स्पष्ट रूप से नहीं की है। हालाँकि चुनाव आयोग ने ऐसी किसी अखबारी घटना से इंकार किया है। बहरहाल विपक्ष को मोदी सरकार पर हमले का मौका मिल गया है और वह इसे अपने हाथ से गंवाने के मूढ़ में नहीं है। मगर देखने की बात तो यह है ऐसे आंदोलन शांतिपूर्वक नहीं हो रहे है। छीना झपटी, सड़क पर लोटपोट, एक दूसरे को पटकनी जैसी घटनाएं आम रूप से हो रही है। सहिष्णुता और सहनशीलता की सारी मर्यादाएं तार तार हो रही है। सरकार के खिलाफ आंदोलन विपक्ष का हथियार है मगर मर्यादाओं का हनन लोकतंत्र के लिए हितकारी नहीं कहा जा सकता। आंदोलन की कवरेज करने वाले पत्रकारों के बारे में भी हेरत अंगेज जानकारी मिल रही है। बहुत से लोगों के गले में प्रेस के कार्ड और हाथों में माइक देखे जा रहे है जो पुलिस को टारगेट कर बयानबाज़ी कर रहे है। आरोप है ये लोग केवल अपना एजेंडा फिट कर रहे है और किसी पार्टी विशेष के पक्ष में जुटे है। विभिन्न न्यूज़ चैनलों के पूर्व एंकरों को भी अपने हिसाब से और पार्टी विशेष के पक्ष में कवरेज करते देखा जा रहा है। कुछ राष्ट्रीय चैनलों के पत्रकारों को गोदी मीडिया के सम्बोधन से दुत्कारा जा रहा है।
आज पंडित नेहरू, फिरोज गाँधी, डॉ लोहिया, एस एम बनर्जी, नाथ पाई, भूपेश गुप्त, ज्योतिर्मय बसु, पीलू मोदी, एन जी रंगा, अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी, हुकुम चंद कछवाय, मधु लिमये, किशन पटनायक सरीखे तर्क- वितर्क में निपुण सांसदों की सहज ही याद आती है जिनके बयानों से संसद की गरिमा को चार चाँद लगते थे। जो आम आदमी की बहबुद्धि के लिए उच्च स्तर की बहस के लिए विख्यात थे। सहिष्णुता इनकी रग रग में थी। उतेजना की स्थिति में भी इन्होंने अपने विरोधियों के लिए हल्के शब्दों का प्रयोग नही किया। ये ही हमारे लोकतंत्र के सच्चे वाहक थे।
सहिष्णुता का शब्दिक अर्थ है, शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। बताया जाता है कि सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को दम्भी या अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है।
सहनशीलता हमारे जीवन का मूल मंत्र है। आज देश और समाज में जिस प्रकार का वातावरण उत्पन्न किया जा रहा है वह किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। सभी पक्षों को संयम और सहनशीलता से काम करना चाहिये। असहिष्णुता देश की एकता और अखण्डता को क्षति पहुंचाने का कार्य करती है। सहनशीलता वातावरण में शांति और सौहाद्रता की भावना का विकास करती है। गांधी के राम राज्य के सपने को साकार रूप देने के लिए हमें समाज में सहिष्णुता के वातावरण को फैलाना चाहिये। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है और मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हमें आपसी शत्रुता, कटुता के वातावरण को समाप्त कर सहिष्णुता का भाव जगाने की महती जरूरत है।

लोकतंत्र की सारी मर्यादाएं हो रही है तार तार सहिष्णुता जीवन का मूलमंत्र
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