मणिपुर हिंसा : आक्रोश में अवसर तलाशता विपक्ष

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-संजय सक्सेना
भारत के पूर्वोत्तर का एक छोटा सा राज्य मणिपुर पिछले कई सालों से क्षेत्रीय हिंसा की खबरों के कारण पूरे देश में सुर्खियां बटोर रहा है। एक तरफ मोदी सरकार लगातार दावे कर रही है कि मणिपुर में हालात बेहतर करने के लिये लगातार प्रयास किये जा रहे हैं, वहीं विपक्ष मणिपुर के बिगड़े हालात के लिये मोदी सरकार को कसूरवार ठहराने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता है। विपक्ष इतना शोर करते हुए अन्य कहीं नहीं देखा जाता है, जितना मणिपुर को लेकर मचाया जा रहा है। क्या है इसके पीछे राजनीतिक कारण? क्या यहाँ की हिंसा जातियों में आपसी क्लेश का मामला है? कहा जाता है कि मणिपुर का संघर्ष मुख्य रूप से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच है, यह बात कितनी सच है? मणिपुर की समस्या को कहीं राजनेताओं के आरोप-प्रत्यारोप ने और जटिल तो नहीं बना दिया है। यह तमाम सवाल हैं जिनका उत्तर मिलना बेहद जरूरी है। गौरतलब हो, मणिपुर की हिंसा की जड़ें गहरी हैं। राज्य की अधिकांश आबादी मैतेई समुदाय की है, जो इंफाल घाटी में रहते हैं और राज्य की राजनीति व अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखते हैं। दूसरी ओर कुकी और नागा जैसे आदिवासी समुदाय पहाड़ी इलाकों में बसे हैं, जो संसाधनों और प्रतिनिधित्व में भेदभाव का आरोप लगाते हैं। तीन साल पहले मई में उच्च न्यायालय के मैतेई को जनजातीय दर्जा देने के सुझाव से कुकी समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किया, जो हिंसा में बदल गया। तब से मणिपुर में हिंसा की आग लगातार सुलग रही है, जिसमें सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं और पचास हजार से अधिक लोग विस्थापित हैं।

हिंसा केवल जातीय कलह तक सीमित नहीं रही। हाल ही में अप्रैल 2026 में बिष्णुपुर और इंफाल में फिर झड़पें भड़कीं, जहां सुरक्षा बलों पर हमले हुए और कर्फ्यू लगाना पड़ा। कुकी उग्रवादियों पर छह लोगों की हत्या का आरोप लगा, जिससे तनाव बढ़ा। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर जमीन हथियाने और संसाधनों पर कब्जे का इल्जाम लगाया। मैतेई कहते हैं कि कुकी अवैध प्रवासियों को बसाने की साजिश रच रहे हैं, जबकि कुकी विकास में हिस्सेदारी की मांग करते हैं। यह आपसी कलह इतिहास से चली आ रही है, जब मैतेई राजाओं ने कुकी को पहाड़ों में बसाया था, लेकिन अब दोनों के बीच दुश्मनी गहरी हो गई है। उधर, विपक्ष इसी कलह को राजनीतिक हथियार बनाने से जुड़ा है। कांग्रेस और अन्य दल बीजेपी सरकार को हिंसा रोकने में नाकाम बताते हैं। वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री की चुप्पी उदासीनता दिखाती है और मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने की मांग करते हैं। राज्यसभा में खरगे ने श्वेत पत्र की मांग की, जबकि राहुल गांधी ने महिलाओं पर अत्याचार का मुद्दा उठाया। विपक्ष का तर्क है कि बीजेपी मैतेई समुदाय को समर्थन देकर कुकी को नजरअंदाज कर रही है, जिससे हिंसा बढ़ी। इसके पीछे राजनीतिक कारण स्पष्ट हैं। मणिपुर में बीजेपी की सरकार है, और विपक्ष इसे कमजोर करके उत्तर-पूर्व में अपनी जमीन मजबूत करना चाहता है। 2023 से संसद के सत्रों में विपक्ष ने मणिपुर को हाईजैक करने की कोशिश की, लेकिन बीजेपी ने पलटवार किया कि वे राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को भड़का रहे हैं। राष्ट्रपति शासन के बावजूद हालात नहीं सुधरे, तो कांग्रेस ने कहा कि बीजेपी के पास बहुमत होने पर भी इच्छाशक्ति नहीं है। आने वाले चुनावों को देखते हुए विपक्ष बीजेपी को घेरना चाहता है, खासकर जब एनडीए के सहयोगी जैसे जेडीयू ने सरकार को समर्थन दिया।

