-सुनील कुमार महला
आज धरती का तापमान लगातार बढ़ता ही चला जा रहा है। वास्तव में, कहना ग़लत नहीं होगा कि वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि आज पूरी मानवता के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, वनों की अंधाधुंध कटाई, तेज़ी से बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण और कार्बन उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका प्रभाव पूरी दुनिया में हीटवेव, सूखा, बाढ़, अनियमित वर्षा, समुद्र-स्तर में वृद्धि और जंगलों में भीषण आग जैसी घटनाओं के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बढ़ती गर्मी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, श्रमिकों तथा गरीब और विकासशील देशों की आबादी पर पड़ रहा है।
इसी संदर्भ में शिकागो विश्वविद्यालय के ऊर्जा नीति संस्थान (इपीआइसी) के अंतर्गत कार्यरत क्लाइमेट इंपेक्ट लैब ने मार्च 2026 में ‘अडैप्टेशन रोडमैप: ह्यूमन हेल्थ-बढ़ते तापमान का मौत पर असर मापना ताकि अडैप्टेशन प्लानिंग को टारगेट किया जा सके’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की है। यह रिपोर्ट बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण होने वाली ताप-जनित (हीट-रिलेटेड) मौतों तथा उनसे बचाव के उपायों का विस्तृत आकलन प्रस्तुत करती है। रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक तापमान वर्तमान गति से बढ़ता रहा, तो अत्यधिक गर्मी के कारण हर वर्ष लगभग 4.3 लाख (430,000) अतिरिक्त लोगों की मृत्यु हो सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब देशों पर पड़ेगा, क्योंकि वहाँ जलवायु अनुकूलन (एडैप्टेशन) के लिए आवश्यक संसाधन सीमित हैं। रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि मृत्यु दर केवल तापमान बढ़ने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि लोगों को विश्वसनीय बिजली, एयर कंडीशनर, शीतल आवास, स्वास्थ्य सेवाएँ और प्रभावी हीट-एक्शन प्लान जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं। दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका को सबसे अधिक जोखिम वाला क्षेत्र बताया गया है, क्योंकि वहाँ अत्यधिक गर्मी के साथ गरीबी और ऊर्जा की कमी भी मौजूद है। बढ़ते तापमान का एक और गंभीर परिणाम जंगलों में लगने वाली आग की बढ़ती घटनाएँ हैं। इससे न केवल जैव-विविधता और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचता है, बल्कि मानव बस्तियाँ भी खतरे में आ जाती हैं। यूरोप, जिसे कभी अपेक्षाकृत ठंडा क्षेत्र माना जाता था, अब वहाँ भी वनाग्नि की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के जंगल हाल के वर्षों में भीषण आग से प्रभावित हुए, जिसके कारण लगभग ढाई लाख लोगों को अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। भारत में भी हर वर्ष जंगलों की आग से वन संपदा, वन्यजीवों और पर्यावरण को व्यापक क्षति होती है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि अभी से स्वच्छ ऊर्जा, विश्वसनीय बिजली, किफायती शीतलन (कूलिंग) सुविधाओं, प्रभावी हीट-एक्शन प्लान, सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु-अनुकूल अवसंरचना में निवेश किया जाए, तो वर्ष 2050 तक होने वाली लाखों संभावित मौतों को रोका जा सकता है। सरल शब्दों में कहें तो यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के लिए भी गंभीर संकट बन चुका है। इसलिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, हरित ऊर्जा को बढ़ावा, वनों का संरक्षण और प्रभावी जलवायु अनुकूलन उपाय अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विश्व स्तर पर अनेक योजनाएँ और कार्यक्रम बनाए गए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। विडंबना यह है कि जिन देशों का कार्बन उत्सर्जन में योगदान सबसे कम है, वही जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर दुष्प्रभाव झेल रहे हैं। दूसरी ओर, विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, बढ़ता शहरीकरण, औद्योगीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या तथा बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई कार्बन उत्सर्जन को लगातार बढ़ा रहे हैं। इसमें विकसित देशों का योगदान सबसे अधिक है, फिर भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में उनकी अपेक्षित सक्रियता दिखाई नहीं देती।
अंततः निष्कर्ष के तौर पर यहां पर यह कहना ग़लत नहीं होगा कि वैश्विक तापमान को कम करना केवल सरकारों की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सौर, पवन और जल जैसी हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और वनों का संरक्षण, ऊर्जा की बचत, सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी तथा उद्योगों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान और जन-जागरूकता को भी बढ़ावा देना होगा। यदि आज ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को और भी गंभीर जलवायु संकट का सामना करना पड़ेगा। इसलिए प्रकृति के साथ संतुलित विकास का मार्ग अपनाकर ही पृथ्वी को सुरक्षित, स्वच्छ और रहने योग्य बनाया जा सकता है।



