-सुनील कुमार महला
ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रही है और इसका प्रभाव भारत में बेहद स्पष्ट और चिंताजनक रूप से दिखाई दे रहा है। हाल ही में जारी रियल-टाइम वैश्विक तापमान रैंकिंग के अनुसार, दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 95 शहर अकेले भारत के हैं, जबकि टॉप-20 सबसे गर्म शहरों में 19 भारत के ही शामिल हैं। यह स्थिति बताती है कि देश इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अप्रैल माह में ही देश के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है और मध्य भारत से लेकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक अनेक शहरों में लू का प्रकोप देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर तापमान 45°C के करीब दर्ज किया गया है। इस सूची में केवल बड़े महानगर ही नहीं, बल्कि छोटे कस्बे भी शामिल हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि गर्मी का प्रभाव व्यापक और गहराई तक फैल चुका है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य सबसे अधिक प्रभावित हैं, जहां के कई शहर वैश्विक सूची में प्रमुखता से दर्ज हैं। मौसम संबंधी रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा इस समय हाई हीट रिस्क जोन में है, जबकि सामान्यतः अफ्रीका और अरब देशों को दुनिया का सबसे गर्म क्षेत्र माना जाता था, लेकिन अब भारत के शहर उन्हें भी पीछे छोड़ते नजर आ रहे हैं।
वास्तव में आज के समय में भारत के शहर तेजी से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में बदलते जा रहे हैं, जहां कंक्रीट, डामर और कांच से बनी इमारतें दिनभर गर्मी को सोखती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे तापमान कम नहीं हो पाता। मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम, लखनऊ, कानपुर, बेंगलुरु, कटक, जयपुर और भोपाल जैसे शहर इस प्रभाव की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। मकानों की सीमेंट की छतें और घनी बस्तियां भी गर्मी को बढ़ाने में योगदान दे रही हैं। एक उपलब्ध आंकड़े के अनुसार, पिछले एक दशक में ‘वार्म नाइट्स’ यानी गर्म रातों में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 में ही फरवरी के अंत तक रात के तापमान में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। वर्तमान स्थिति यह है कि देश के 266 जिले अत्यंत गंभीर गर्मी की श्रेणी में, 151 जिले गंभीर श्रेणी में और 201 जिले मध्यम श्रेणी में आ चुके हैं, जो स्थिति की भयावहता को दर्शाता है।
यदि कारणों की बात करें तो भारत में ग्लोबल वार्मिंग केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। इसके प्रमुख कारणों में कोयला, पेट्रोल और डीज़ल जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और कंक्रीट का विस्तार, वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ता औद्योगीकरण और प्रदूषण, परिवहन क्षेत्र का तेजी से विस्तार, विलासितापूर्ण जीवनशैली, कृषि गतिविधियों से उत्सर्जन, कचरा और प्लास्टिक प्रबंधन की समस्या तथा तेजी से बढ़ती जनसंख्या शामिल हैं। स्पष्ट है कि ये सभी कारक मिलकर तापमान वृद्धि को और तेज कर रहे हैं।
हाल फिलहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव आज पूरी दुनिया में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। इसके कारण पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे भीषण गर्मी, अनियमित वर्षा और सूखा जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके कारण समुद्र स्तर बढ़ रहा है और तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा, जैव विविधता पर भी गंभीर असर पड़ रहा है, कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। मानव स्वास्थ्य, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे यह एक वैश्विक संकट बन चुका है।
अंततः, यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। इस समस्या को कम करने के लिए सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों को अपनाना, वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, वनों की कटाई रोकना, निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन या साइकिल का उपयोग करना, बिजली और पानी की बचत करना, प्लास्टिक का सीमित उपयोग करना और कचरे का सही प्रबंधन करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। सामूहिक प्रयासों से ही इस बढ़ती हुई चुनौती का समाधान संभव है और भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है।