खैर, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विपक्ष के बीजेपी पर हमलावर रहने का कारण सत्ता की राजनीति है। विपक्ष जानता है कि मणिपुर का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की छवि खराब कर सकता है। वे मोदी सरकार की पूर्वोत्तर नीति पर सवाल उठाते हैं, जबकि बीजेपी कहती है कि कांग्रेस के समय भी हिंसा होती थी। इसी के कारण मैतेई विधायकों पर जनता का गुस्सा फूटा क्योंकि उन्होंने केंद्र तक बात नहीं पहुंचाई। विपक्ष इसे भुनाकर अल्पसंख्यक कुकी वोटों को अपने पाले में लाना चाहता है। हाल में बीजेपी नेताओं के दौरे को कांग्रेस ने चुनावी ड्रामा बताया।हालांकि हिंसा मूल रूप से जातीय है। मैतेई को जनजातीय लाभ जैसे आरक्षण और जमीन अधिकार चाहिए, जो कुकी को खतरा लगता है। कुकी पहाड़ी क्षेत्रों पर नियंत्रण रखते हैं और डरते हैं कि मैतेई घाटी से ऊपर आ जाएं। दोनों ने हिंसा की, घर जलाए, लेकिन सरकार की विफलता ने इसे लंबा खींचा। यहां 217 मौतें और हजारों लोगों का बेघर होना यह साबित करता है कि यह सामाजिक क्लेश है, न कि सिर्फ राजनीतिक। फिर भी विपक्ष इसे बीजेपी की साजिश बताकर शोर मचाता है।

मणिपुर को लेकर राजनीतिक कारणों पर रोशनी डाली जाये तो ऐसा लगता है कि मणिपुर की हिंसा पर हो-हल्ला करके विपक्ष अपना वोट बैंक मजबूत करना चाहता है। वे कुकी समुदाय को अपना सहारा बताते हैं, जबकि मैतेई बीजेपी समर्थक हैं। इसलिये वह संसद में चर्चा की मांग करके सदन जाम करते हैं, जो बीजेपी को कमजोर दिखाता है। यहां के हालात को देखते हुए केंद्र ने अमित शाह को भेजा, लेकिन विपक्ष संतुष्ट नहीं। 2026 तक हिंसा जारी रहने से विपक्ष को लगातार मुद्दा मिलता रहता है। बीजेपी का कहना है कि विपक्ष परिपक्वता दिखाए, लेकिन वे लाभ उठाते हैं। बात प्रबुद्ध समाज की की जाये तो यह वर्ग कहता है कि मणिपुर हिंसा के समाधान के लिए दोनों पक्षों को बातचीत करनी होगी। मुख्यमंत्री ने माफी मांगी, लेकिन विश्वास बहाली जरूरी है। इसके साथ ही केंद्र को जनजातीय दर्जे पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। विपक्ष का शोर कम हो और सहयोग बढ़े, अन्यथा यह कलह राज्य को तबाह करता रहेगा। मणिपुर के लोग शांति चाहते हैं, राजनीति का खेल नहीं। यह संघर्ष जातीय कलह से उपजा है, लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया। बीजेपी पर हमले से उनका एजेंडा चलता है, पर शांति सबकी जिम्मेदारी है। कुल मिलाकर, मणिपुर का दर्द गहरा है, जिसे हल करने के लिए एकजुटता जरूरी है।

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