कांग्रेस के माथे से नहीं मिटा इमरजेंसी का कलंक

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-बाल मुकुन्द ओझा
लाख चेष्टा के बाद भी कांग्रेस इमरजेंसी के दाग को अपने दामन से आज तक नहीं मिटा पाई है। यह लोकतंत्र पर सीधा हमला था। 25 जून 1975 को भारत में इमरजेंसी लागू हुई थी। नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत लाखों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय दौर माना जाता है। 21 महीनों की यह अवधि नागरिक स्वतंत्रताओं के निलंबन, मीडिया की स्वतंत्रता के हनन, विपक्ष के दमन, और अधिनायकवादी शासन तथा भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गई। आधी सदी बाद भी इसका राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक प्रभाव भारत की राजनीति में महसूस किया जा सकता है। इमरजेंसी लागू करने वाली कांग्रेस वर्तमान भाजपा सरकार पर लोकतंत्र की अनदेखी के हज़ार आरोप लगाएं मगर इमरजेंसी के आगे सब आरोप बेमानी है।
इमरजेंसी भारत के इतिहास का वह काला अध्याय है जिसमें मेरे जैसे हजारों युवा जोर जुल्म के शिकार हुए। 25 जून, 1975 को हम लोग जेपी आंदोलन के विस्तार की योजना बना रहे थे कि अचानक इमरजेंसी की घोषणा सुनकर स्तब्ध रह गए। कुछ साथी गिरफ्तार हुए और कुछ मेरे जैसे पहले भूमिगत हुए और फिर विभिन्न धाराओं में गिरफ्तारी का दंश झेला। मुझे आज भी मुझे स्मरण है, देश में जेपी आंदोलन अपने परवान पर था। बिहार गुजरात से होते हुए आंदोलन गांव गुवाड़ तक फेल चुका था। राजस्थान में भी आंदोलन की आग प्रज्वलित हो चुकी थी। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के बैनर तले छात्र और युवा सड़कों पर उतर चुके थे। इन पंक्तियों के लेखक भी जेपी आंदोलन में सक्रीय रूप से भाग लेकर आपातकाल पूर्व अपनी गिरफ़्तारी दे चुके थे। 25 जून 1975 को अपने गांव चूरू में आंदोलन की रूप रेखा बना ही रहे थे कि इमरजेंसी घोषित होने और नेताओं की गिरफ्तारी का समाचार आग की तरह फेल गया। मैं भूमिगत हो गया और कई महीनों तक लुक छिप कर देशव्यापी भ्रमण करते हुए अपने गांव पहुंचा तो विभिन्न धाराओं में पकड़ लिया गया।
25 जून 2025 को आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर बीते कुछ सालों की तरह मीडिया पर आज भी इसकी खूब चर्चा है। देश में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की 21 महीने की अवधि का आपातकाल था। इस दौरान जोर जुल्म, भ्रष्टाचार, तानाशाही और ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं से लेकर सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया था। प्रेस की आजादी को कुचल दिया गया। हमेशा की तरह भाजपा समर्थकों और अन्य लोगों ने कांग्रेस को जमकर निशाना बनाया है। भाजपा का आरोप है की कांग्रेस लोकतंत्र को समाप्त करने पर उतारू है और उसने आपातकाल से कोई सबक नहीं सीखा वहीं कांग्रेस कह रही है मोदी ने देश में अघोषित आपातकाल लगा रखा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल घोषित किया था। यह 19 महीने तक लागू रहा। इस दौर को भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में काले दिनों के रूप में याद किया जाता है। इंदिरा गांधी का दावा था कि जयप्रकाश नारायण ने सशस्त्र बलों से कहा था कि कांग्रेस शासकों के अवैध आदेशों को नहीं मानें। इसने देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर दी और भारतीय गणतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह गया था।
आपातकाल के दौरान लोकतंत्र को कुचल दिया गया था और तमाम विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। बर्बरता और बेरहमी के साथ राजनीतिक विरोधियों पर जुल्म की पराकाष्ठा हुई। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर सबसे ‘बदनुमा धब्बा और देश के प्रजातंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन है। आपातकाल में कई तरह के काले कानून लागू किए गए। लाखों लोगों को गिरफ्तार किया गया। लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई। आपातकाल का विरोध करने पर मीसा और डीआईआर जैसे कानूनों का उपयोग कर देश में लाखों लोग जेल में बंद कर दिए गए

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