बारां। “संस्कारों की शुरुआत घर से होती है। नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए परिवार में संस्कारों के बीजारोपण के साथ युवाओं को साहित्य, लोकसंस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना होगा।” यह विचार 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के संस्थापक-प्रवर्तक वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार अनिल सक्सेना ‘ललकार’ ने रविवार को बारां में आयोजित ‘बारां साहित्य एवं लोकसंस्कृति संवाद-2026’ में व्यक्त किए। सक्सेना ने कहा कि साहित्य को केवल पुस्तकों और आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय सामाजिक जीवन से जोड़ना जरूरी है। लोकगीतों, लोककलाओं, परंपराओं और लोकस्मृतियों में समाज का इतिहास, अनुभव और सांस्कृतिक पहचान समाहित है। इस विरासत का संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अगली पीढ़ी तक हस्तांतरण सामूहिक जिम्मेदारी है। शिक्षकों, साहित्यकारों, पत्रकारों और समाज के विभिन्न वर्गों को मिलकर ऐसे प्रयास करने चाहिए, जिनसे युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति समझ और जुड़ाव विकसित हो। उन्होंने स्थानीय साहित्य और लोकसंस्कृति को व्यापक पहचान दिलाने के लिए डिजिटल माध्यमों के उपयोग पर भी जोर दिया। 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के तहत होटल सोनी जी की ढाणी, तालवाड़ा रोड पर आयोजित संवाद का विषय ‘अपनी जड़ों से जुड़ता युवा : साहित्य और लोकसंस्कृति का नवजागरण’ था। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया। अध्यक्षता आंदोलन के संस्थापक-प्रवर्तक एवं संयोजक अनिल सक्सेना ‘ललकार’ ने की।
2010 से चल रहा है राजस्थान साहित्यिक आंदोलन
सक्सेना ने बताया कि वर्ष 2010 से संचालित 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के तहत प्रदेश में अब तक एक हजार से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। आंदोलन का उद्देश्य साहित्य, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को समाज से जोड़ना, स्थानीय प्रतिभाओं को मंच देना तथा युवाओं की भागीदारी बढ़ाना है। आंदोलन को राजस्थान की 11,251 ग्राम पंचायतों तक पहुंचाना इसका व्यापक लक्ष्य है।
शिक्षा और डिजिटल माध्यमों से युवाओं तक पहुंचे साहित्य
कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार किशन रतनानी ने हाड़ौती की समृद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई। भारतीय सूचना सेवा के पूर्व अधिकारी रतनानी आंदोलन के कोटा संभाग प्रभारी एवं कार्यक्रम समन्वयक हैं। राजस्थान के कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी ने कहा कि शिक्षा के विभिन्न केंद्रों में साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। शिक्षाविद् डॉ. सुधीरा ने डिजिटल माध्यमों के जरिए साहित्य और संस्कृति को युवाओं तक पहुंचाने तथा उनकी प्रतिभा को सामने लाने पर जोर दिया। लेखक जगदीश सोनी ने बारां की साहित्यिक एवं लोकसांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता बताई। शिक्षाविद् कृष्ण मुरारी मीणा ने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने पर विचार रखे। पत्रकार घनश्याम दाधीच ने कहा कि संरक्षण के अभाव में अनेक लोकपरंपराएं विलुप्त हो सकती हैं। इनके संरक्षण और अगली पीढ़ी तक हस्तांतरण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
‘मेरी आँखों से मेरा समय’ पुस्तक का लोकार्पण
कार्यक्रम में अनिल सक्सेना ‘ललकार’ की पुस्तक ‘मेरी आँखों से मेरा समय’ का अतिथियों ने लोकार्पण किया। सक्सेना ने बताया कि एक पत्रकार के रूप में उन्होंने बीते दशकों में देश, समाज और राजनीति में आए बदलावों को करीब से देखा है। विभिन्न घटनाओं, यात्राओं और लोगों से मिले अनुभवों के आधार पर तैयार यह पुस्तक उनके अनुभवों और बदलते समय का दस्तावेज है। इस अवसर पर किशन रतनानी ने अपनी पुस्तक ‘आहुति’, जगदीश सोनी ने ‘बलि पथ’ और ‘काव्य क्रांति’ तथा श्याम अंकुर ने ‘दुखिया तेरी पीर’ पुस्तक अतिथियों को भेंट की।
कवि सम्मेलन में कवियों ने प्रस्तुत की रचनाएं
संवाद के बाद आयोजित कवि सम्मेलन में जगदीश सोनी, किशन रतनानी, जगदीश निराला, ओम प्रकाश साहू, श्याम अंकुर, जितेंद्र साहू, नाथूलाल निर्भय, प्रशांत टहिलियानी, कुलदीप विद्यार्थी, अश्विनी त्रिपाठी, डॉ. कौशल तिवारी, बछराज राजस्थानी, सोनू सुरीला, मयंक सोलंकी और राजेन्द्र शर्मा ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम में बारां जिले के साहित्यकारों, कलाकारों, प्रबुद्धजनों और युवाओं ने भागीदारी की। आयोजन में राजस्थान मीडिया एक्शन फोरम और यूथ मूवमेंट, राजस्थान का सहयोग रहा। संवाद के माध्यम से साहित्य, लोकसंस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने तथा क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश दिया गया।



