सुहागिनों का खास पर्व है सातुड़ी तीज

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बाल मुकुंद ओझा
भारत तीज त्योहारों का देश है। हमारे देश में तीज त्योहार का अपना ही अलग महत्व है और अलग अलग स्थानों पर श्रद्धालु इसे अपनी तरह से उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं। हमारे यहाँ चार प्रकार की तीज मुख्यत रूप से मनाई जाती हैं। इनमें आखा तीज, हरियाली तीज, कजरी तीज यानि सातुड़ी तीज तथा हरतालिका तीज शामिल है। हरियाली तीज के बाद आने वाली कजरी तीज सुहागिनों के लिए खास होती है। इस दिन विवाहित महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती के साथ चंद्रमा की पूजा करती हैं। इसे सातुड़ी या बड़ी तीज के नाम से भी जानते हैं। सुहागन महिलाओं के लिए कजरी तीज बेहद ही जरूरी व्रत माना जाता है। इस दिन वे उपवास रखकर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। हरियाली और हरतालिका की ही तरह कजरी तीज में भी महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करती हैं।
भाद्रपद महीने में रक्षाबंधन के 3 दिन बाद तथा श्री कृष्ण जन्माष्टमी से 5 दिन पहले कृष्णा तृतीया को कजरी तीज पर्व मनाया जाता है। हिंदी पंचाग के अनुसार यह त्‍योहार हर साल भाद्रमास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को आता है। कजरी तीज का व्रत भाद्र पद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर रखा जाता है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 30 अगस्त को सुबह 9 बजकर 36 मिनट पर होगा। तृतीया तिथि का समापन 31 अगस्त को सुबह 8 बजकर 50 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, कजरी तीज 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी। कजरी तीज का व्रत वैसे तो सुहागिन महिलाएं ही रखती हैं लेकिन मान्यता है कि जिन लड़कियों की शादी में बाधांए आ रही हो वो भी कजरी तीज का व्रत रखती हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार मध्य भारत में कजली नाम का एक वन था, जो राजा दादूरै के क्षेत्र में पड़ता था। इस वन में राजा अपनी रानी के साथ विहार करने आया करते थे, और यह वन उनके प्रेम का गवाह था। लोग इस वन के नाम पर कजरी गीत गाया करते थे, धीरे धीरे यह गीत दूर-दूर तक फैलने लगा। कुछ समय पश्चात् राजा की मृत्यु हो गयी, और रानी उसकी चिता में सती हो गयी। उन दोनों के अमर प्रेम के कारण वहां के लोग कजरी के गाने पति-पत्नी के प्रेम के प्रतीक के रूप में गाने लगे। इसके अलावा माता पार्वती और शिव जी की कथा भी तीज मनाने का मुख्य कारण है। जिसके अनुसार माता पार्वती ने शिव जी को प्राप्त करने हेतु 108 वर्ष तक कड़ी तपस्या की तब भगवान शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया था। उन्होंने प्रसन्न होकर पार्वती जी को यह वरदान भी दिया की इस दिन जो भी स्त्री व्रत रखेगी और इस कथा को सुनेगी और सुनाएगी, उसे सौभाग्वती होने का आशीर्वाद प्राप्त होगा। कजरी तीज का यह पर्व धार्मिक परंपरा को बनाए रखने में मदद करता है।
कजरी तीज के दिन सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्यवती होने, संतान प्राप्ति और पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती है और माता पार्वती की विधि विधान से पूजा करती है। कजरी तीज के मौके पर नीमड़ी पूजन का खास महत्व है। इस दिन सुहागिन महिलाएं नीम के पेड़ को देवी मां के रूप में पूजती हैं और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। हिंदू धर्म के अलावा वैज्ञानिक नजरिए से भी नीम का पेड़ प्राकृतिक के लिए बेहद लाभकारी और योग्य है। कजरी तीज पर महिलाएं सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहन कर पूजन की तैयारी करती हैं। अब नीमडी माता की पूजा में भोग लगाने के लिए माल पुआ बनाएं। पूजन के लिए मिट्टी या गाय के गोबर से तालाब बनाएं। उसमें नीम की टहनी डाल कर उसपर लाल चुनरी रखकर नीमड़ी की स्थापन करें।
वैदिक शास्त्रों में बताया गया है कि इस योग में किया गया हर कार्य शुभ होता है और उसके अच्छे फल प्राप्त होते हैं। व्रत रखने के अलावा इस योग में भूमि-पूजन, किसी नए कार्य की शुरुआत और मकान या जमीन खरीदना भी शुभ माना गया है।

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